comScore बंगाल चुनाव: झालमुड़ी से लेकर मछली तक, अपनी 'बाहरी' छवि मिटाने की जुगत में भाजपा - Vibes Of India

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बंगाल चुनाव: झालमुड़ी से लेकर मछली तक, अपनी ‘बाहरी’ छवि मिटाने की जुगत में भाजपा

| Updated: April 22, 2026 15:34

मछली और झालमुड़ी के जरिए बंगाली संस्कृति से जुड़ने की कोशिश, जानिए टीएमसी के 'बाहरी' वाले तंज की क्या काट ढूंढ रही है बीजेपी।

पश्चिम बंगाल के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी इस बार काफी सतर्क नजर आ रही है। भगवा दल उन पुरानी गलतियों को दोहराने से बच रहा है, जिसका भारी नुकसान उसे पिछले चुनावों में उठाना पड़ा था। इसके बावजूद, राज्य में पार्टी की ‘बाहरी’ होने की छवि अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

कोलकाता की बिधाननगर सीट से भाजपा उम्मीदवार शरद्वत मुखोपाध्याय के चुनाव प्रचार का तरीका इन दिनों चर्चा का विषय है। पेशे से ऑन्कोलॉजिस्ट रह चुके 56 वर्षीय मुखोपाध्याय जब एक बड़ी कतला मछली के साथ घर-घर जाकर वोट मांगने निकले, तो उनसे इस अजीबोगरीब तरीके पर सवाल किया गया। अपना बचाव करते हुए उन्होंने तर्क दिया कि राजनीति में हर चीज का कोई न कोई अर्थ होता है।

मुखोपाध्याय का कहना था कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मतदाताओं के बीच यह झूठ फैला रही हैं कि अगर भाजपा सत्ता में आई तो वह मछली पर प्रतिबंध लगा देगी। ऐसे में बंगाली समुदाय को यह विश्वास दिलाने के लिए कि भाजपा उनकी खान-पान की आदतों का सम्मान करती है, हाथ में मछली लेकर चलना उन्हें सबसे प्रभावी और करारा जवाब लगा।

उनके इस अनूठे कदम ने पिछले महीने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में ला दिया। देखते ही देखते कई अन्य भाजपा नेताओं की चुनाव प्रचार के दौरान या टीवी साक्षात्कारों में मछली ले जाने और खाने की तस्वीरें सामने आने लगीं। स्पष्ट रूप से मुखोपाध्याय ने एक ऐसा चलन शुरू कर दिया था, जिसे पार्टी के अन्य नेताओं ने भी हाथों-हाथ लिया।

दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा पर अपने हमले और तेज कर दिए। उन्होंने अपने इस आरोप को दोहराना शुरू कर दिया कि सत्ता में आने पर भाजपा बंगाल में मछली खाने पर रोक लगा सकती है। अपने दावों को पुख्ता करने के लिए तृणमूल नेता बिहार और अन्य भाजपा शासित राज्यों का उदाहरण देते हैं, जहां मांस और विशेष रूप से गोमांस की बिक्री पर सख्त पाबंदियां हैं।

इस चुनाव में बंगाली पहचान और संस्कृति को लेकर दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच यह कोई इकलौता टकराव नहीं है। भाजपा ने खुद को ‘बाहरी’ बताए जाने की तृणमूल की कोशिशों का मुकाबला करने के लिए रक्षात्मक और आक्रामक, दोनों तरह की रणनीतियां अपनाई हैं।

रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी झारग्राम में झालमुड़ी की एक दुकान पर रुककर मुरमुरे से बना यह लोकप्रिय बंगाली स्नैक खरीदा था। पार्टी अपनी ‘बाहरी’ छवि को मिटाने का हर संभव प्रयास कर रही है। हालांकि, पार्टी के अंदरूनी सूत्रों, मतदाताओं और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की यह छवि अभी भी पूरी तरह से दूर नहीं हुई है।

भाजपा नेताओं का दृढ़ता से दावा है कि मछली पर प्रतिबंध लगाने का कोई सवाल ही नहीं उठता। उनका तर्क है कि पार्टी ने उन राज्यों में भी ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है, जहां वह सालों से सत्ता में है।

