हाल ही में दशहरा बीता है और ज्यादातर गुजरातियों की तरह हमने भी पपीते के संभारे, कढ़ी चटनी और तली हुई हरी मिर्च के साथ फाफड़ा-जलेबी का आनंद लिया। नवरात्रि की तरह ही, गुजरात में दशहरे पर फाफड़ा-जलेबी का व्यापार करोड़ों रुपये का होता है।
यह एक असहज करने वाली सच्चाई की ओर ध्यान खींचता है। एक समाज के रूप में हम गुजराती ऐसे व्यंजनों का जश्न मनाते हैं और उन्हें आसानी से अपना लेते हैं जो धार्मिक और भौगोलिक सीमाओं को पार कर हमारे पास आए हैं। लेकिन, जब बात हमारे त्योहारों में हिस्सा लेने वाले लोगों की पहचान की आती है, तो हम लगातार कट्टर होते जा रहे हैं।
फाफड़ा निर्विवाद रूप से गुजराती है। हिंदू गुजराती खानपान में इसका विशेष स्थान है। बेसन और मसालों से तैयार इस व्यंजन को चपटी पट्टियों का आकार देकर गहरे तेल में तला जाता है।
भारत में सबसे लंबी तटरेखा गुजरात की है और हम सदियों से व्यापार के नए रास्ते तलाशने में माहिर रहे हैं। इसलिए हमने समुद्री रास्ता चुना और फारस से लेकर अफ्रीका तक की यात्राएं कीं। उस दौर में शाकाहारी लोगों को ऐसे नाश्ते की जरूरत थी जो महीनों तक खराब न हो।
यहीं से फाफड़ा का जन्म हुआ, जो असल में सौराष्ट्र में बने ‘गांठिया’ का ही विकसित रूप है। इसे ले जाने में आसानी और लंबी शेल्फ-लाइफ ने इसे बेहद लोकप्रिय बना दिया। बिना परिवार के अफ्रीका में व्यापार करने वाले और फारस व एशिया के अन्य हिस्सों में यात्रा करने वाले गुजरातियों के लिए यह सबसे किफायती नाश्ता था। शाकाहारियों के लिए यह प्रोटीन का मुख्य जरिया भी हुआ करता था।
अब बात करते हैं फाफड़ा के सबसे बेहतरीन साथी ‘जलेबी’ की, जिसके साथ यह गुजरात का सबसे मशहूर त्योहारी जोड़ा बनता है। जलेबी दरअसल एक मुस्लिम भूभाग से आई है। माना जाता है कि इसे गुजरात में जैन, नागर और ब्राह्मण समुदाय के उन लोगों ने पेश किया, जो दुनिया भर में यात्राएं करते थे या अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कूटनीति का हिस्सा थे।
भोजन के इतिहासकार जलेबी के नाम और उसकी जड़ों को पश्चिम एशियाई परंपराओं से जोड़ते हैं। अरबी में इसे ‘जलाबिया’ और फारसी में ‘जोलबिया’ कहा जाता है। मुहम्मद बिन हसन अल-बगदादी द्वारा 10वीं शताब्दी में संकलित कुकबुक ‘किताब अल-तबीख’ में जोलबिया का वर्णन मिलता है। इसका पहला जिक्र बताता है कि यह व्यंजन रमजान और अन्य त्योहारों के दौरान परोसा जाता था। जोलबिया आज भी ईरान में काफी लोकप्रिय है।
साल 1450 में जैन लेखक जिनसूरी द्वारा रचित ग्रंथ ‘प्रियंकरनृपकथा’ में वर्णन है कि कैसे अमीर व्यापारी अपनी सभाओं में जलेबी का आनंद लेते थे। 1600 ईस्वी से पहले के एक संस्कृत ग्रंथ ‘गुण्यगुणबोधिनी’ में आज की जलेबी के समान ही एक मिठाई की सामग्री और विधि बताई गई है। 17वीं शताब्दी में रघुनाथ की पुस्तक ‘भोजन कुतूहल’ में भी जलेबी का जिक्र मिलता है।
जलेबी सबसे पहले गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान या हरियाणा में से कहां आई, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन इसके मुस्लिम मूल के होने के ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद हैं। यह भारत में कैसे पहुंची और इसने अपना वर्तमान रूप कैसे लिया, यह शोध का विषय हो सकता है, लेकिन इसकी उत्पत्ति पूरी तरह स्पष्ट है।
खानपान की संस्कृति इसी तरह विकसित होती है। एक व्यंजन यात्रा करता है, खुद को ढालता है, बाजार में उतरता है, किसी त्योहार का हिस्सा बनता है, और समय के साथ ऐसा लगने लगता है जैसे वह हमेशा से वहीं का था। कोई भी गुजराती आज जलेबी को फारस या अरब दुनिया को वापस नहीं लौटाएगा। पीढ़ियों के उपभोग और अनुकूलन के कारण अब यह हमारी अपनी हो चुकी है।
