नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिकी धरती पर कदम रखने के दो दिन के भीतर ही एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। ‘आरएसएस फ्रेंड्स’ नाम के एक समूह ने खुद को आरएसएस के विदेशी एजेंट के रूप में अमेरिकी न्याय विभाग में पंजीकृत कराया है। यह चौंकाने वाली जानकारी अमेरिका के ‘विदेशी एजेंट पंजीकरण अधिनियम’ (FARA) के तहत दाखिल किए गए एक आधिकारिक दस्तावेज से मिली है।
इस पंजीकरण में नई दिल्ली स्थित मुख्यालय वाले आरएसएस को समूह के “विदेशी आका” (फॉरेन प्रिंसिपल) के तौर पर पहचाना गया है। खुद को पंजीकृत कराने वाले समूह ‘आरएसएस फ्रेंड्स’ ने अपना पता अमेरिका के जॉर्जिया राज्य के पीचट्री कॉर्नर्स में दिया है। समूह का कहना है कि उसका प्रस्तावित काम मुख्य रूप से सूचनात्मक, शैक्षिक, जनसंपर्क और सामुदायिक जुड़ाव से जुड़ी गतिविधियों पर केंद्रित होगा।
संघ और विश्व स्तर पर उससे जुड़े संगठनों का खाका तैयार करने वाले आंकड़ों से पता चलता है कि आरएसएस ने भारत में खुद को पंजीकृत कराने से हमेशा इनकार किया है, लेकिन गुपचुप तरीके से उसने अपने अधिकांश वैश्विक सहयोगियों का पंजीकरण करवा लिया है। इसका सीधा मतलब यह है कि आरएसएस से जुड़े संगठनों ने देश-विदेश में कई न्यायक्षेत्रों के कानूनों को स्वीकार कर लिया है, जबकि उनका मूल संगठन भारत में ऐसा करने से बचता रहा है। यह अब तक साफ नहीं हो पाया है कि राष्ट्रीय सीमाओं और अलग-अलग संगठनों के लिए संघ के पंजीकरण के मानक इतने अलग क्यों हैं।
समूह के अनुसार, वह पत्रकारों, शोधकर्ताओं, अकादमिक और नीतिगत संस्थानों के साथ-साथ नागरिक समाज संगठनों से संवाद कर सकता है। इसके अलावा, आवश्यकता पड़ने पर सरकारी एजेंसियों या अधिकारियों से भी संपर्क किया जा सकता है। समूह के उद्देश्यों में आरएसएस से जुड़ी तथ्यात्मक जानकारी या दृष्टिकोण पर प्रशासनिक संस्थाओं, सार्वजनिक एजेंसियों या नीति निर्माताओं के साथ बातचीत करना भी शामिल है।
इन सबके बावजूद, जब फारा अधिनियम के तहत यह पूछा गया कि क्या उनकी गतिविधियों में कोई राजनीतिक कार्य शामिल होगा, तो समूह ने “नहीं” में जवाब दिया। बता दें कि इस अधिनियम के अंतर्गत अमेरिकी एजेंसियों, अधिकारियों या जनता के किसी हिस्से को नीतिगत मामलों या किसी विदेशी देश के हितों पर प्रभावित करने की कोशिशों को राजनीतिक गतिविधि माना जाता है।
अपनी प्रस्तावित गतिविधियों का विवरण देते हुए, इस नव-पंजीकृत समूह ने स्पष्ट किया है कि वह ऐसी किसी भी जानकारी को सुधारने या उसका जवाब देने का काम करेगा, जो ‘आरएसएस फ्रेंड्स’ की नजर में गलत, अधूरी या प्रासंगिक संदर्भ से परे हो। इस पंजीकरण दस्तावेज में हस्ताक्षरकर्ताओं के रूप में राजेंद्र सोनारीकर और जयंत पंत के नाम शामिल हैं।
दस्तावेजों में इस बात का भी विशेष जिक्र है कि आरएसएस के साथ उनका कोई लिखित अनुबंध नहीं है। एक पूरक दस्तावेज में समूह ने उस विकल्प को चुना है, जो यह दर्शाता है कि यह व्यवस्था न तो किसी औपचारिक लिखित अनुबंध का नतीजा है और न ही इसके लिए कोई पत्राचार किया गया है। विदेशी आका के साथ समझौते या करार की तारीख से जुड़े अगले सवाल के जवाब में 17 अगस्त 2026 की तारीख दर्ज की गई है।