मुखोपाध्याय ने त्रिपुरा का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां लगभग एक दशक से भाजपा का शासन है और बंगाल के बाद वहां सबसे ज्यादा मछली खाने वाली आबादी निवास करती है। उन्होंने सवाल किया कि क्या वहां मछली पर कोई रोक लगी है? उनका आरोप है कि ममता बनर्जी जानबूझकर एक गैर-मुद्दे को बड़ा मुद्दा बना रही हैं।

हालांकि, तृणमूल कांग्रेस इन आरोपों को भुनाने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। राज्य की सत्ताधारी पार्टी अपने सोशल मीडिया पेजों पर ‘जोदी तारा अशे’ (अगर वे आते हैं) नाम से एक वीडियो सीरीज चला रही है। हर कुछ दिनों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा बनाए गए छोटे वीडियो पोस्ट किए जाते हैं, जिनमें यह डराने की कोशिश की जाती है कि भाजपा शासित बंगाल का माहौल कैसा होगा।

पिछले हफ्ते जारी किए गए ऐसे ही एक वीडियो में भगवा गमछा पहने और हाथ में लाठियां लिए कुछ लोगों को मछली ले जा रहे एक ट्रक को रोकते हुए दिखाया गया था। वीडियो में वे लोग ड्राइवर से कहते हैं कि उसे यहां मछली बेचने के लिए गुजरात और दिल्ली से अनुमति लेनी होगी।

कोलकाता के मध्यमवर्गीय मतदाता भले ही इस तरह के प्रचार से पूरी तरह प्रभावित न हों, लेकिन पत्रकार सायनतन घोष का मानना है कि यह मामला सिर्फ मछली तक सीमित नहीं है। हाल ही में ‘बैटलग्राउंड बंगाल’ नामक पुस्तक लिखने वाले घोष के अनुसार, ग्रामीण बंगाल के मतदाताओं के लिए यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है क्योंकि वहां बड़ी आबादी अपने भोजन के लिए मांस पर निर्भर है।

घोष ने नवरात्र का उदाहरण देते हुए समझाया कि उस दौरान दिल्ली और अन्य कई जगहों पर लोग मांस नहीं खाते हैं। अगर उसी तर्ज पर पश्चिम बंगाल में भी कुछ दिनों के लिए मांस की बिक्री पर रोक लगा दी जाए, तो हर ग्रामीण परिवार प्रभावित होगा। ग्रामीणों के मन में यही डर बैठा हुआ है।

घोष का मानना है कि भाजपा भी इस बात को भली-भांति समझती है कि इस तरह के डर का मतदाताओं पर क्या असर हो सकता है। यही कारण है कि मुखोपाध्याय जैसे पूरी तरह से बंगाली उपनाम वाले उम्मीदवार भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों को साबित करने के लिए मछली का प्रदर्शन कर रहे हैं।

तृणमूल के संदेशों का जवाब देने के अलावा, भाजपा ने इस मुद्दे पर अपना खुद का आक्रामक अभियान भी शुरू कर दिया है। ९ अप्रैल को अपनी एक चुनावी रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने खुद मछली का मुद्दा उठाया था। उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए कहा था कि यह बेहद दुखद है कि राज्य में १५ साल के शासन के बावजूद बंगाल को आज भी अन्य राज्यों से मछली मंगवानी पड़ती है।

यह रणनीति भाजपा के उस व्यापक आरोप से भी मेल खाती है जिसमें वह लगातार कहती रही है कि तृणमूल के शासन में बंगाल का आर्थिक तौर पर भारी पतन हुआ है। प्रदेश भाजपा के नेता भी इसी लाइन पर बयानबाजी कर रहे हैं।

कोलकाता की मानिकतला सीट से भाजपा के उम्मीदवार तापस रॉय ने सवाल उठाया कि क्या ममता के राज में रहने वाले बंगाली आम लोग मांस और अंडे खरीदने की हैसियत रखते हैं? रॉय का कहना है कि लोगों के पास रोजगार नहीं है, उनकी जेबें खाली हैं, तो वे मांस या अंडे कैसे खाएंगे। उनका तंज था कि राज्य में ये सब चीजें केवल तृणमूल के नेता ही खा रहे हैं।