यही बात ‘शीरो’ (हलवा) पर भी लागू होती है। ज्यादातर हिंदू गुजराती सत्यनारायण पूजा में आस्था रखते हैं। भगवान विष्णु के अवतार सत्यनारायण को प्रसाद के रूप में केवल शीरा ही चढ़ाया जाता है। फारसी शीरा के विपरीत, गुजराती शीरो सूजी से बनता है। देश भर में शीरा के कई भारतीय रूप मौजूद हैं।
मालपुआ, शीरो, जलेबी, हलवे की अन्य किस्में और फालूदा जैसे व्यंजनों के जरिए मुस्लिम पाक कला ने गुजराती खानपान को काफी समृद्ध किया है। इस्लाम को मानने वाले खोजा समुदाय के पास भी फारसी प्रभाव वाले कई विशिष्ट व्यंजन और आतिथ्य की परंपराएं हैं, जो गुजरात के स्वाद को और निखारती हैं।
इस प्रकार, गुजरातियों की खाने की थाली धर्म के आधार पर नहीं बंटी है। यह सदियों के व्यापार, मेलजोल और पड़ोसी धर्म का जीता-जागता सबूत है। जब हम जलेबी खाते हैं, तो उससे उसका धर्म नहीं पूछते। फिर गरबा खेलने की इच्छा रखने वाले किसी युवा से हम उसकी धार्मिक पहचान क्यों मांगते हैं? इसके बावजूद, गुजरात में आज भी गरबा आयोजनों से मुस्लिम प्रतिभागियों को बाहर निकालने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं।
भावनगर में दक्षिणपंथी संगठनों ने एक प्रमुख म्यूजिकल ट्रूप को सिर्फ इसलिए हटाने की मांग की, क्योंकि उसका नाम ‘असलम एंड असलम बैंड’ था। दोस्तों के साथ गरबा देखने गए 18 साल के युवाओं को सरेआम निशाना बनाया गया। गरबा मैदानों में सार्वजनिक घोषणाएं की गईं कि ‘अपने बगल में किसी भी मुसलमान को देखें तो रिपोर्ट करें’। उन्हें वहां से चले जाने को कहा गया क्योंकि आयोजकों के अनुसार ‘सनातन रक्षक के रूप में विश्व हिंदू परिषद आपकी रक्षा के लिए यहां मौजूद है’।
साल 2002 के बाद से मुसलमानों का यह बहिष्कार और अपमान गुजरात में एक आम बात सी हो गई है। हाल के वर्षों में जब हिंदुत्व से हटकर विकास पर ध्यान केंद्रित हुआ था, तब इस प्रवृत्ति में थोड़ी कमी आई थी, लेकिन इस साल नवरात्रि के दौरान यह फिर से चरम पर पहुंच गई। कल्पना कीजिए कि आप 18 साल के हैं, दोस्तों के साथ नाचना चाहते हैं, लेकिन पाते हैं कि आपके उत्साह और कला से ज्यादा आपका नाम या आपका धर्म मायने रखता है। सोचिए उस संगीतकार के बारे में, जिसे परफॉर्म करने के लिए बुलाया गया और फिर केवल उसके धर्म के कारण उसकी मौजूदगी पर सवाल खड़े कर दिए गए।
अब उस बात पर आते हैं जो गुजरातियों को सबसे ज्यादा पसंद है: विदेश यात्रा करना और वहां बसना। विदेशों में हम बेशक खुद को अपनाए जाने की उम्मीद करते हैं। हम इसे अपना अधिकार मानते हैं। लेकिन अहमदाबाद में एक 18 या 28 साल के मुस्लिम युवक को सरेआम जलील किया जा सकता है, जबकि हम गोरे विदेशियों को बिना उनकी पहचान पूछे गरबा में नाचते देख बेहद खुश होते हैं।
प्रवासी गुजरातियों के साथ भी ऐसा ही है। वे समावेश का जश्न मनाते हैं। इस नवरात्रि न्यूयॉर्क सिटी के मेयर ज़ोहरान ममदानी को गरबा करते देखा गया। धार्मिक सीमाओं को पार कर सांस्कृतिक भागीदारी की इस तस्वीर को सोशल मीडिया पर खूब सराहा गया। ममदानी के पिता महमूद ममदानी गुजराती खोजा मुस्लिम पृष्ठभूमि के विद्वान हैं, जबकि उनकी मां मीरा नायर हिंदू और पंजाबी हैं। खुद ममदानी एक मुस्लिम हैं जिन्होंने कुरान पर हाथ रखकर मेयर पद की शपथ ली थी।
यह ममदानी की आलोचना नहीं है। उनकी भागीदारी काबिले तारीफ है, लेकिन जो बात खटकती है वह एक आम गुजराती का दोहरा रवैया है। वह न्यूयॉर्क में ममदानी या बॉलीवुड में सलमान खान के गरबा करने पर तो खुश हो जाता है, लेकिन गुजरात में किसी असलम या नफीस जैसे मुस्लिम पहचान वाले व्यक्ति को सरेआम अपमानित करता है।
छोटा उदयपुर में एक मुस्लिम युवा, आबिद शेख, पिछले 14 वर्षों से रामलीला में लक्ष्मण की भूमिका निभा रहे हैं। कच्छ में मुस्लिम समुदाय के लोग न केवल नवरात्रि में, बल्कि अपनी शादियों में भी गरबा करते हैं। गरबा का पारंपरिक मिट्टी का घड़ा आज भी मुस्लिम कुम्हारों द्वारा ही बनाया जाता है।
