अगस्त के अंत में नेपाल में आई विनाशकारी अचानक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) ने भारी तबाही मचाई है। इस भीषण त्रासदी में मरने वालों की आधिकारिक संख्या 1,200 को पार कर गई है। अब इन अज्ञात शवों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए भारत ने एक बड़ा मानवीय कदम उठाया है।
नेशनल फोरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी (NFSU) गांधीनगर के 10 विशेषज्ञों की एक टीम नेपाल में दिन-रात काम कर रही है। यह टीम सेंट्रल फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (CFSL) के सदस्यों और नेपाली अधिकारियों के साथ मिलकर सैकड़ों पीड़ितों के डीएनए प्रोफाइल तैयार करने में जुटी है।
विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मंगलवार को इस राहत और पहचान अभियान की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारत की फोरेंसिक टीमें काठमांडू की दो अलग-अलग प्रयोगशालाओं में पूरी मुस्तैदी से काम कर रही हैं।
वर्तमान में भारतीय विशेषज्ञ 1200 डीएनए सैंपलों की जांच कर रहे हैं। जायसवाल ने स्पष्ट किया कि भारत नेपाल की आवश्यकता के अनुसार उसे हर संभव सहायता देना जारी रखेगा और वहां जमीनी स्तर पर बचाव तथा फोरेंसिक दोनों टीमें सक्रिय हैं।
इस पूरी प्रक्रिया से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अहमदाबाद में हुए हाई-प्रोफाइल AI171 विमान हादसे के दौरान किया गया काम यहां बहुत उपयोगी साबित हो रहा है। उस चुनौतीपूर्ण समय में विशेषज्ञों को बेहद खराब हो चुके सैंपलों से डीएनए निकालने और एक खोजने योग्य प्रोफाइल बनाने का व्यापक अनुभव प्राप्त हुआ था।
अब नेपाली अधिकारियों द्वारा तैयार किए जा रहे इसी डीएनए डेटाबेस का उपयोग पीड़ितों के करीबी रिश्तेदारों के डीएनए से मिलान करने के लिए किया जाएगा ताकि शवों की सही शिनाख्त हो सके।
एनएफएसयू के कुलपति डॉ. जेएम व्यास ने इस पहल पर रोशनी डालते हुए कहा कि यह पूरा कार्य विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय (MHA) के दिशा-निर्देशों के तहत किया जा रहा है। यह नेपाल के प्रति भारत के ठोस समर्थन को दर्शाता है। उन्होंने बताया कि विमान दुर्घटना हालिया इतिहास के उन प्रमुख मामलों में से एक थी जहां डीएनए विज्ञान का इतने बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ था। अब उस अहम अनुभव का विस्तार जमीनी स्तर पर मानवीय राहत कार्यों के लिए किया जा रहा है, जिससे न सिर्फ विशेषज्ञों को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा, बल्कि अपनों को खो चुके परिवारों को एक अंतिम सांत्वना भी मिल सकेगी।
इस जटिल तकनीकी प्रक्रिया में अंतरराष्ट्रीय टीमों के साथ मिलकर काम कर रहे भारतीय विशेषज्ञ डीएनए अनुक्रमण (इंडेक्सिंग) के लिए अमेरिका द्वारा विकसित ‘कंबाइंड डीएनए इंडेक्स सिस्टम’ (CODIS) का उपयोग कर रहे हैं। ये विशेषज्ञ नेपाली अधिकारियों के साथ निकट समन्वय में हैं।
जैसे ही शव बरामद होते हैं और कानूनी-चिकित्सा प्रक्रियाओं के लिए भेजे जाते हैं, हमारी टीमें अपना काम शुरू कर देती हैं। शव की स्थिति और मृत्यु के बाद बीते समय के आधार पर विशेषज्ञों द्वारा नरम ऊतकों, हड्डियों, दांतों या शारीरिक तरल पदार्थों से जैविक नमूने सावधानीपूर्वक निकाले जाते हैं।
इस बीच, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक पूर्व अधिसूचना में भारत की सभी फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाओं (FSL) को महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। उन्हें भारत में मौजूद पीड़ितों के रिश्तेदारों के डीएनए सैंपलों के संग्रह और विश्लेषण केंद्रों के रूप में काम करने को कहा गया है।
गुजरात में फोरेंसिक विज्ञान निदेशालय (DFS) और NFSU के अंतर्गत आने वाली सभी प्रयोगशालाएं इस डीएनए प्रोफाइलिंग का जिम्मा संभाल रही हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, मिलान प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए फोरेंसिक विशेषज्ञों द्वारा अब तक 10 से अधिक सैंपल एकत्र किए जा चुके हैं।
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