महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) ने पिछले सप्ताह नई दिल्ली में चुनाव आयोग को पत्र लिखकर ईसीआईनेट (ECINet) सॉफ्टवेयर में चार महत्वपूर्ण बदलाव करने की मांग की है। राज्य में इस समय विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (एसआईआर) का नोटिस चरण चल रहा है। इस पत्र के माध्यम से अनुरोध किया गया है कि सॉफ्टवेयर निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (ईआरओ) को वह विवेकाधिकार इस्तेमाल करने की अनुमति दे, जो कानून उन्हें पहले से प्रदान करता है।
महाराष्ट्र के सीईओ एस. चोकलिंगम की यह मांग कि ईआरओ को यह तय करने का अधिकार दिया जाए कि किन “तार्किक विसंगति” (लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी) के मामलों में सुनवाई की आवश्यकता है, कौन से दस्तावेज स्वीकार किए जाने चाहिए और किन विसंगतियों का वे स्वयं निपटान कर सकते हैं, दरअसल चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा पहले से दर्ज की गई चिंताओं से मेल खाती है।
सीईओ का यह पत्र 24 सितंबर को वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग, आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना और दो सचिवालय अधिकारियों को भेजा गया था। यह पत्राचार एक मीडिया जांच रिपोर्ट के ठीक एक दिन बाद हुआ, जिसमें खुलासा किया गया था कि दो चुनाव आयुक्तों ने आधिकारिक रिकॉर्ड पर यह चिंता जताई थी कि उक्त सॉफ्टवेयर ईआरओ की शक्तियों को सीमित कर रहा है।
इस मुद्दे पर टिप्पणी के लिए सोमवार को महाराष्ट्र के सीईओ चोकलिंगम से संपर्क नहीं हो सका। चुनाव आयोग के प्रवक्ता को भी सवालों की एक सूची भेजी गई है, जिनकी ओर से फिलहाल जवाब का इंतजार है।
गौरतलब है कि महाराष्ट्र की 31 अगस्त को प्रकाशित ड्राफ्ट मतदाता सूची में राज्य के 21.1 प्रतिशत मतदाताओं के नाम काटे गए थे। राज्य की अंतिम मतदाता सूची 16 नवंबर को जारी होनी है।
“तार्किक विसंगति” का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति मतदाता नहीं है। यह एक प्रकार की तकनीकी बेमेल (मिसमैच) स्थिति है, जो चुनाव आयोग का ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर तब दिखाता है जब वह किसी मतदाता को पिछले एसआईआर की सूची से उनके माता-पिता या दादा-दादी के साथ जोड़ने का प्रयास करता है।
इसमें माता-पिता का नाम मेल न खाना, माता-पिता और बच्चे की उम्र में 15 साल से कम या 50 साल से अधिक का अंतर होना, पुरानी और नई सूची के बीच उम्र का सही ढंग से न बढ़ना, या ऐसा मामला जहां मतदाता ने कोई दस्तावेज जमा नहीं किया हो या केवल आधार कार्ड दिया हो, आदि शामिल हैं।
14 अगस्त को चुनाव आयुक्त संधू ने लिखा था कि सीईओ, डीईओ और ईआरओ (जो मतदाता सूची के लिए वैधानिक प्राधिकरण हैं) यह रिपोर्ट कर रहे थे कि वे अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने कहा था कि उनकी शक्तियों को आईटी महानिदेशक के स्तर पर ईआरओनेट (ERONet) के केंद्रीकृत नियंत्रण द्वारा सीमित कर दिया गया है। उन्होंने इसे अजीब बताया कि कानून के अनुसार मतदाता सूची की सभी जिम्मेदारियां ईआरओ, डीईओ और सीईओ पर हैं, लेकिन पहुंच और नियंत्रण आईटी विभाग द्वारा केंद्रीकृत कर दिया गया है।
महाराष्ट्र के सीईओ के 24 सितंबर के पत्र में प्रभावी रूप से उसी स्वतंत्रता की मांग की गई है, जिसके बारे में दोनों आयुक्तों ने कहा था कि ईसीआईनेट ने उसे छीन लिया है। पत्र में मुख्य रूप से उन स्थितियों का जिक्र है जहां कानून ईआरओ को निर्णय लेने का अधिकार देता है, लेकिन सॉफ्टवेयर उन्हें ऐसा करने का कोई तकनीकी विकल्प नहीं देता।
सुनवाई को लेकर नियमों में ईआरओ को यह विवेकाधिकार दिया गया है कि वह किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से अपने समक्ष उपस्थित होने के लिए कह सकता है। सीईओ ने लिखा कि ईसीआईनेट के एक्शन मेनू में केवल दो विकल्प हैं और कोई भी विकल्प ईआरओ को सुनवाई से छूट देने की अनुमति नहीं देता। उन्होंने उन मतदाताओं के लिए “सुनवाई से छूट” वाले एक तीसरे विकल्प की मांग की, जो वैध और संतोषजनक दस्तावेज जमा करते हैं। इससे वरिष्ठ नागरिकों, विकलांगों और अन्य संवेदनशील समूहों को अनावश्यक असुविधा से बचाया जा सकेगा।
