कभी ‘जननेता’ कहलाने वाले नरेंद्र मोदी आज अपने ही पद के कैदी बन चुके हैं। वहीं, कभी पारिवारिक विरासत और राजनीति के दायित्वों से दूर भागने वाले राहुल गांधी ने आज जनता के बीच उतरकर सड़क पर संघर्ष की असली ताकत को पहचान लिया है।
पच्चीस साल पहले तक नरेंद्र मोदी एक स्वतंत्र व्यक्ति थे। वे बेधड़क कहीं भी आ-जा सकते थे और भीड़ में आसानी से घुलमिल जाते थे। तब किसी पुलिस अधिकारी को उनकी जान को ‘खतरा’ बताने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती थी। उनकी छवि एक बेदाग, साफ जमीर वाले और सिद्धांतों की राजनीति करने वाले नेता की थी।
फिर एक दिन, दिल्ली दरबार के एक शक्तिशाली संरक्षक की कृपा से उन्होंने खुद को एक ‘मनसबदार’ के रूप में स्थापित कर लिया। उस दौर में केंद्र की सत्ता साजिशों, गुटबाजी और दांव-पेच से घिरी हुई थी। इसी उथल-पुथल के बीच नरेंद्र मोदी ने अपने लिए एक नई राह बना ली।
इसके बाद मोदी का जीवन पूरी तरह बदल गया। उन पर सत्ता की जिम्मेदारी और एक समझदार शासक के दायित्व आ गए। लेकिन इससे पहले कि वे अपनी लय पकड़ पाते, उन्होंने मुगल दरबार की तर्ज पर प्रभावशाली व्यापारियों, अवसरवादी अधिकारियों और चापलूस दरबारियों से खुद को घिरने दिया। और फिर, फरवरी-मार्च 2002 के दंगे शुरू हुए, जहां वे अपना ‘राजधर्म’ निभाने में काफी पीछे छूट गए।
अचानक, जनता का वह नेता अपने ही “सुरक्षा घेरे” का कैदी बन गया। उन्हें एक ऐसा व्यक्ति मान लिया गया जिसकी जान को लगातार बड़ा खतरा है। वे पूरी तरह से अपने ‘भरोसेमंद’ सलाहकारों पर निर्भर होते चले गए, जिन्होंने उनके आत्म-केंद्रित स्वभाव को और बढ़ावा देने का ही काम किया।
इन सबके बावजूद, जमीनी राजनीति को समझने वाले नरेंद्र मोदी ने जनता तक अपना ‘संदेश’ पहुंचाने के नए और अनोखे तरीके खोजे। उन्होंने खुद को एक ऐसे अर्ध-स्वायत्त सूबेदार के रूप में स्थापित किया, जो दिल्ली के दरबार को चुनौती देने से भी पीछे नहीं हटने वाला था। उन्होंने दिल्ली की गद्दी हासिल करने के लिए ताकतवर लोगों का एक बेहद मजबूत गठबंधन तैयार किया और 2014 में निर्णायक वार किया।
दिल्ली की सत्ता के लिए उनके प्रतिद्वंद्वी एक युवा नेता राहुल गांधी थे। युवा गांधी और अनुभव वाले मोदी के बीच का अंतर बिल्कुल स्पष्ट था। एक तरफ प्रसिद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमि वाले, प्रधानमंत्री के घर में जन्मे राहुल थे, जिन पर वंशवाद का ठप्पा लगा था। वहीं दूसरी तरफ पिछड़ी जाति से आने वाले मोदी थे, जिन्हें तमाम सामाजिक बाधाओं का सामना करना पड़ा था।
उस वक्त राहुल गांधी को लोगों की भीड़ पसंद नहीं थी, वे अपनी ही पार्टी के बड़े नेताओं से खफा रहते थे और परिवार की राजनीतिक विरासत में उनकी कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। वहीं उनके प्रतिद्वंद्वी नरेंद्र मोदी अपनी ‘चायवाला’ छवि का जमकर फायदा उठा रहे थे। उन्होंने खुद को ‘हवाई चप्पल’ पहनने वाले आम आदमी के करीब और ‘लुटियंस एलीट’ की पूरी विचारधारा के घोर विरोधी के रूप में पेश किया।
2014 का चुनावी मुकाबला शुरू होने से काफी पहले ही तय माना जा रहा था। यह धारणा पक्की हो चुकी थी कि नरेंद्र मोदी का सबसे बड़ा फायदा यही है कि उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी राहुल गांधी हैं। जनता की नजर में एक फकीर था और दूसरा राजकुमार।
अब अक्टूबर 2026 के वर्तमान परिदृश्य पर नजर डालें। नरेंद्र मोदी के पास एक सम्राट जैसी पूरी भव्यता और ताकत है। कोई भी मंत्री उनके एकाधिकार और सुर्खियों में हिस्सेदारी मांगने की हिम्मत नहीं कर सकता। सम्राट बिल्कुल अकेले चलते हैं। उनके पास असीमित शक्तियां हैं, जिससे वे किसी को भी अपनी इच्छाओं और फैसलों के आगे झुकने पर मजबूर कर सकते हैं। अपने पद की इसी ताकत का इस्तेमाल कर उन्होंने गांधी परिवार से एसपीजी (SPG) सुरक्षा जैसे विशेषाधिकार भी छीन लिए।
