भारतीय पूंजी बाजार में सत्यम घोटाले के बाद वित्तीय हेरफेर का संभवतः सबसे बड़ा और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड और इसके प्रमोटर व एग्जीक्यूटिव चेयरमैन राजेश मेहता के खिलाफ एक कड़ा अंतरिम आदेश जारी किया है।
सेबी के इस 109 पन्नों के आदेश ने पूरे कॉर्पोरेट जगत को हिलाकर रख दिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर ललित राठी सहित कई बाजार विशेषज्ञों ने इस खुलासे पर गहरा आश्चर्य जताया है कि कैसे 3,210 करोड़ रुपये के मार्केट कैप वाली यह कंपनी अब संभावित रूप से शून्य की तरफ बढ़ने की कगार पर खड़ी है।
सेबी की जांच में जो सबसे सनसनीखेज तथ्य सामने आया है, वह कंपनी के राजस्व से जुड़ा है। बाजार नियामक का आरोप है कि पिछले पांच वर्षों (वित्त वर्ष 2020-21 से वित्त वर्ष 2024-25) के दौरान कंपनी द्वारा रिपोर्ट किए गए कुल 15.45 लाख करोड़ रुपये के समेकित राजस्व में से लगभग 15.15 लाख करोड़ रुपये (99.80 प्रतिशत) का राजस्व पूरी तरह से गलत तरीके से पेश या बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया हो सकता है।
यह विशालकाय आंकड़ा सामान्य लेखांकन की गलतियों के दायरे से बिल्कुल परे है और बही-खातों की वास्तविक स्थिति पर गंभीर संदेह पैदा करता है।
इस पूरे खेल का मुख्य केंद्र कंपनी की प्रमुख विदेशी सहायक कंपनी ‘वाल्काम्बी एसए’ (स्विट्जरलैंड) के बही-खातों में छिपा है। स्विस ऑडिटेड खातों के मुताबिक, इस मुख्य ऑपरेटिंग कंपनी का स्टैंडअलोन सालाना राजस्व केवल कुछ सौ करोड़ रुपये (जैसे वर्ष 2023 में लगभग 542.68 करोड़ रुपये) ही था।
इसके विपरीत, इसके ऊपर बैठी होल्डिंग संरचना ‘ग्लोबल गोल्ड रिफाइनरीज एजी’ (जीजीआर) के खातों में यही राजस्व जादुई रूप से कई लाख करोड़ रुपये (जैसे वर्ष 2023 में 2,92,714 करोड़ रुपये) में बदल गया।
इसे आसान भाषा में समझने के लिए एक टोल बूथ ऑपरेटर का उदाहरण लिया जा सकता है, जो हाईवे से गुजरने वाली हर कार की कुल कीमत को अपनी खुद की कमाई बताने लगे, जबकि वह केवल मामूली प्रोसेसिंग चार्ज लेने का ही हकदार था।
इस संदिग्ध गतिविधि की गहराई से जांच करने के लिए नियुक्त किए गए फॉरेंसिक ऑडिटर ‘बीडीओ इंडिया’ को कंपनी की तरफ से भारी असहयोग का सामना करना पड़ा। राजेश एक्सपोर्ट्स ने अपने मुख्य एंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग (ईआरपी) सिस्टम, खातों की किताबों और जर्नल डंप तक ऑडिटर की पहुंच को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया।
इतना ही नहीं, कंपनी ने स्विस डेटा गोपनीयता कानूनों की आड़ लेकर विदेशी सहायक कंपनियों से जुड़े प्राथमिक रिकॉर्ड और इनवॉइस देने से भी साफ इनकार कर दिया, जिसे सेबी ने पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
जांच में यह भी सामने आया कि कंपनी ने ‘अफ्लुएंस शेयर्स एंड स्टॉक्स प्राइवेट लिमिटेड’ नाम के एक स्टॉक ब्रोकर के साथ मिलकर लगभग 11,487 करोड़ रुपये की फर्जी बिक्री और 11,488 करोड़ रुपये की फर्जी खरीद दर्ज की।