दस्तावेजों के मामले में, नोटिस के पीछे सूचीबद्ध 13 दस्तावेज केवल सांकेतिक हैं। सीईओ ने 14वें विकल्प के रूप में “अन्य/अन्य समतुल्य दस्तावेज” का विकल्प जोड़ने की मांग की है, क्योंकि आदिवासी, बेघर और यौनकर्मी समुदायों के मतदाता शायद इस सांकेतिक सूची में से कोई दस्तावेज उपलब्ध न करा सकें।
निर्णय लेने के अधिकार पर सीईओ ने स्पष्ट किया कि कुछ मामलों में एक ईआरओ केवल बूथ लेवल अधिकारी के बयान के आधार पर तार्किक विसंगति को हल नहीं कर सकता है। ऐसे में सहायक दस्तावेजों को सत्यापन के लिए जिला निर्वाचन अधिकारी (डीईओ) को भेजा जाना होता है। सीईओ चाहते हैं कि साक्ष्यों से संतुष्ट होने पर ईआरओ इन मामलों का निर्णय स्वयं कर सकें। कानून भी मतदाता सूची की जिम्मेदारी ईआरओ पर डालता है और कहता है कि यदि ईआरओ संतुष्ट है कि कोई व्यक्ति पात्र है, तो उसे नाम शामिल करने का निर्देश देना चाहिए।
वर्तमान में ईसीआईनेट में हर विसंगति के मामले में “पिछले एसआईआर का उद्धरण” अपलोड करना अनिवार्य है। सीईओ ने सुझाव दिया कि इसे वैकल्पिक बनाया जाना चाहिए क्योंकि विसंगति की पहचान पहले ही पिछली सूची का उपयोग करके की जा चुकी है। इसके अलावा, उन्होंने फील्ड अधिकारियों के लिए नोटिस, दस्तावेज जमा करने, सुनवाई और निपटान प्रक्रिया को समझाने वाले अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों (FAQs) की भी मांग की है, क्योंकि केवल मौखिक निर्देश पर्याप्त नहीं होते।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम 1960 प्रत्येक विधानसभा सीट के लिए एक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी को मतदाता सूची की जिम्मेदारी सौंपते हैं। यह एक जानबूझकर विकेंद्रीकृत प्रणाली है जिसे चुनाव आयोग दशकों से अपनाता आ रहा है ताकि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हेरफेर के राजनीतिक आरोपों का जवाब दिया जा सके। कोई भी एक व्यक्ति मतदाता सूची को नियंत्रित नहीं कर सकता।
कागज पर अब भी ईआरओ हर नाम का फैसला करता है, लेकिन व्यवहार में वह केवल वही कर पाता है जो सॉफ्टवेयर अनुमति देता है। सॉफ्टवेयर में क्या अनुमति है, इसे नई दिल्ली से केंद्रीकृत रूप से नियंत्रित किया जाता है।
23 सितंबर को मीडिया जांच के पहले जवाब में, चुनाव आयोग ने कहा था कि उसके डिजिटल प्लेटफॉर्म अनधिकृत छेड़छाड़ को रोकने के लिए सख्त डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत काम करते हैं और ईआरओ तथा डीईओ कानून के तहत वैधानिक शक्तियों के अनुसार काम करते हैं। इसके एक दिन बाद ही महाराष्ट्र के सीईओ का यह पत्र भेजा गया।
26 सितंबर को, पूर्ण आयोग की बैठक के बाद चुनाव आयोग ने एक बयान जारी किया जिसने आंशिक रूप से महाराष्ट्र की मांगों को संबोधित किया। इसमें ईआरओ को यह विवेकाधिकार दिया गया कि वे तार्किक विसंगतियों वाले लोगों को व्यक्तिगत सुनवाई से छूट दे सकते हैं। आयोग ने यह भी कहा कि अगर फील्ड अधिकारियों को सिस्टम में किसी और लचीलेपन की आवश्यकता होगी, तो उसे लागू किया जाएगा।
इस चार पन्नों के नोट में आठ अन्य फैसलों की भी घोषणा की गई, जिन्होंने दोनों आयुक्तों द्वारा उठाई गई कई चिंताओं का बिंदुवार समाधान किया। अब हर आयोग की बैठक से पहले एजेंडा वितरित किया जाएगा और बाद में मिनट्स जारी किए जाएंगे। अधिकारियों की विदेश यात्राओं के लिए आयोग की मंजूरी जरूरी होगी। नए आईटी मॉड्यूल और पोर्टल को आयोग के समक्ष रखने से पहले अधिकारियों की एक समिति द्वारा परखा जाएगा।
ईसीआईनेट की समीक्षा एक वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त की अध्यक्षता वाली समिति करेगी, जिसमें आईआईटी या ट्रिपल आईटी (IIIT) का एक स्वतंत्र विशेषज्ञ भी शामिल होगा। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाएगा कि आयुक्तों द्वारा अधिकारियों को जारी निर्देशों का कड़ाई से पालन हो।
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