खेतों में अल नीनो के कारण कम बारिश का असर अब साफ दिखने लगा है। पिछले साल के मुकाबले इस बार यूरिया समेत सभी घरेलू उर्वरकों की बिक्री में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।
खरीफ बुवाई के मौसम यानी अप्रैल-सितंबर 2026 के दौरान बिक्री के आंकड़े काफी निराशाजनक रहे हैं। इस अवधि में अप्रैल-सितंबर 2025 की तुलना में कॉम्प्लेक्स फर्टिलाइजर्स (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सल्फर के मिश्रण) की बिक्री सबसे तेजी से 22.2% गिरी है।
अन्य खादों की मांग पर भी बुरा असर पड़ा है। एमओपी (म्यूरेट ऑफ पोटाश) की बिक्री में 11.7% की कमी आई है। वहीं, डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) और एसएसपी (सिंगल सुपर फॉस्फेट) की बिक्री में गिरावट थोड़ी कम रही, जो क्रमशः 0.6% और 1.4% दर्ज की गई है।
सबसे ज्यादा चिंताजनक स्थिति यूरिया की है। फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल-सितंबर 2026 के दौरान यूरिया के उत्पादन में 4.3% और आयात में 40.5% की वृद्धि हुई है।
सरकार ने घरेलू यूरिया निर्माताओं के लिए लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का आयात बढ़ाने के काफी प्रयास किए हैं। ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से कतर और यूएई से सप्लाई घटी है।
इसकी भरपाई के लिए अमेरिका, नाइजीरिया, ओमान, अंगोला, कैमरून, ऑस्ट्रेलिया और नॉर्वे से गैस मंगाने पर जोर दिया गया। सरकार ने खादों के सीधे आयात के लिए अंतरराष्ट्रीय टेंडर भी जारी किए हैं।
आपूर्ति बढ़ने के बावजूद, यूरिया की बिक्री में साल-दर-साल आधार पर 4.1% की कमी आई है। यह 2021-22 के बाद पहली गिरावट है। पिछले वित्त वर्ष 2025-26 (अप्रैल-मार्च) में यूरिया की रिकॉर्ड 39.6 मिलियन टन बिक्री हुई थी।
एक उद्योग सूत्र के अनुसार, इस गिरावट का मुख्य कारण दक्षिणी राज्यों, महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ, गुजरात के सौराष्ट्र और कच्छ, राजस्थान, दक्षिण बिहार और असम में बारिश की कमी है। इसी वजह से किसानों की मांग घट गई है।
पिछले साल 45 किलो यूरिया के बैग का आधिकारिक अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) 266.50 रुपये था, लेकिन किसानों ने इसके लिए 350-450 रुपये तक चुकाए थे। इस बार यूरिया की कोई कमी नहीं होने और मांग घटने से कालाबाजारी का रेट 300 रुपये के भीतर ही सिमट गया है।
इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून-सितंबर) के दौरान देशभर में सामान्य से 12.6% कम बारिश हुई है। वहीं, अक्टूबर महीने में भी अब तक बारिश में 51.8% की कमी दर्ज की गई है।
वैश्विक मौसम एजेंसियों का अनुमान है कि जनवरी-मार्च 2027 तक अल नीनो का प्रभाव बेहद मजबूत बना रहेगा। अप्रैल-मई के आसपास इसके कमजोर पड़ने की उम्मीद है।
सर्दियों में कम बारिश और अल नीनो के कारण बढ़ते तापमान का असर आगामी रबी सीजन पर पड़ सकता है। इससे सर्दियों और वसंत की फसलों के साथ-साथ उर्वरकों की मांग प्रभावित होने की आशंका है।
सरकार का पूरा ध्यान अब केवल यूरिया और डीएपी पर केंद्रित है। उद्योग सूत्र बताते हैं कि फरवरी-मार्च में होने वाले उत्तर प्रदेश और पंजाब विधानसभा चुनावों को देखते हुए सरकार इन राजनीतिक रूप से संवेदनशील खादों की कोई किल्लत नहीं होने देना चाहती।
