मरीजों की घबराहट दूर करने और उनकी गंभीर बीमारियों को ध्यान से सुनने का प्रशिक्षण ले रहे भविष्य के कई डॉक्टर खुद एक अनजाने खौफ का सामना कर रहे हैं। अहमदाबाद के मेडिकल छात्रों पर किए गए एक चौंकाने वाले अध्ययन में यह बात सामने आई है कि सफेद कोट पहनने वाले कई छात्र सामाजिक परिस्थितियों का सामना करने और अजनबियों से बेझिझक बातचीत करने में कड़ा संघर्ष कर रहे हैं।
अहमदाबाद में 480 एमबीबीएस छात्रों पर किए गए इस शोध के अनुसार, लगभग आधे छात्र मध्यम से लेकर बहुत गंभीर श्रेणी के ‘सोशल फोबिया’ (सामाजिक भय) से जूझ रहे हैं। आंकड़ों की बात करें तो 28.3 प्रतिशत छात्रों में मध्यम स्तर का सोशल फोबिया पाया गया। वहीं, 27.3 प्रतिशत में हल्का, 19.8 प्रतिशत में गंभीर और 18.6 प्रतिशत छात्रों में बहुत गंभीर सोशल फोबिया दर्ज किया गया है।
यह महत्वपूर्ण शोध प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल ‘क्यूरियस’ (Cureus) में प्रकाशित हुआ है। इसे गुजरात कैंसर सोसाइटी (GCS) मेडिकल कॉलेज, अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग और एयरपोर्ट हेल्थ ऑफिस, डीजीएचएस (DGHS), अहमदाबाद के शोधकर्ताओं द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।
जीसीएस मेडिकल कॉलेज के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग में सहायक प्रोफेसर और इस अध्ययन के लेखक डॉ. साहिल सोलंकी ने इस विषय की गंभीरता पर जोर दिया। उनका कहना है कि मेडिकल छात्रों के बीच सोशल फोबिया एक ऐसा मुद्दा है जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि भविष्य में ये छात्र डॉक्टर बनेंगे और बेहतर संचार उनके पेशे का एक बेहद अहम हिस्सा है।
डॉ. सोलंकी के अनुसार, कई छात्र अन्य राज्यों से आते हैं और छात्रावासों में रहते हैं, जहां शुरुआती दौर में वे खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं या नए सामाजिक संबंध बनाने में उन्हें काफी कठिनाई होती है। लोगों द्वारा आंके जाने (जज किए जाने) के डर से ऐसे छात्र अक्सर सार्वजनिक कार्यक्रमों या सामाजिक संवाद से बचने की कोशिश करते हैं।
उन्होंने आगे बताया कि इंटर्नशिप और बाद में ग्रामीण इलाकों में तैनाती के दौरान मरीजों तथा समुदाय के साथ बातचीत करना उनके काम का अनिवार्य हिस्सा बन जाता है। इसलिए अगर समय रहते इस फोबिया की पहचान कर ली जाए और छात्रों को खुलकर संवाद करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, तो वे भविष्य में कहीं अधिक आत्मविश्वासी डॉक्टर बन सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने छात्रों के भय को पांच अलग-अलग श्रेणियों में वर्गीकृत करने के लिए ‘सोशल फोबिया इन्वेंटरी’ (SPIN) नामक टूल का उपयोग किया। इस अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ कि तंबाकू का सेवन, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, रहने की जगह (आवास) और खेलों में भागीदारी का छात्रों की मानसिक स्थिति पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इनमें से तंबाकू का सेवन सबसे मजबूत कारक के रूप में उभर कर सामने आया, जबकि आवास को भी एक अन्य महत्वपूर्ण वजह माना गया।
दूसरी ओर, शोध में यह पाया गया कि छात्रों की उम्र, लिंग या पढ़ाई के वर्ष का इस फोबिया से कोई सीधा संबंध नहीं है। विशेषज्ञों ने यह भी रेखांकित किया कि खेलों में हिस्सा लेने से चिंता और तनाव को कम करने में काफी मदद मिलती है, जिससे टीम वर्क बेहतर होता है और सामाजिक कौशल भी मजबूत होते हैं।
अध्ययन के अंत में शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि इन नतीजों को सीधे तौर पर पूरे गुजरात या भारत पर लागू करने से पहले एक बड़े और बहु-केंद्रित (मल्टीसेंट्रिक) अध्ययन की आवश्यकता होगी।
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