अहमदाबाद: कर चोरी की आशंकाओं पर लगाम लगाने के उद्देश्य से आयकर विभाग ने एक अहम बदलाव किया है। इस साल से प्रिजम्प्टिव टैक्स स्कीम (अनुमानित कराधान योजना) को चुनने वाले छोटे कारोबारियों और पेशेवरों को अपने आयकर रिटर्न में निवेश की पूरी जानकारी देनी होगी। यह कदम नियमों के अनुपालन को और सख्त बनाने के लिए उठाया गया है।
केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने हाल ही में प्रिजम्प्टिव टैक्स स्कीम के तहत रिटर्न दाखिल करने वाले करदाताओं के लिए नया ITR-4 (सुगम) फॉर्म जारी किया है। इसी फॉर्म में निवेश के खुलासे की यह नई शर्त अनिवार्य की गई है।
यह नियम 2 करोड़ रुपये तक के सालाना टर्नओवर वाले व्यवसायों और 75 लाख रुपये तक की सकल प्राप्ति (ग्रॉस रिसीट्स) वाले पेशेवरों पर लागू होता है। इसके दायरे में मुख्य रूप से डॉक्टर, चार्टर्ड अकाउंटेंट, वकील, आर्किटेक्ट और कंसलटेंट जैसे पेशेवर आते हैं।
प्रिजम्प्टिव टैक्स स्कीम छोटे करदाताओं को टर्नओवर के एक निश्चित प्रतिशत पर अपनी आय घोषित करने की सुविधा देती है। इसके तहत पात्र करदाताओं को अनिवार्य बहीखाता रखने और ऑडिट कराने के झंझट से मुक्ति मिल जाती है।
नियमों के अनुसार, डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक मोड से होने वाली कमाई पर व्यवसायों को टर्नओवर का न्यूनतम 6% मुनाफा घोषित करना अनिवार्य है। वहीं, नकद लेनदेन के मामले में यह सीमा 8% तय की गई है।
दूसरी ओर, पेशेवरों को अपनी कुल प्राप्तियों का 50% हिस्सा आय के रूप में दिखाना होता है। यदि कोई करदाता इन तय दरों से कम मुनाफा दिखाता है, तो उसे अपने खातों का अनिवार्य रूप से ऑडिट कराना पड़ता है। हालांकि, मुनाफा अधिक होने पर उसी के अनुसार कर का भुगतान करना होता है।
कर विशेषज्ञों का मानना है कि आयकर विभाग अब उन लोगों पर पैनी नजर रख रहा है जो अपनी कर देनदारी कम करने के लिए इस योजना का दुरुपयोग करते हैं। कुछ करदाता जानबूझकर वास्तविक से कम मुनाफा दिखाकर टैक्स बचाने की कोशिश करते हैं।
टैक्स विशेषज्ञ मुकेश पटेल के अनुसार, आयकर विभाग अब काफी अधिक सतर्क हो गया है। इस योजना के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल करके टैक्स बचाने की किसी भी कोशिश को पकड़ना अब विभाग का मुख्य लक्ष्य है।
पटेल ने बताया कि यह पहली बार है जब आयकर विभाग ने प्रिजम्प्टिव टैक्स रिटर्न में 31 मार्च 2026 तक के निवेश से जुड़े विवरण सीधे तौर पर मांगे हैं। इससे कर व्यवस्था में अधिक पारदर्शिता आने की उम्मीद है।
निवेश की जानकारी मांगने से कर अधिकारियों को घोषित आय और निवेश के पैटर्न की तुलना करने में मदद मिलेगी। इससे उन मामलों की आसानी से पहचान हो सकेगी जहां खर्च या संपत्ति का निर्माण करदाता द्वारा बताई गई कमाई से कहीं अधिक प्रतीत होता है।
इसके अलावा, वार्षिक सूचना विवरण (AIS) भी कर अधिकारियों को बड़ी मदद पहुंचाता है। इसके जरिए करदाता द्वारा घोषित आय और उसके द्वारा किए गए निवेश का सटीक मिलान किया जा सकता है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि आय की गलत जानकारी देने पर भारी जुर्माना लग सकता है। ऐसा करने पर देय कर (टैक्स पेएबल) का 200% जुर्माना लगाया जाता है। इसके साथ ही लागू कर, सरचार्ज और सेस मिलाकर कुल 39% हो जाता है।
मुकेश पटेल ने स्पष्ट किया कि जब भी इस तरह की अघोषित आय पकड़ी जाती है, तो स्थिति काफी गंभीर हो सकती है। ऐसी स्थिति में करदाता पर कर और जुर्माने का संयुक्त बोझ गलत बताई गई आय का 117% तक पहुंच जाता है।
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