इन राजनीतिक दावों के बीच, रॉय ने खुले तौर पर यह स्वीकार किया कि पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए ‘बाहरी’ होने का ठप्पा एक वास्तविक समस्या है। २०२१ के चुनावों में पार्टी ने अपने अभियान को संभालने के लिए कैलाश विजयवर्गीय जैसे हिंदी भाषी बड़े नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी थी। इससे तृणमूल को उन्हें ‘बोहिरागोतो’ (बाहरी) पार्टी कहकर प्रचारित करने का बड़ा मौका मिल गया था।

इस बार हालांकि अन्य राज्यों के नेता भाजपा के चुनाव प्रबंधन में शामिल जरूर हैं, लेकिन वे पूरी तरह से पर्दे के पीछे रहकर काम कर रहे हैं। रॉय ने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर वे नेता उनके लिए प्रचार करने नहीं आते हैं, तो यह ज्यादा अच्छा है क्योंकि इन दौरों में उनका काफी समय बर्बाद होता है।

बंगाल भाजपा के अन्य कई सदस्य भी इसी राय से इत्तेफाक रखते हैं। मध्य बंगाल से चुनाव लड़ रहे एक भाजपा उम्मीदवार की पत्नी, जो अपने पति का प्रचार अभियान भी संभाल रही हैं, ने बताया कि अमित शाह के दौरे से ठीक पहले उनके पति को दो दिनों के लिए अपने सभी स्थानीय कार्यक्रम रद्द करने पड़े। केंद्रीय गृह मंत्री की रैली की तैयारियों के सिलसिले में इस दंपत्ति को भाजपा शासित एक हिंदी भाषी राज्य के मंत्री की मेजबानी में भी अपना समय देना पड़ा।

उस महिला ने तल्ख लहजे में कहा कि दिल्ली या अन्य राज्यों से आने वाले ये नेता यह नहीं समझते कि बंगाल में चुनाव जीतना कितना कठिन काम है। उनका कहना था कि वे नेता जहां से आते हैं, वहां तो भाजपा के चुनाव चिह्न पर एक गमले का पौधा भी चुनाव जीत सकता है।

यह शिकायत भले ही थोड़ी कड़वी लगे, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि पांच साल पहले भाजपा के लिए यह संकट कहीं अधिक गहरा था। तब से लेकर अब तक पार्टी ने राज्य में अपने स्थानीय नेताओं की एक मजबूत कतार तैयार करने में काफी हद तक सफलता पाई है।

भले ही भाजपा ने आधिकारिक तौर पर किसी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस छोड़कर आए सुवेंदु अधिकारी को इस पद का सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है।

बंगाल भाजपा आज भी मोदी के नाम पर वोट मांगती है, लेकिन जमीनी स्तर पर सुवेंदु अधिकारी अभियान की कमान संभाले हुए हैं। वह भबनीपुर की घरेलू सीट से सीधे बनर्जी को चुनौती दे रहे हैं और रॉय जैसे अन्य पार्टी उम्मीदवारों के लिए भी जमकर प्रचार कर रहे हैं।

दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस लगातार ‘बोहिरागोतो’ का अपना पुराना राग अलाप रही है। हाल ही में सत्तारूढ़ दल ने भाजपा के स्टार प्रचारकों की सूची में बाहरी लोगों की भारी भरकम मौजूदगी पर कड़े सवाल उठाए थे।

जवाब में भगवा दल भी अब सांसदों के चुनाव को लेकर ममता बनर्जी पर पलटवार कर रहा है। भाजपा इसके लिए गुजरात में जन्मे पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान, बिहार से ताल्लुक रखने वाले अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा और उत्तर प्रदेश के रहने वाले रिटायर्ड पुलिस अधिकारी राजीव कुमार का उदाहरण देती है। ये तीनों ही नेता संसद में तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हैं।

आगामी चुनावों में बंगाली पहचान के इस मजबूत मुद्दे को बेअसर करने के लिए भाजपा का दूसरा सबसे बड़ा हथियार धर्म के नाम पर मतदाताओं को लामबंद करना है। यह कोई नई रणनीति नहीं है, लेकिन इस बार शहरी क्षेत्रों के निवासियों के बीच इसका असर साफ दिखाई दे रहा है।

