गुजरात में कुल सड़क हादसों में भले ही मामूली कमी दर्ज की गई हो, लेकिन पैदल चलने वालों के लिए यहां की सड़कें लगातार खतरनाक होती जा रही हैं। साल 2014 से 2024 के बीच राज्य में पैदल यात्रियों की मौत के मामलों में 145 प्रतिशत का भारी उछाल आया है।
आंकड़ों के मुताबिक, 2014 में यह संख्या 714 थी, जो 2024 में बढ़कर 1,747 हो गई। दूसरी ओर, इसी अवधि के दौरान राज्य में कुल सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों में लगभग 3 प्रतिशत की गिरावट आई है, जो 7,955 से घटकर 7,717 रह गई है।
साल 2024 में गुजरात के भीतर सड़क हादसों में जान गंवाने वाले कुल लोगों में से 22.6 प्रतिशत पैदल यात्री थे। एक दशक पहले यह आंकड़ा महज 9 प्रतिशत के आसपास था। सीधे शब्दों में कहें तो राज्य की सड़कों पर मरने वाला लगभग हर चौथा व्यक्ति पैदल चल रहा था। यह आंकड़े साफ तौर पर पैदल यात्रियों के सामने मौजूद बढ़ते खतरों को उजागर करते हैं।
यह खौफनाक स्थिति ‘प्रेरणा फॉर सेफर स्ट्रीट्स’ जैसे अभियानों की तत्काल आवश्यकता को सही साबित करती है। द अर्बन लैब फाउंडेशन द्वारा चलाए जा रहे इस अभियान का मुख्य उद्देश्य ऐसी सड़कों का निर्माण करना है जो केवल वाहनों की आवाजाही को प्राथमिकता देने के बजाय पैदल चलने वालों को भी सुरक्षित माहौल दे सकें।
पैदल यात्रियों की असुरक्षा का यह रुझान केवल गुजरात तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर राष्ट्रीय संकट बन चुका है। साल 2024 में पूरे भारत में 36,526 पैदल यात्रियों ने अपनी जान गंवाई। यह आंकड़ा 2014 में दर्ज 12,330 मौतों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक है।
इस एक दशक में देश भर में कुल सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतें भी 1,39,671 से बढ़कर 1,77,175 हो गई हैं। राष्ट्रीय स्तर पर सड़क हादसों में मरने वाले कुल लोगों में पैदल यात्रियों की हिस्सेदारी 2014 के 8.8 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 20.6 प्रतिशत हो गई है।
गुजरात में कुल मौतों में कमी के बावजूद पैदल चलने वालों की मृत्यु दर में यह तेज वृद्धि दिखाती है कि सड़क सुरक्षा के समग्र आंकड़े अक्सर संवेदनशील राहगीरों के जोखिम को छिपा देते हैं।
राष्ट्रीय राजमार्गों पर भी यह खतरा स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के 2024 के आंकड़ों के अनुसार, इन राजमार्गों पर हुए कुल हादसों में पैदल यात्रियों की संलिप्तता 12.9 प्रतिशत थी, लेकिन कुल मौतों में उनकी हिस्सेदारी 17.6 प्रतिशत रही।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि स्थानीय स्तर पर यह चुनौती कितनी बड़ी है। अहमदाबाद में साल 2024 के दौरान सड़क दुर्घटनाओं में 410 लोगों की मौत हुई, जिनमें से 180 पैदल यात्री थे। इसके अलावा 369 पैदल यात्री इन हादसों में घायल भी हुए हैं।
राज्य के चार प्रमुख शहरों की बात करें तो अहमदाबाद में पैदल यात्रियों की मौत का आंकड़ा सबसे अधिक रहा। अहमदाबाद के बाद सूरत में 127, राजकोट में 50 और वडोदरा में 17 पैदल चलने वालों ने सड़क हादसों में अपनी जान गंवाई है।
शोधकर्ता और सलाहकार शेली कुलश्रेष्ठ इस स्थिति पर चिंता जताते हुए कहती हैं कि पैदल चलना लोगों की दिनचर्या का एक अनिवार्य हिस्सा है। लोग काम, स्कूल, सार्वजनिक परिवहन, बाजार या अन्य जरूरी सेवाओं तक पहुंचने के लिए पैदल चलते हैं, फिर भी उनकी मौत के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि केवल मौतों के आंकड़ों से हादसों के सटीक कारणों का पता नहीं लगाया जा सकता, लेकिन इससे यह जरूर साबित होता है कि हमें सड़कों के डिजाइन और उनके प्रबंधन के तरीके की गंभीरता से जांच करने की जरूरत है।
एक अन्य सलाहकार संदीप पॉल का मानना है कि सिर्फ आंकड़े देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि इन मौतों की वजह तेज रफ्तार, असुरक्षित क्रॉसिंग, फुटपाथ की कमी, खराब जंक्शन या रोशनी का अभाव था। उनके अनुसार, इन कारणों का पता लगाने के लिए स्थान-विशिष्ट जांच और बेहतर क्रैश विश्लेषण की आवश्यकता है।
पॉल ने चेतावनी देते हुए कहा कि जब कुल मौतों की तुलना में पैदल यात्रियों की मौतें अधिक तेजी से बढ़ती हैं, तो सड़क सुरक्षा का आकलन केवल वाहनों की आवाजाही या दुर्घटनाओं की संख्या के आधार पर करना पर्याप्त नहीं है।
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