क्या आपराधिक मुकदमा लंबित रहने के दौरान पुलिस शराब की तस्करी में इस्तेमाल हुए वाहन को हमेशा के लिए जब्त कर सकती है? गुजरात हाईकोर्ट ने इस अहम सवाल पर विचार करते हुए गुजरात निषेध अधिनियम के तहत पुलिस उपाधीक्षक (DSP) द्वारा एक वाहन को स्थायी रूप से जब्त (कॉन्फिस्केट) करने के आदेश पर रोक लगा दी है।
अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। दरअसल, वाहन मालिक ने अपनी याचिका में दलील दी थी कि बिना किसी न्यायिक आदेश के पुलिस किसी भी वाहन का मालिकाना हक सरकार को नहीं सौंप सकती है।
यह मामला कानूनी तौर पर बेहद अहम है क्योंकि इसी साल गुजरात विधानसभा ने ‘गुजरात निषेध (संशोधन) विधेयक, 2024’ पारित किया था। इस बिल ने सरकार को यह अधिकार दिया है कि अदालत के अंतिम फैसले से पहले ही शराब या अन्य नशीले पदार्थों की तस्करी में पकड़े गए वाहनों की नीलामी की जा सके।
इसके जरिए गुजरात निषेध अधिनियम, 1949 की धारा 98(2) में बदलाव किया गया था। इससे पहले जब तक अदालत अपना अंतिम फैसला नहीं सुना देती थी, तब तक ऐसे वाहनों को रिहा नहीं किया जा सकता था। हालांकि, नए संशोधन के बाद भी नीलामी के लिए अदालत की अनुमति लेना अनिवार्य किया गया है।
ताजा विवाद एक लोडिंग ऑटो रिक्शा से जुड़ा है, जिसे इस साल की शुरुआत में थराद पुलिस ने शराब ले जाने के आरोप में पकड़ा था। वाहन मालिक प्रेमाजी वजीर ने पहले निचली अदालत का दरवाजा खटखटाकर अपने इस वाहन को सौंपने की गुहार लगाई थी। लेकिन, निचली अदालतों ने यह कहते हुए इसे लौटाने से इनकार कर दिया कि वाहन से बरामद शराब की मात्रा 20 लीटर से अधिक थी।
निचली अदालत में मामला लंबित रहने के दौरान ही थराद डिवीजन के डीएसपी ने वाहन को स्थायी तौर पर जब्त करने का आदेश जारी कर दिया। इसके बाद प्रेमाजी वजीर ने हाईकोर्ट का रुख किया।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि किसी भी सक्षम अदालत के आदेश के बिना पुलिस अधिकारी के पास वाहन को हमेशा के लिए छीनने का कोई अधिकार नहीं है। वजीर की वकील ने अदालत को बताया कि डीएसपी ने जब्ती के लिए गुजरात निषेध अधिनियम की धारा 98(2) का इस्तेमाल किया है, जो किसी भी निषेध अधिकारी को स्वतंत्र रूप से ऐसी कार्रवाई का अधिकार नहीं देती है।
अपने तर्कों को मजबूत करने के लिए याचिकाकर्ता ने साल 2024 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया। सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि इस कानून के तहत चीजों को ‘कब्जे में लेने’ (Seizure) और ‘स्थायी जब्ती’ (Confiscation) के बीच बड़ा कानूनी अंतर है।
वकील ने दलील दी कि अधिनियम की धारा 98 उन वस्तुओं से संबंधित है जिन्हें जब्त किया जा सकता है, जो सिर्फ अदालत के अधिकारों के दायरे में आता है। वहीं, धारा 123 सिर्फ सामान को कब्जे में लेने का अधिकार देती है, लेकिन यह अधिकारी को उसे स्थायी तौर पर जब्त करने की शक्ति नहीं देती।
इन तमाम दलीलों के आधार पर याचिकाकर्ता ने कहा कि बिना न्यायिक आदेश के ट्रायल लंबित रहने के दौरान वाहन को हमेशा के लिए सरकार के अधीन कर लेना कानूनी रूप से गलत है। मामले की गंभीरता को देखते हुए जस्टिस एम के ठक्कर की पीठ ने सभी पक्षों को सुना और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया।
अदालत ने डीएसपी के फैसले पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाते हुए स्पष्ट किया कि थराद डिवीजन के डीएसपी द्वारा पारित आदेश को स्थगित किया जाता है। इस मामले की अगली सुनवाई 22 अक्टूबर को तय की गई है।
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