ईमानदारी की सजा - भूखों मरने को मजबूर गुजरात का पूर्व विधायक - Vibes Of India

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ईमानदारी की सजा – भूखों मरने को मजबूर गुजरात का पूर्व विधायक

| Updated: June 25, 2022 14:18

एक ऐसे दौर में जब विधायक अपनी अकूत संपत्ति के कारण केंद्रीय जांच एजेंसियों से डरकर कर खुले बाजार में सब्जी की तरह बिक रहे हैं , दल बदल कर रहे है , एक राज्य से दूसरे राज्य विशेष विमान से भटक रहे हैं , पांच -सात सितारा होटल में मजे कर रहे हैं , दल ऐसे बदल रहे है जिससे गिरगिट भी शरमा जाये ,2016 से 2020 तक चार साल में 405 विधायक दल बदल कर चुके हो , और कितने दलबदल को तैयार हो ,अकेले भाजपा में 182 विधायक शामिल हो चुके हो , दल बदल और खरीद फरोख्त से कोई दल अछूता नहीं हो , यह सब देखकर अगर आपके मन में लोकतंत्र के लिए घृणा पैदा हो रही हो , तो गुजरात के एक ऐसे पूर्व विधायक हैं जिन्हे जानकर आपके मन में लोकतंत्र के लिए आस्था और पूर्व विधायक के लिए मन में सम्मान पैदा हो जायेगा। खेडब्रह्मा-विजयनगर निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विधायक बने जेठाभाई राठौर आज भी बीपीएल कार्ड रखते हैं और गरीबी में जीवन व्यतीत करते हैं।
गुजरात के एक पूर्व विधायक की जो गरीबों से भी बदतर हालत में जी रहे हैं। दो वक्त के खाने के लिए भी खाना भी मुश्किल से मिलता है।

आज भी बीपीएल कार्ड पर जिंदा है

भारत में नेता चुने जाते ही करोड़पति बनते जा रहे हैं। चार-पांच साल में उनकी करोड़ों की संपत्ति बन रही है। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब नेता वास्तव में जनता की सेवा के लिए चुनाव लड़ रहे थे और चुनाव जीतने के बाद जनता के लिए काम करने और उनका आशीर्वाद लेने से ही उनका पेट भरता था. खेडब्रह्मा-विजयनगर निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विधायक बने जेठाभाई राठौर आज भी बीपीएल कार्ड रखते हैं और गरीबी में जीवन व्यतीत करते हैं।

झोंपड़ी जैसा घर, बेटे करते हैं मजदूरी


जेठाभाई राठौर का घर ऐसा है की झोपड़ी की परिभाषा में भी उसे नहीं रख सकते , उसके घर के बाहर गाड़ी की तो कल्पना करना भी बेकार है। यदि आप उनका झोपड़ी जैसा घर देखना चाहते हैं, तो आपको विजयनगर तालुका के तेबड़ा गांव जाना होगा। जहां उन्हें अपने पूर्वजों से विरासत में मिला एक झोपड़ी जैसा घर है। उनके पांच बेटे अभी भी मजदूरी का काम करते हैं। शाम के समय घर पर खाने की भी दिक्कत हो जाती है।

ईमानदारी की जिंदगी का इनाम बीपीएल कार्ड के सहारे जिंदगी

80 साल से ज्यादा उम्र के जेठाभाई राठोड ने अपना जीवन अपने सिद्धांतों पर जिया है। खेडब्रह्मा-विजयनगर सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर 17 हजार वोटों से जीत हासिल की। कांग्रेस उम्मीदवार को 17,000 से अधिक मतों से हराया। वह 1967 से 1971 तक क्षेत्र के विधायक रहे। अपने पांच साल के कार्यकाल के दौरान, उन्होंने हराम का एक रुपया भी जमा नहीं किया। ईमानदारी का जीवन जीने के बाद आज भी वह बीपीएल लाभार्थी के रूप में जीवन जीते हैं।

एसटी बस से जाते थे विधानसभा

सरकार को ऐसे ईमानदार विधायकों की कोई परवाह नहीं है. सेवाभावी जेठा भाई ने स्वभाव से अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के लिए बहुत काम किया। खासकर सड़कें और झीलें के मामलों में उन दिनों वह साइकिल से गांव-गांव जाते थे और लोगों के सवालों को जानते थे। सचिवालय जाना है तो एसटी बस से यात्रा करते ,विधानसभा में सक्रियता से भाग लेते।

आज 80 साल की उम्र पार चुके ईमानदारी से जीने और गरीबी में मरने का इंतजार करते हैं सरकार भी उनकी तरफ नहीं देखती। उन्हें या उनके परिवार को कोई सरकारी सहायता नहीं मिलती । न ही उन्हें पेंशन मिलती है ! लोगों के आंसू पोछने वाले ऐसे विधायक के आंसू पोछने का किसी को समय नहीं है। अधिकांश राजनेताओं को यह भी नहीं पता कि इतना गरीब विधायक गुजरात में रहता है।

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