तगड़े और लंगड़े की लड़ाई

| Updated: June 26, 2021 5:21 pm

राजनीतिक विरासतों को आगे बढ़ाना, बनाए रखना और उम्मीदों को पूरा करना मुश्किल काम है। कांग्रेस ने ग्रैंड ओल्ड पार्टी (जीओपी) के तौर पर अपने संस्थापकों से मिली निधि को आंशिक रूप से खत्म कर दिया है। समाजवादी इतने टुकड़ों में बिखर गए हैं कि यह आकलन कर पाना भी मुश्किल है कि इनमें से किस इकाई को सोशलिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के मूल सिद्धांत और इसके संस्थापकों जयप्रकाश नारायण, बसावन सिंह (सिन्हा), आचार्य नरेंद्र देव और जेबी कृपलानी के नाम भी याद हैं। ऐसा नहीं है कि बाद के दिनों में सामने आए ये दल अपने मूल संगठन के अनजान क्लोन बनकर रह गए हैं। उन्होंने कुछ विशेषताओं को बरकरार रखा है, लेकिन जिस तरह की सत्ता की राजनीति का वे हिस्सा हैं, उसने संस्थापकों के आदर्शों को विकृत कर दिया है और वे उस आदर्शवाद से विचलित हो गए हैं, जो इनकी मूल पहचान थी।

22 जून को जैसे ही पूर्व भाजपा नेता और बाद में तृणमूल कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए यशवंत सिन्हा द्वारा स्थापित राष्ट्र मंच ने विपक्ष को लामबंद किया और दिल्ली में शरद पवार के आवास पर मुलाकात की, राजधानी के टिप्पणीकार तत्काल इसकी तुलना 1977 की जनता पार्टी और 1988 के जनता दल से करने लगे और इसे वर्तमान सत्ता के खिलाफ सबसे अहम और वास्तविक विपक्षी पुनर्गठन बताने लगे। सिन्हा ने कथित तौर पर गैर-भाजपाई धुरी के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया, लेकिन हलचल तब बढ़ गई, जब इसमें पांच कांग्रेस सदस्य भी पहुंच गए। इनमें से तीन कांग्रेसी वे हैं, जो जी -23 का हिस्सा थे। जी-23 उन 23 कांग्रेस नेताओं का समूह है, जिन्होंने कुछ महीने पहले गांधी परिवार के नेतृत्व पर सवाल उठाए थे। इस मुलाकात में सोनिया और राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा को नहीं बुलाया गया और न ही उनके कथित “वफादार” लोगों को।


सिन्हा के संयोजन को लेकर कुछ संदेह हो सकता है, क्योंकि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन का बड़ा हिस्सा भाजपा में बिताया है और अटल बिहारी वाजपेयी के शासन में उस स्तर तक पहुंचे, जहां बहुत कम लोग पहुंच पाए हैं। सिन्हा समाजवादी जनता पार्टी से भाजपा में आए और एक ऐसे राजनीतिक दर्शन का समर्थन किया, जो उदारीकरण और सुधारों के साथ समाजवाद व “स्वदेशी” अर्थशास्त्र को जोड़ता है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक), राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय दल भी इस मुलाकात से गायब थे और असल में इसमें नेताओं की उपस्थिति बहुत कम थी। उमर अब्दुल्ला (नेशनल कॉन्फ्रेंस), जयंत चौधरी (राष्ट्रीय लोक दल) और निश्चित रूप से मेजबान पवार के अलावा समाजवादी पार्टी (सपा) और वाम मोर्चा ने अपने प्रतिनिधि भेजे थे।