फिर गरबा को लोकनृत्य की जगह धार्मिक स्क्रीनिंग टेस्ट का केंद्र क्यों बना दिया गया है? यह गुजरात की लोक और भक्ति परंपराओं से जुड़ा है, जो देवी की पूजा, ढोल की थाप और नवरात्रि की सामूहिक ऊर्जा पर आधारित है। करोड़ों लोगों के लिए यह आस्था की अभिव्यक्ति और आनंद, पहचान व समुदाय का स्रोत है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों के बाद यूनेस्को ने गरबा को ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ की सूची में शामिल किया था। दिलचस्प बात यह है कि यूनेस्को की घोषणा में कहा गया है कि गरबा एक “सभी को शामिल करने वाला सामुदायिक आयोजन” है। भारत ने सांस्कृतिक संस्था को सौंपे अपने प्रस्ताव में याद दिलाया था कि गरबा “सामाजिक-आर्थिक, लैंगिक और धार्मिक ढांचों को कमजोर कर सामाजिक समानता को बढ़ावा देता है” और यह “विविध और हाशिए के समुदायों को साथ लेकर चलता है, जिससे सामाजिक बंधन मजबूत होते हैं।”
गरबा गुजराती संस्कृति की अभिव्यक्ति है। सांस्कृतिक आत्मविश्वास की असली परीक्षा यह है कि हम अपने रीति-रिवाजों को उन नागरिकों के साथ कितनी सहजता और आत्मविश्वास से साझा कर सकते हैं, जिनका धर्म हमसे अलग है, वह भी बिना कोई खतरा महसूस किए।
गरबा में आने वाले ज्यादातर मुस्लिम युवा होते हैं। यह दावा करना कि मुस्लिम लड़के गरबा में सिर्फ ‘लव जिहाद’ के मकसद से आते हैं, गुजरात मॉडल का एक और शिगूफा है। अगर हिंदू नहीं चाहते कि मुसलमान गरबा में शामिल हों, तो इसे उन एंट्री पास पर स्पष्ट रूप से क्यों नहीं लिखा जाता, जिसके लिए लोग हजारों रुपये खर्च करते हैं? इस साल एक रात के पास की कीमत 15,000 रुपये तक थी।
गुजरात एक ऐसा राज्य है जो आर्थिक रूप से तो समृद्ध हुआ है, लेकिन सामाजिक विश्वास के मामले में गरीब हो गया है। सांस्कृतिक गौरव का यह विचार टिकाऊ नहीं है। जो लोग परंपरा बचाने के नाम पर बहिष्कार की जिद करते हैं, उन्हें जवाब देना चाहिए: एक 18 साल के मुस्लिम युवक के गरबा करने या मुस्लिम बैंड के संगीत बजाने से किस चीज को खतरा है? आखिर वे भक्ति गीतों पर नाचने-गाने में तो ठीक ही हैं। अगर चिंता सुरक्षा की है, तो सुरक्षा नियम लागू होने चाहिए। अगर मुद्दा आचरण का है, तो मानक तय करें। अगर बात धार्मिक शिष्टाचार की है, तो नियम बनाएं और उन्हें सब पर समान रूप से लागू करें।
लेकिन अगर आपत्ति सिर्फ इस बात पर है कि कोई प्रतिभागी मुस्लिम है, तो यह परंपरा की रक्षा नहीं है, बल्कि एक साथी नागरिक के खिलाफ थोपी गई धार्मिक सीमा है। क्या संविधान इसकी इजाजत दे सकता है?
हम जलेबी से उसका धर्म नहीं पूछते या उसके साथ वैसा व्यवहार नहीं करते। हमारी सांस्कृतिक परंपराएं भी इसी उदारता की हकदार हैं। न्यूयॉर्क में ममदानी का गरबा करना हम गुजरातियों के लिए गर्व का विषय कैसे हो सकता है, जबकि एक 18 साल के नफीस को मैदान छोड़ने के लिए कहा जाता है क्योंकि वह स्वीकार करता है कि वह मुस्लिम है?
गरबा गुजरात का गौरव है, इसे सम्मान का स्रोत बनने दें, अपमान का नहीं। अगर फाफड़ा-जलेबी हमारी सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो आइए हम उन तमाम इतिहासों को पहचानें जिन्होंने हमारे जीवन को समृद्ध किया है। और अगर हम वास्तव में गुजरात के विचार में विश्वास करते हैं, तो किसी भी युवा को अपनी आस्था और यहां से जुड़े होने के अधिकार में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर न होना पड़े।
उक्त लेख मूल रूप से द वायर वेबसाइट द्वारा प्रकाशित की जा चुकी है.
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