डीएपी की आपूर्ति की स्थिति अभी काफी हद तक संतोषजनक है। इसकी 50 किलो की बोरी सरकार द्वारा नियंत्रित 1,350 रुपये की एमआरपी के आसपास ही बिक रही है।
हालांकि, डीएपी के इन दामों का असर कॉम्प्लेक्स फर्टिलाइजर्स की बिक्री पर पड़ रहा है। ‘20:20:0:13’ ग्रेड वाले कॉम्प्लेक्स खाद के बैग की एमआरपी लगभग 2,100 रुपये चल रही है। वहीं ‘12:32:16’ और ‘10:26:26’ एनपीकेएस (NPKS) ग्रेड की कीमत 2,400 रुपये प्रति बैग है।
कॉम्प्लेक्स फर्टिलाइजर्स की बिक्री मांग और आपूर्ति दोनों मोर्चों पर जूझ रही है। एक तरफ सूखा है और दूसरी तरफ सरकार ने डीएपी का एमआरपी कृत्रिम रूप से कम रखा है, जबकि इसमें 46% फास्फोरस और 18% नाइट्रोजन होता है।
इसके अलावा बाज़ार में सल्फर की भी भारी कमी देखी जा रही है। बिना सल्फर के फास्फोरस वाले कॉम्प्लेक्स उर्वरक या एसएसपी का निर्माण संभव नहीं है।
एफएआई (FAI) के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-सितंबर 2025 के मुकाबले अप्रैल-सितंबर 2026 में कॉम्प्लेक्स उर्वरकों और एसएसपी के घरेलू उत्पादन में क्रमशः 35.5% और 10.4% की भारी गिरावट आई है।
उत्पादन में यह गिरावट मुख्य रूप से सल्फर की आसमान छूती आयात कीमतों के कारण हुई है। एक साल पहले जो सल्फर 300-400 डॉलर प्रति टन था, वह अब 1,000-1,100 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गया है।
सल्फर असल में ऑयल रिफाइनिंग और प्राकृतिक गैस प्रसंस्करण का एक बायप्रोडक्ट है। युद्ध से पहले भारत मुख्य रूप से सऊदी अरामको, कतर-एनर्जी और अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी से सल्फर खरीदता था। अब ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों से इन कंपनियों की सुविधाओं को काफी नुकसान पहुंचा है।
सूखे और मौसम की यह मार सिर्फ खादों तक सीमित नहीं है। सितंबर महीने में ट्रैक्टरों की घरेलू बिक्री भी 18.1% गिरकर 1,19,667 यूनिट रह गई है। पिछले साल इसी महीने में 1,46,180 ट्रैक्टर बिके थे।
साल 2025-26 में कुल 11.60 लाख ट्रैक्टरों की रिकॉर्ड बिक्री हुई थी। इस वित्त वर्ष के पहले छह महीनों (अप्रैल-सितंबर 2026) में भी पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 8% की संचयी वृद्धि दर्ज की गई थी।
हालांकि, एक प्रमुख ट्रैक्टर कंपनी के अधिकारी ने बताया कि सितंबर की बिक्री में गिरावट का मुख्य कारण त्योहारी सीजन के कैलेंडर में बदलाव और बेस इफेक्ट है।
अधिकारी ने बताया कि पिछले साल 9 अगस्त को रक्षाबंधन के साथ ही सीजन जल्दी शुरू हो गया था और 2 अक्टूबर तक दशहरा खत्म हो गया था। इस बार 28 अगस्त को रक्षाबंधन और 20 अक्टूबर को दशहरा पड़ा है।
इसके अलावा, सितंबर 2025 में ट्रैक्टरों पर जीएसटी 12% से घटाकर 5% कर दिया गया था। इन दोनों वजहों से पिछले साल सितंबर में ट्रैक्टरों की शिपमेंट 45.4% बढ़ गई थी।
हालांकि, ट्रैक्टर कंपनी के अधिकारी ने इस बात पर भी सहमति जताई कि सूखा अभी भी एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। उन्होंने कहा कि अब यह देखना होगा कि इस वित्त वर्ष के बचे हुए महीनों में बिक्री पर सूखे का कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
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