यह आधा-अधूरा प्रयास क्या दर्शाता है? पहली बात, भले ही कुछ प्रांतीय दलों, विशेष रूप से द्रमुक, नेकां और राजद ने कांग्रेस विरोधी के रूप में शुरुआत की थी, लेकिन तब से उन्होंने जीओपी के साथ संबंध बेहतर कर लिया है और महसूस किया है कि अगर विपक्ष को एक छत्र की जरूरत है, तो कांग्रेस ही वह भूमिका निभा सकती है, बेशक पार्टी अभी उदासीन है। पवार द्वारा “तीसरे मोर्चे” के नेता का पद संभालने की खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं, लेकिन उनके राकांपा सहयोगी, मजीद मेमम ने यह स्पष्ट कर दिया कि उनके बॉस का भाजपा विरोधी गठबंधन बनाने का कोई इरादा नहीं और न ही उन्होंने बैठक बुलाई थी।

दूसरी बात, द्रमुक और राजद सहयोगी के तौर पर कांग्रेस से जुड़े हैं, तो क्या उनसे तार्किक रूप से साझेदारी को तोड़ने और एक बड़े मोर्चे में शामिल होने की उम्मीद की जा सकती है? तीसरी बात, द्रमुक, राजद और सपा जैसे कुछ गैर-भाजपा दल वर्तमान समय में राकांपा की तुलना में अपने क्षेत्रों में अधिक मजबूती से खड़े हैं। वहीं, राकांपा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन यह है कि वह शिवसेना के गठबंधन की सरकार में है और काफी अंतर के साथ शिवसेना के बाद दूसरे स्थान पर है।

आखिरी बात, 1977 में चुनाव के एलान के समय भारत के बड़े हिस्से में इंदिरा गांधी और आपातकाल के खिलाफ एक अव्यक्त माहौल बना हुआ था। आपातकाल के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से पैदा हुआ विपक्ष, बेशक वह बहुत बड़ा था, उसने इंदिरा विरोधी भावनाओं का सफलतापूर्वक दोहन किया और ऐसा प्रतिरोध खड़ा किया, जिसने इंदिरा को उखाड़ फेंका।


इसी तरह, 1988 में जनता दल जब वीपी सिंह के नेतृत्व में एक मोर्चे में शामिल हुआ, तब तक देश काफी हद तक तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के खिलाफ हो चुका था। वह भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए थे, उनके करीबी सलाहकारों ने उन्हें निराश किया था और अयोध्या के राम मंदिर को ‘मुक्त’ करने के विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के हाई-वोल्टेज अभियान से सामने आए ‘हिंदुत्व’ के मुद्दे पर वह बुरी तरह से लडख़ड़ा गए थे। जनता दल को वाम मोर्चे के साथ सहयोगी के रूप में भाजपा को जोडऩे के लिए मजबूर होना पड़ा। अस्वाभाविक रूप से बना यह गठबंधन लंबे समय तक नहीं चला। 1980 में जैसे वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने आरएसएस की सदस्यता छोडऩे से इन्कार करने के बाद जनता पार्टी सरकार से हाथ खींच लिया था, उसी तरह 1990 में, मंदिर आंदोलन के विरोध के बाद वीपी सिंह सरकार गिर गई।


विपक्षी आंदोलनों के साथ आरएसएस मुख्यरूप से जुड़ा रहा है। 1975 और 1989 में संघ ने विपक्ष के जहाज को स्थिर करने के लिए आधार का काम किया। यह कल्पना करना कठिन है कि संघ की भागीदारी और समर्थन के बिना, समाजवादी गुटों, प्रांतीय दलों और कांग्रेस से छिटके लोगों का असंगत गठबंधन कांग्रेस से लड़ने और उसे उखाड़ फेंकने के लिए कभी एक टिकाऊ मोर्चे के रूप में आकार ले पाता। आज कोई ऐसा संगठन नहीं है जो मोर्चे को संभाल सके।


विधानसभा चुनावों से पहले ममता बनर्जी और एमके स्टालिन को सलाह देने वाले राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने जब हाल में भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती देने वाले तीसरे, चौथे मोर्चे की संभावना से इन्कार किया, तो पवार के आवास पर मौजूद मंडली की प्रासंगिकता कुछ कम हो गई। बैठक से पहले किशोर ने पवार के साथ दो बार मुलाकात की थी।

लेखिका राजनीतिक विश्लेषक और स्तंभकार है

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