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बंदरगाहों के बाद अब शिपयार्ड क्रांति पर गुजरात का दांव: सीएम भूपेंद्र पटेल ने की ‘शिपबिल्डिंग पॉलिसी 2026’ की घोषणा

| Updated: July 28, 2026 13:44

गुजरात को ग्लोबल मैरीटाइम हब बनाने की दिशा में सीएम भूपेंद्र पटेल का बड़ा कदम; पोरबंदर के कुछाड़ी में बनेगा मेगा क्लस्टर, 27 हजार करोड़ रुपये के निवेश की उम्मीद।

गांधीनगर: गुजरात सरकार ने राज्य को समुद्री विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनाने की दिशा में एक बड़ा और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने राज्य की नई ‘जहाज निर्माण और मरम्मत नीति 2026’ (Shipbuilding and Repair Policy, 2026) का औपचारिक अनावरण किया है।

इस नीति का मुख्य लक्ष्य 50 लाख डेडवेट टन (DWT) की पोत निर्माण क्षमता हासिल करना और क्षेत्र में 27,000 करोड़ रुपये से अधिक का विशाल निवेश आकर्षित करना है।

नीति का शुभारंभ करते हुए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने कहा कि इसका उद्देश्य समुद्री उपकरणों के निर्माण, अनुसंधान एवं विकास, कौशल विकास और हरित व स्मार्ट शिपयार्ड को बढ़ावा देना है। राज्य सरकार इसके माध्यम से भविष्य की जरूरतों के अनुकूल एक मजबूत और आधुनिक मैरीटाइम इकोसिस्टम तैयार करने पर जोर दे रही है।

इस नई नीति का सबसे प्रमुख आकर्षण पोरबंदर जिले के कुछाड़ी में बनने वाला मेगा ग्रीनफील्ड शिपबिल्डिंग क्लस्टर है, जिसे केंद्र सरकार की ओर से स्वीकृति मिल चुकी है। गुजरात मैरिटाइम बोर्ड (GMB) इस परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करेगा, जिसके बाद निर्माण का काम शुरू होगा।

कुछाड़ी में बनने वाले इस क्लस्टर में दो से तीन विश्वस्तरीय शिपयार्ड और उनसे जुड़े सहायक उद्योगों का एक पूरा नेटवर्क स्थापित किया जाएगा। इस परियोजना में लगभग 23,700 करोड़ रुपये का निजी निवेश आने की उम्मीद जताई गई है।

इसके साथ ही, जहाज निर्माण विकास योजना (SbDS) के तहत केंद्र और राज्य सरकार के साझा वित्तीय सहयोग से लगभग 3,300 करोड़ रुपये की सामान्य बुनियादी ढांचा सुविधाएं विकसित की जाएंगी। इन दोनों को मिलाकर इस पूरी परियोजना का कुल निवेश 27,000 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच जाएगा।

नीति के तहत आधुनिक बुनियादी ढांचे से लैस दो एकीकृत मेगा शिपबिल्डिंग पार्क भी बनाए जाएंगे। इन पार्कों में समुद्री उपकरण निर्माण क्लस्टर, उन्नत परीक्षण सुविधाएं, लॉजिस्टिक्स सपोर्ट, आर एंड डी सेंटर और प्रशिक्षण संस्थान स्थापित किए जाएंगे।

राज्य सरकार का मानना है कि यह एकीकृत व्यवस्था परियोजनाओं की लागत को कम करेगी और कार्यान्वयन की गति को तेज करेगी। निवेशकों को आकर्षित करने के लिए इस नीति में कई वित्तीय और गैर-वित्तीय प्रोत्साहन शामिल किए गए हैं, साथ ही निर्धारित समय सीमा में काम शुरू करने वाले शुरुआती निवेशकों को अतिरिक्त लाभ भी दिए जाएंगे।

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