अहमदाबाद। गुजरात हाईकोर्ट ने राज्य के धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत दर्ज एक एफआईआर को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया है। यह मामला आशा सुपरवाइजर नम्रता मैकवान से जुड़ा है, जिन पर अपने अधीन काम करने वाली हिंदू महिलाओं के बीच ईसाई धर्म का प्रचार करने का गंभीर आरोप है। इसके अलावा उन पर महिलाओं को जबरन एक धार्मिक कार्यक्रम में शामिल करने का भी आरोप लगा है।
खंभात ग्रामीण पुलिस ने एक आशा वर्कर की शिकायत के बाद नम्रता के खिलाफ गुजरात धर्म स्वतंत्रता अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया था। शिकायत में कहा गया था कि नम्रता मैकवान और चार अन्य लोगों ने मूर्ति पूजा की कड़ी निंदा की। साथ ही वर्करों को बाइबिल व अन्य ईसाई साहित्य पढ़ने के अलावा ईसाई धर्म को बढ़ावा देने वाले वीडियो देखने के लिए भी मजबूर किया गया।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि नम्रता ने उनकी बात न मानने पर वेतन में कटौती करने की धमकी दी थी। इसके अलावा, वडोदरा में आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम को विभागीय बैठक बताकर उन्हें धोखे से वहां बुलाया गया था। पुलिस के अनुसार, ये कथित घटनाएं साल 2022 से 2024 के बीच हुईं, जबकि इस मामले में नवंबर 2025 में एफआईआर दर्ज की गई थी।
बाद में पुलिस ने इस मामले में अपनी विस्तृत चार्जशीट भी दाखिल की। इसमें एक बड़ा खुलासा करते हुए बताया गया कि नम्रता का परिवार ‘यहोवा विटनेस ऑफ इंडिया’ (Jehovah’s Witnesses of India) नामक संस्था से जुड़ा हुआ था। पुलिस की जांच में सामने आया कि आरोपी के परिवार को इस संगठन से 30 करोड़ रुपये से अधिक की भारी-भरकम धनराशि प्राप्त हुई थी।
इस एफआईआर को रद्द करवाने के लिए नम्रता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अदालत में उनका तर्क था कि वह ‘यहोवा विटनेस’ आस्था को मानती हैं और संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत उन्हें अपने धर्म के प्रचार का मौलिक अधिकार है। उनके वकील ने दलील दी कि इस मामले में कोई जोर-जबरदस्ती, लालच या धोखाधड़ी नहीं की गई है और न ही धर्मांतरण का कोई प्रयास हुआ है।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि शिकायतकर्ता को दूसरों की ओर से शिकायत करने का कोई कानूनी अधिकार (locus) नहीं है। साथ ही अधिनियम की धारा 6 के तहत पूर्व मंजूरी के अभाव में यह मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। नम्रता ने दावा किया कि यह शिकायत घटनाओं के एक साल से अधिक समय बाद दर्ज कराई गई है, जो कि पूरी तरह से व्यक्तिगत रंजिश का परिणाम है, क्योंकि उन्होंने बतौर सुपरवाइजर शिकायतकर्ता के काम में कमियां निकाली थीं।
वहीं, राज्य सरकार ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया और अदालत को बताया कि जांच के दौरान मिले सबूत एक स्पष्ट संज्ञेय अपराध की ओर इशारा करते हैं। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस एम. के. ठक्कर ने मामले में अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जांच सामग्री का अध्ययन करने से पता चलता है कि आरोपी ने आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को अपना निशाना बनाया और उनकी वित्तीय मजबूरियों का फायदा उठाया।
जस्टिस ठक्कर ने आगे कहा कि कमरे के दरवाजे बंद करके हिंदू धर्म में मूर्ति पूजा की आलोचना की गई और ईसाई धर्म का प्रचार किया गया। इसके अलावा, वडोदरा के कार्यक्रम में मौजूद लोगों के अनुभवों के जरिए धर्मांतरण के कथित फायदे भी गिनाए गए।
अदालत ने माना कि यह प्रथम दृष्टया गुजरात धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2003 के प्रावधानों के तहत एक संज्ञेय अपराध है। इन टिप्पणियों के साथ ही हाईकोर्ट ने नम्रता की याचिका खारिज कर दी। हालांकि, अदालत ने उन्हें निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) के समक्ष अपने बचाव के सभी कानूनी और स्वीकार्य तर्क रखने की अनुमति दे दी है।
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