उत्तरी कोलकाता के श्यामबाजार इलाके में रहने वाले ६० वर्षीय व्यवसायी पिनाकी बनर्जी का मानना है कि इस बार सभी हिंदू मतदाता एकजुट होकर एक ही दिशा में जा रहे हैं। उनके अनुसार यह चुनाव बंगाली बनाम गैर-बंगाली के मुद्दे पर नहीं, बल्कि सीधे तौर पर हिंदू बनाम मुस्लिम के आधार पर तय होगा।

२०२१ के विधानसभा चुनावों से पहले बंगाली फिल्म उद्योग के कुछ वामपंथी विचारधारा वाले कलाकारों ने मिलकर एक म्यूजिक वीडियो बनाया था। उस वीडियो में सीधे तौर पर भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हिंदुत्ववादी राजनीति पर तीखा प्रहार किया गया था।

उस वीडियो का निर्देशन करने वाले रिद्धि सेन का कहना है कि आज के माहौल में ऐसे किसी सामूहिक प्रयास की कल्पना करना भी मुश्किल है। वे निराशा जताते हुए कहते हैं कि पिछले पांच सालों में शहर के लोगों के दिलों में इस्लामोफोबिया ने गहरी पैठ बना ली है। सेन के मुताबिक, यह विचार मध्यमवर्गीय बंगालियों के दिमाग में पूरी तरह से घर कर गया है कि कोलकाता अब एक मिनी-पाकिस्तान या मिनी-बांग्लादेश बन चुका है।

सेन और कुछ अन्य समान विचारधारा वाले कलाकारों ने १४ अप्रैल को एक और नया संगीत वीडियो जारी किया। इस वीडियो में आदिवासियों को तथाकथित ‘बुलडोजर न्याय’ का विरोध करते हुए दिखाकर व्यवस्था की आलोचना की गई है। लेकिन उनका यह नया गीत पिछली बार जैसा प्रभाव छोड़ने में पूरी तरह विफल रहा है।

हालांकि, बंगाली श्रमिक वर्ग हिंदुत्व के एजेंडे का पूरी तरह से समर्थन करने को लेकर अभी भी असमंजस में है। कोलकाता के उपनगर बिधाननगर में काम करने वाले ३५ वर्षीय अभिषेक दास ने बताया कि उन्होंने भी भाजपा उम्मीदवार मुखोपाध्याय के प्रचार के दौरान मछली ले जाने वाले वीडियो देखे हैं।

दास को मछली पर प्रतिबंध लगने की कोई चिंता नहीं है, लेकिन उन्हें इस बात का गहरा अंदेशा है कि अगर राज्य में भाजपा की सरकार बनती है तो गोमांस पर निश्चित रूप से प्रतिबंध लगा दिया जाएगा।

दास कहते हैं कि यह बात हर कोई जानता है कि तृणमूल कांग्रेस में भ्रष्टाचार है, लेकिन अगर भाजपा सत्ता में आती है तो राज्य में काफी अशांति और परेशानी पैदा होगी। एक हिंदू होने का हवाला देते हुए वह कहते हैं कि उनका धर्म उन्हें यह अधिकार बिल्कुल नहीं देता कि वह किसी मुसलमान को उसकी पसंद का खाना खाने से रोकें।

बंगाली हितों की बात करने वाले समूह ‘बांग्ला पोक्खो’ से जुड़े लोगों का दावा है कि पूरे राज्य में इस समय यही माहौल है और इसका श्रेय वे अपने अभियानों को देते हैं। हाल के वर्षों में इस संगठन ने केंद्र और अन्य राज्यों की भाजपा सरकारों के उन फैसलों के खिलाफ आक्रामक अभियान चलाया है, जिन्हें वे बंगाली विरोधी मानते हैं।

बांग्ला पोक्खो के आयोजन सचिव कौशिक मैती का स्पष्ट कहना है कि पूरे बंगाल में लोगों की यह आम भावना बन चुकी है कि तृणमूल कांग्रेस भले ही खराब हो, लेकिन भाजपा पूरी तरह से बंगालियों के खिलाफ है। उनके अनुसार, ठीक इसी वजह से भाजपा चुनाव के समय खुद को सच्चा बंगाली साबित करने का दिखावा कर रही है।

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