गुजरात में साइबर अपराध के मामले बेहद चौंकाने वाली रफ्तार से बढ़ रहे हैं। राज्य में 1 जनवरी से 31 जुलाई 2026 के बीच साइबर ठगी के कुल 1,06,882 मामले दर्ज किए गए हैं। इन आंकड़ों का सीधा मतलब है कि पुलिस के पास हर दिन औसतन 504 शिकायतें पहुंच रही हैं, यानी हर एक घंटे में लगभग 21 लोग साइबर फ्रॉड का शिकार बन रहे हैं।
सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, गुजरात में ओटीपी (OTP) आधारित फ्रॉड सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरा है। इस सात महीने की अवधि में अकेले ओटीपी फ्रॉड के सबसे ज्यादा 26,041 मामले दर्ज किए गए हैं। इसके बाद फर्जी पहचान (फेक आइडेंटिटी) बनाकर ठगने के मामलों का नंबर आता है, जिनकी संख्या 21,023 रही है।
लोग जल्द अमीर बनने और जरूरत के समय पैसों की लालच में भी आसानी से जालसाजों के बिछाए जाल में फंस रहे हैं। निवेश और शेयर बाजार से जुड़े फर्जीवाड़े के 7,228 मामले सामने आए हैं। वहीं, लोन एप्लिकेशन से संबंधित धोखाधड़ी की 5,110 शिकायतें दर्ज की गई हैं।
हालांकि, ऑनलाइन शॉपिंग में होने वाले फर्जीवाड़े के आंकड़ों में थोड़ी विसंगति देखने को मिली है। विस्तृत रिपोर्ट में जहां इस तरह के 5,084 मामलों का जिक्र है, वहीं संलग्न तालिका में यह संख्या 15,084 बताई गई है। इस अंतर को स्पष्ट करने के लिए आधिकारिक डेटासेट से इसकी पुष्टि करना आवश्यक है।
साइबर अपराधी अब केवल तकनीकी कमियों का फायदा नहीं उठा रहे हैं, बल्कि वे लोगों के भरोसे और उनके व्यवहार से खेल रहे हैं। ओटीपी फ्रॉड में अक्सर जालसाज खुद को किसी बैंक, डिजिटल वॉलेट या ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म का प्रतिनिधि बताते हैं। इस तरह वे मीठी बातों में उलझाकर पीड़ितों से उनकी गोपनीय जानकारी हासिल कर लेते हैं।
फर्जी पहचान वाले मामलों में भी कुछ ऐसा ही तरीका अपनाया जाता है। ठग किसी परिचित, संस्था या सर्विस प्रतिनिधि का रूप धरकर लोगों का विश्वास जीतते हैं। एक बार भरोसा कायम होने के बाद वे पैसे, बैंकिंग क्रेडेंशियल या अन्य संवेदनशील जानकारियां चुराने की कोशिश करते हैं।
निवेश के नाम पर होने वाले घोटालों में अक्सर असामान्य रूप से भारी मुनाफे का लालच दिया जाता है। दूसरी तरफ, लोन से जुड़े फ्रॉड में लोगों की तत्काल आर्थिक मदद की जरूरत का फायदा उठाया जाता है। इन मामलों में अपराधी डिजिटल उपकरणों के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक दबाव और झूठे आश्वासनों का बखूबी इस्तेमाल करते हैं।
महिलाओं और नाबालिगों को निशाना बनाने वाले साइबर अपराध भी एक गंभीर चिंता का विषय बन चुके हैं। पुलिस डेटा के अनुसार, इस दौरान एस्कॉर्ट फ्रॉड के 1,257 और ब्लैकमेलिंग के 847 मामले सामने आए हैं। इसके अलावा फर्जी फेसबुक और सोशल मीडिया पहचान से जुड़े 495 केस दर्ज किए गए हैं।
न्यूड वीडियो-कॉल के जरिए ब्लैकमेल करने के 493 और मैट्रिमोनियल (वैवाहिक) फ्रॉड के 241 मामले रिकॉर्ड हुए हैं। कुल मिलाकर इन श्रेणियों में 3,333 शिकायतें मिली हैं। उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट होता है कि न्यूड वीडियो-कॉल फ्रॉड और ब्लैकमेलिंग के मामलों में मुख्य रूप से महिलाओं को निशाना बनाया गया है।
जाने-माने साइबर अपराध विशेषज्ञ और पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह ने इस बदलते ट्रेंड को लेकर अहम बातें कही हैं। उनका कहना है कि साइबर अपराधी अब पूरी तरह से तकनीकी खामियों पर निर्भर नहीं हैं। जालसाज अब डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए पीड़ितों की भावनाओं, उनके विश्वास, डर और लालच का फायदा उठाकर उन्हें अपने जाल में फंसाते हैं।
अज्ञात लोगों के साथ ओटीपी, बैंकिंग डिटेल्स या अन्य संवेदनशील जानकारी साझा करना लोगों को भारी वित्तीय और निजता के जोखिम में डाल सकता है। सात महीनों के ये आंकड़े इस बात का सबूत हैं कि डिजिटल अपराध की पहुंच कितनी तेजी से बढ़ रही है।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों की साफ सलाह है कि किसी भी अनजान व्यक्ति के साथ अपना ओटीपी, बैंकिंग पासवर्ड या कार्ड की जानकारी शेयर न करें। इसके अलावा सोशल मीडिया पर मिलने वाले संदिग्ध लिंक, अनजान मोबाइल एप्लिकेशन, फर्जी कस्टमर-केयर नंबरों और अनचाहे संदेशों से हमेशा सावधान रहना चाहिए।
गुजरात के ये ताजा आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि साइबर अपराध अब केवल एक तकनीकी चुनौती नहीं रह गया है। यह हमारी रोजमर्रा की डिजिटल और वित्तीय गतिविधियों से जुड़ा एक बेहद गंभीर खतरा बन चुका है। ओटीपी फ्रॉड, फर्जी पहचान, निवेश घोटालों और महिलाओं के खिलाफ होने वाले साइबर अपराधों से निपटने के लिए कड़ी निगरानी की आवश्यकता है। इसके साथ ही डिजिटल सेवा प्रदाताओं और प्रवर्तन एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल होना भी बेहद जरूरी है।
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