नई दिल्ली: जहाँ एक तरफ देश में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के जरिए डिजिटल भुगतान के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं और भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी डिजिटल छाप छोड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ सरकार नकदी के प्रवाह को संतुलित करने के लिए एक नई योजना पर काम कर रही है। आम जनता को छोटे नोटों की किल्लत से बचाने के लिए अब ‘हाइब्रिड एटीएम’ लाने की तैयारी चल रही है।
मंगलवार (27 जनवरी 2026) को सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक, सरकार अर्थव्यवस्था में छोटे मूल्य के नोटों को बढ़ाना चाहती है। इसके तहत ऐसे नए एटीएम लाने पर विचार किया जा रहा है जो केवल 100 या 500 रुपये ही नहीं, बल्कि ₹10, ₹20 और ₹50 के नोट भी दे सकें।
क्या हैं हाइब्रिड एटीएम और कैसे करेंगे काम?
इस योजना का सबसे खास पहलू तथाकथित ‘हाइब्रिड एटीएम’ (Hybrid ATMs) हैं। ये मशीनें सिर्फ पैसे निकालने के काम नहीं आएँगी, बल्कि ये बड़े नोटों के बदले छोटे नोट (Change) देने का काम भी कर सकती हैं।
मामले से जुड़े एक सूत्र ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “मुंबई में एक पायलट प्रोजेक्ट के तहत कम मूल्य वाले नोट देने वाली मशीनों के प्रोटोटाइप का परीक्षण किया जा रहा है।”
योजना के अनुसार, एक बार मंजूरी मिलने के बाद इस सिस्टम को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जाएगा। इन हाइब्रिड एटीएम को विशेष रूप से उन जगहों पर लगाया जाएगा जहाँ लोगों की भीड़ सबसे ज्यादा होती है, जैसे:
- रेलवे स्टेशन और बस डिपो (ट्रांसपोर्ट हब)
- बाजार और मंडियां
- अस्पताल
- सरकारी कार्यालय
साथ ही, यह भी चर्चा है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से छोटे मूल्य के नोटों की छपाई बढ़ाने का आग्रह किया जा सकता है।
₹500 के छुट्टे की समस्या होगी दूर
यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब आम जनता अक्सर रोजमर्रा के छोटे भुगतान के लिए खुल्ले पैसों की कमी से जूझती नजर आती है। बाजार में ₹500 का नोट मूल्य और मात्रा दोनों के हिसाब से सबसे ज्यादा प्रचलन में है, लेकिन दुकानदार अक्सर इसके छुट्टे देने में असमर्थ रहते हैं।
सरकार का यह कदम अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (Informal Economy) और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के लिए वरदान साबित हो सकता है। कई बार नेटवर्क की समस्या के कारण यूपीआई (UPI) काम नहीं करता और हर किसी के पास स्मार्टफोन भी नहीं होता। ऐसे में ‘हार्ड कैश’ ही काम आता है।
इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के मुख्य अर्थशास्त्र (Chief Economist) देवेंद्र पंत ने कहा, “ग्रामीण इलाकों में, विशेषकर अंदरूनी हिस्सों में, व्यापारियों के पास प्रतिदिन होने वाले लेनदेन की संख्या और मूल्य कम होता है। ऐसे में ‘ईज ऑफ लिविंग’ यानी जीवन की सुगमता को बेहतर बनाना सरकार की जिम्मेदारी और प्राथमिकता है।”
डिजिटल इंडिया और नकदी के बीच संतुलन
हालाँकि, छोटे नोटों को बढ़ाना सरकार के डिजिटल भुगतान के एजेंडे के विपरीत लग सकता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह जमीनी हकीकत को देखते हुए जरूरी है।
ग्रांट थॉर्नटन (Grant Thornton) में पार्टनर और फाइनेंशियल सर्विसेज रिस्क लीडर, विवेक अय्यर ने सलाह दी कि इस पहल को बहुत सोच-समझकर लागू करना चाहिए।
उन्होंने कहा, “इस पहल को आदर्श रूप से चुनिंदा स्थानों पर ही तैनात किया जाना चाहिए, क्योंकि बड़े पैमाने पर रोलआउट बैंकों के लिए आर्थिक रूप से महंगा साबित हो सकता है।”
अय्यर ने आगे कहा कि सही दृष्टिकोण यह होगा कि इन मॉडलों को वहां लागू किया जाए जहाँ डिजिटल बुनियादी ढांचा अभी भी विकसित हो रहा है, ताकि डिजिटल भुगतान की परिपक्वता के साथ मुद्रा की उपलब्धता का संतुलन बना रहे।
चुनौतियां अभी बाकी हैं
जानकारों का कहना है कि सिर्फ मशीनें लगाने से समस्या हल नहीं होगी। एक बैंक अधिकारी ने बताया कि हाइब्रिड एटीएम तब तक सफल नहीं होंगे जब तक कि पीछे से छोटे नोटों की पर्याप्त आपूर्ति न हो।
उन्होंने कहा, “छोटे नोटों की छपाई, लॉजिस्टिक्स और उन्हें दोबारा चलन में लाने की व्यवस्था को भी साथ-साथ बढ़ाना होगा।”
साथ ही, जिन इलाकों में यूपीआई नेटवर्क कमजोर है, वहां एटीएम कनेक्टिविटी भी एक चुनौती हो सकती है।
अब देखना यह होगा कि मुंबई में चल रहा पायलट प्रोजेक्ट कितना सफल होता है और कब तक ये हाइब्रिड मशीनें आम जनता की सहूलियत के लिए बाजारों में दिखाई देती हैं।
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