गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि च्युइंग गम और बबल गम को मूल्य वर्धित कर (वैट) की गणना के लिए खाने योग्य मिठाइयों या कन्फेक्शनरी उत्पादों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि केवल चबाने पर मीठा रस या स्वाद मिलने से कोई भी उत्पाद खाने योग्य वस्तु का दर्जा हासिल नहीं कर लेता। पीठ ने स्पष्ट किया कि च्युइंग गम के मूल पदार्थ को निगलने के बजाय आमतौर पर थूक दिया जाता है।
यह फैसला राज्य वैट ट्रिब्यूनल के उस पुराने आदेश को खारिज करता है, जिसमें एक स्थानीय कन्फेक्शनरी निर्माता को कर में राहत दी गई थी। राज्य सरकार के मूल्यांकन को सही ठहराते हुए अदालत ने पुष्टि की है कि च्युइंग गम की बिक्री सामान्य अवशिष्ट (रेसिड्युअरी) श्रेणी में आती है। इसके चलते इस पर पारंपरिक मिठाइयों के लिए तय की गई 4 प्रतिशत की रियायती दर के बजाय 12.5 प्रतिशत का वैट लगाया जाना पूरी तरह वैध है।
इस कानूनी विवाद की शुरुआत फरवरी 2007 में हुई थी। वाणिज्यिक कर विभाग के एक अधिकारी ने कैड मैक च्यू फूड्स (Cad Mak Chew Foods) के निर्माण परिसर का नियमित निरीक्षण किया था। यह कंपनी मुख्य रूप से पेपरमिंट, शुगर कैंडी, साकरिया (पारंपरिक चीनी उत्पाद) और च्युइंग गम बनाने के कारोबार से जुड़ी हुई थी।
बिक्री रिकॉर्ड और उत्पाद की विशेषताओं की गहन जांच के बाद, मूल्यांकन अधिकारी ने 2011 में अपना आदेश जारी किया। अधिकारी ने माना कि कंपनी द्वारा च्युइंग गम की बिक्री को गलत कर श्रेणी में रखा गया था। इसके बाद, अधिकारी ने 12.5 प्रतिशत वैट दर के साथ-साथ वैधानिक ब्याज और जुर्माने को लागू करते हुए कुल 9.83 लाख रुपये की कर मांग निकाली। अधिकारी का तर्क था कि च्युइंग गम गुजरात मूल्य वर्धित कर अधिनियम, 2003 की अनुसूची II की प्रविष्टि 74A (Entry 74A) के तहत 4 प्रतिशत कर दर के योग्य नहीं है।
निर्माता ने जब इस मूल्यांकन आदेश को चुनौती दी, तो एक उप-आयुक्त ने 12.5 प्रतिशत की उच्च कर दर को सही ठहराया। हालांकि, उन्होंने जुर्माने की राशि को कम करके कंपनी को आंशिक राहत जरूर दी। इस फैसले से असंतुष्ट होकर कंपनी ने अतिरिक्त कर की मांग को पूरी तरह से माफ करवाने के लिए गुजरात वैट ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया।
साल 2014 में ट्रिब्यूनल ने निर्माता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए अतिरिक्त कर की मांग को रद्द कर दिया। ट्रिब्यूनल ने तर्क दिया था कि उपभोक्ता मुख्य रूप से इसका मीठा स्वाद और रस निकालने के लिए बबल गम खरीदते हैं। ट्रिब्यूनल का निष्कर्ष था कि भले ही अंत में रबर का हिस्सा फेंक दिया जाता है, लेकिन जब तक यह वस्तु मुंह में रहती है, यह खाने योग्य उत्पाद के रूप में अपनी पहचान नहीं खोती है।
ट्रिब्यूनल की इस व्याख्या को खारिज करते हुए गुजरात सरकार ने हाईकोर्ट के समक्ष एक आधिकारिक कर अपील दायर कर दी। राजस्व अधिकारियों ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि च्युइंग गम का प्रविष्टि 74A के तहत कहीं भी उल्लेख नहीं है। कानून निर्माताओं ने यह प्रविष्टि विशेष रूप से मानक मिठाइयों को कवर करने के लिए बनाई थी।
सरकारी वकील ने राजस्व विभाग का प्रतिनिधित्व करते हुए दलील दी कि वाणिज्यिक कर कानूनों के तहत वर्गीकरण ‘कॉमन पार्लेंस टेस्ट’ (आम बोलचाल के परीक्षण) पर आधारित सुप्रीम कोर्ट की मिसालों के अनुरूप होना चाहिए। इस सिद्धांत के अनुसार, उत्पादों को इस आधार पर वर्गीकृत किया जाता है कि आम उपभोक्ता और व्यापारी उन्हें किस तरह समझते हैं। राज्य सरकार ने जोर देकर कहा कि च्युइंग गम अवशिष्ट प्रविष्टि 87 (Entry 87) के अंतर्गत आता है, जिस पर 12.5 प्रतिशत की उच्च कर देनदारी बनती है।
जस्टिस भार्गव कारिया और जस्टिस प्रणव त्रिवेदी की खंडपीठ ने वैधानिक प्रविष्टियों, ट्रिब्यूनल के निष्कर्षों और पिछली न्यायिक मिसालों का बारीकी से मूल्यांकन किया। पीठ ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने स्वाद निकालने की प्रक्रिया को खाद्य पदार्थों की वास्तविक खपत के बराबर मानकर एक बुनियादी कानूनी भूल की है।
न्यायाधीशों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले लगातार यह स्पष्ट करते रहे हैं कि गैर-खाद्य उत्पादों को भोजन और मिठाइयों की कर श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता। चूंकि च्युइंग गम के कोर को बनाने वाले रबर मैट्रिक्स को कभी निगला या पचाया नहीं जाता है, इसलिए यह उत्पाद खाने योग्य वस्तु होने के बुनियादी परीक्षण में विफल रहता है। अंततः, पीठ ने सभी कानूनी सवालों का जवाब राजस्व विभाग के पक्ष में दिया और कंपनी पर मूल कर देनदारियों को बहाल कर दिया।
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