दस्तावेज के एक परिशिष्ट में यह बताया गया है कि ‘आरएसएस फ्रेंड्स’ का आरएसएस के साथ कोई ऐसा लिखित रोजगार, परामर्श, लॉबिंग, जनसंपर्क या एजेंसी समझौता नहीं है, जिसमें किसी विशिष्ट परिणाम, मुआवजे या विस्तृत संचालन निर्देशों का उल्लेख हो। हालांकि, इसमें आगे यह भी जोड़ा गया है कि इस बात का यह मतलब बिल्कुल नहीं निकाला जाना चाहिए कि दोनों के बीच कोई संबंध, अनुरोध, समझ, समन्वय, प्राधिकरण, निर्देश या अन्य प्रासंगिक तथ्यात्मक जुड़ाव मौजूद नहीं है। समूह ने भरोसा दिया है कि वह अपनी गतिविधियों से जुड़े वास्तविक तथ्यों का पूरी तरह से खुलासा करेगा।
दस्तावेज के अनुसार, ‘आरएसएस फ्रेंड्स’ अपनी गतिविधियों को खुले और पारदर्शी तरीके से संचालित करना चाहता है। परिशिष्ट में दी गई इस विस्तृत जानकारी का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ ‘आरएसएस फ्रेंड्स’ के किसी भी संभावित रिश्ते की प्रकृति के बारे में सार्वजनिक प्रकटीकरण में मदद करना है।
समूह से जब पूछा गया कि क्या उसने पंजीकरण से पहले किसी ऐसी गतिविधि में हिस्सा लिया था जिसके लिए पंजीकरण जरूरी हो, तो उसका जवाब “नहीं” था। इसके साथ ही, पंजीकरण की अनिवार्यता से 60 दिन पहले की अवधि में आरएसएस के लिए किसी गतिविधि के संबंध में कोई पैसा या मूल्यवान वस्तु प्राप्त करने अथवा खर्च करने के सवाल पर भी समूह ने स्पष्ट रूप से “नहीं” में उत्तर दिया।
पंजीकरण से जुड़े ‘एक्ज़िबिट ए’ अनुलग्नक में, समूह ने आरएसएस का वर्णन एक “गैर-निगमित भारत-आधारित व्यक्तियों के निकाय या स्वैच्छिक संघ” के रूप में किया है, जो हिंदू सांस्कृतिक, समाज सेवा, शैक्षिक, नागरिक और वैचारिक गतिविधियों में लगा हुआ है। इसमें आगे कहा गया है कि आरएसएस स्थानीय सदस्य समूहों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करता है, सामुदायिक सेवा एवं राहत पहलों का समर्थन करता है, और सामाजिक तथा हिंदू सांस्कृतिक दर्शन को बढ़ावा देता है।
गौरतलब है कि 25 अगस्त को मोहन भागवत ने अमेरिका की यात्रा की थी। इस दौरे का मुख्य आकर्षण चार दिन बाद मैडिसन स्क्वायर गार्डन में उनका दिया गया भाषण था। इस कार्यक्रम की न्यूयॉर्क शहर के मेयर जोहरान ममदानी ने पहले ही कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि वह इस सभा का समर्थन नहीं करते, क्योंकि उनके अनुसार आरएसएस भारत के एक बहिष्करण दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है।
इस यात्रा के बाद ‘अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग’ (USCIRF) ने वाशिंगटन से आरएसएस सदस्यों पर लक्षित प्रतिबंध लगाने और भागवत का वीजा रद्द करने की मांग भी कर डाली। आयोग ने आरोप लगाया कि आरएसएस से जुड़े समूहों के सदस्यों ने ईसाइयों, दलितों, मुसलमानों और सिखों सहित धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले किए हैं।
इस पूरे मामले पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपनी कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि USCIRF एक पक्षपाती संगठन है। मंत्रालय ने यह भी जोड़ा कि यह आयोग पिछले कई वर्षों से भारत के बारे में लगातार भ्रामक और भड़काऊ बयानबाजी कर रहा है।
उक्त लेख मूल रूप से द वायर वेबसाइट द्वारा पूर्व में प्रकाशित की जा चुकी है.
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