लेकिन प्रधानमंत्री के उस छोटे से राजनीतिक प्रतिशोध ने असल में गांधी परिवार को ‘खास होने’ के एक अवास्तविक भ्रम से मुक्त कर दिया। इसी का नतीजा था कि जल्द ही वे पूरे देश में ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पर निकल पड़े और जमीन पर उतर गए।
इसके बाद, जुलाई में दिल्ली पुलिस को राहुल गांधी के साथ सख्ती बरतने के निर्देश दिए गए। जीवन भर विशेषाधिकारों में पले-बढ़े इस नेता ने पहली बार पुलिसिया बल प्रयोग का दर्द और उसे सहकर किए गए प्रतिरोध का आनंद महसूस किया। यह उनके लिए एक बहुत बड़ा बदलाव लेकर आया। राहुल और उनकी बहन ने अब सड़क की अहमियत को समझ लिया है। पुलिस बैरिकेड पर चढ़कर अपना विरोध दर्ज कराने का अपना ही एक अलग नशा होता है।
कुछ साल पहले तक जिस व्यक्ति का उसके विशेषाधिकारों के लिए मजाक उड़ाया जाता था, उसने अब भीड़ और सड़क की आजाद कर देने वाली ताकत को हासिल कर लिया है। राहुल गांधी लगातार कई दिनों से विरोध-प्रदर्शनों की राह पर हैं। दिल्ली पुलिस उन्हें दो दिन में दो बार हिरासत में ले चुकी है। उनके इस दृढ़ विद्रोह ने यह सफलतापूर्वक साबित कर दिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक दमनकारी सरकार चला रहे हैं। पिछले महीने जंतर-मंतर पर गूंजा नारा – “जब-जब मोदी डरता है, पुलिस को आगे करता है” – अब राष्ट्रीय राजधानी की सीमाओं से परे पूरे देश में गूंजने लगा है।
पच्चीस साल बाद आज भूमिकाएं पूरी तरह पलट चुकी हैं। नरेंद्र मोदी खुशी-खुशी अपने पद के कैदी बन गए हैं। वे पूंजीपतियों और समझौतावादी सलाहकारों से घिरे हैं। अब सत्ता का मतलब उनके लिए किसी उद्देश्य या सिद्धांत से नहीं रह गया है। वे संगठित भ्रष्टाचार और अक्षमता के जाल में बुरी तरह उलझ चुके हैं। और हर गिरती हुई व्यवस्था की तरह, वे अपनी सरकार की बढ़ती खामियों को न तो देख पा रहे हैं और न ही अपना रवैया बदलने की कोई कोशिश कर रहे हैं।
उनकी ‘नीयत’ की महानता का जो एक भ्रम था, वह अब हवा में उड़ चुका है। राजा को अब अपनी गरीब और लाचार जनता की दर्द भरी आवाजें बिल्कुल सुनाई नहीं देतीं।
वहीं दूसरी तरफ कल के राजकुमार राहुल गांधी हैं, जो पूरे जोश के साथ खुद पर 100 एफआईआर (FIR) दर्ज होने की बात कह रहे हैं। फिलहाल उन पर दर्ज मामलों का आंकड़ा 45 तक पहुंच चुका है।
एक समय था जब सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोगों को लगता था कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी को अदालत के कटघरे में खड़ा करने से गांधी परिवार का तिलिस्म टूट जाएगा। लेकिन आज, राहुल और उनकी बहन खुद सड़कों पर उतरकर पूरी दुनिया को यह दिखा रहे हैं कि वे वापस अपनी जनता के साथ मजबूती से जुड़ गए हैं।
पच्चीस साल बाद नजरिया बदल चुका है क्योंकि सत्ता ने अपना असर दिखाया है, जबकि सत्ता से बाहर रहने की स्थिति ने एक नया जोश भर दिया है। इस प्राचीन भूमि पर बहुत पहले ही राजा की उदासीनता और उसके परिणामस्वरूप पैदा होने वाले असंतोष के अंजाम की चेतावनी दे दी गई थी।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र के चौथे खंड में लिखा है: “जब जनता दरिद्र हो जाती है, तो वह लालची हो जाती है; जब वह लालची हो जाती है, तो असंतुष्ट हो जाती है; और जब वह असंतुष्ट होती है, तो स्वेच्छा से दुश्मन के पाले में चली जाती है या अपने ही स्वामी को नष्ट कर देती है।” बिल्कुल ऐसा ही लिखा है।
(लेखक हरीश खरे ‘द ट्रिब्यून’ के पूर्व प्रधान संपादक हैं। उक्त लेख मूल रूप से द वायर वेबसाइट द्वारा प्रकाशित किया जा चुका है.)
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