असल में ये सौदे कंपनी के व्यावसायिक व्यापार नहीं थे, बल्कि चेयरमैन राजेश मेहता द्वारा अपने व्यक्तिगत ट्रेडिंग खाते से सोने के डेरिवेटिव में किए गए निजी सौदे थे। इन व्यक्तिगत गतिविधियों के लिए कंपनी के फंड का मार्ग बदला गया और इन्हें बोर्ड या ऑडिट कमेटी की मंजूरी और आवश्यक खुलासों के बिना ही अंजाम दिया गया।
लेखांकन के नियमों का उल्लंघन यहीं नहीं रुका। राजेश एक्सपोर्ट्स ने नियमों के विपरीत जाकर विदेशी मुद्रा के उतार-चढ़ाव से हुए 867 करोड़ रुपये के बदलाव और फिक्स्ड डिपॉजिट व म्यूचुअल फंड से मिली 204 करोड़ रुपये की ब्याज आय को सीधे अपने मुख्य परिचालन राजस्व (बिक्री) में जोड़ दिया।
इसके अलावा, वियना मल्टीवेंचर्स (42.54 करोड़ रुपये) और हर्षिल एंटरप्राइज (16.46 करोड़ रुपये) जैसी संस्थाओं से कुल 59 करोड़ रुपये की ऐसी संदिग्ध खरीदारी दिखाई गई, जिसका कोई भौतिक रिकॉर्ड, डिलीवरी चालान या गेट एंट्री मौजूद ही नहीं थी।
सेबी ने बैलेंस शीट में दिखाई गई कई अन्य संपत्तियों की प्रामाणिकता पर भी कड़े सवाल खड़े किए हैं। कंपनी ने अपनी समेकित वित्तीय रिपोर्ट में अफ्रीका की सोने की खदानों में 1,035.27 करोड़ रुपये के निवेश का दावा किया था, लेकिन नियामक को किसी भी निचले बही-खाते में इस निवेश का कोई ठोस सबूत नहीं मिला।
इसके अलावा, खातों को जबरन संतुलित करने के लिए बिना किसी कानूनी और वैध समझौते के ट्रेड रिसीवेबल्स को ट्रेड पेबल्स के सामने 2,914.07 करोड़ रुपये तक अवैध रूप से एडजस्ट (नेटिंग) कर दिया गया, जिसमें अल जमीलत, ऑरोफिन, ईएसजी और अल सुल्तान जैसी विदेशी संस्थाएं शामिल थीं।
कॉर्पोरेट गवर्नेंस की धज्जियां उड़ाते हुए कंपनी के फंड को प्रमोटरों के निजी बैंक खातों में ट्रांसफर किया गया। जांच की अवधि में राजेश एक्सपोर्ट्स ने चेयरमैन राजेश मेहता के व्यक्तिगत खाते में 338.90 करोड़ रुपये स्थानांतरित किए (जिसमें से 232.44 करोड़ रुपये वापस आए)।
इसके साथ ही उनके बेटे सिद्धार्थ मेहता के खाते व क्रेडिट कार्ड में 21.25 करोड़ रुपये भेजे गए, जिनका कंपनी में कोई आधिकारिक पद ही नहीं है। इसी तरह प्रमोटर नियंत्रित कंपनी ‘एलिस्ट प्राइवेट लिमिटेड’ को भी 565.88 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए, जिसमें से 215.85 करोड़ रुपये के नेट आउटफ्लो का कोई तार्किक व्यावसायिक कारण कंपनी नहीं दे सकी।
यही नहीं, प्रमोटर नियंत्रित कंपनियों और सहायक कंपनी ‘एसीसी एनर्जी स्टोरेज’ के बीच संदिग्ध क्रॉस-होल्डिंग के जरिए कंपनी की हिस्सेदारी को भी डाइल्यूट किया गया।
इस भारी वित्तीय अंधेरगर्दी का सीधा और दर्दनाक खामियाजा आम निवेशकों को भुगतना पड़ा है। 6 फरवरी 2023 को कंपनी का शेयर अपने उच्चतम स्तर 1,028.40 रुपये पर ट्रेड कर रहा था और इसका कुल मार्केट कैप 30,364.53 करोड़ रुपये के शिखर पर था। वित्तीय खुलासों में देरी और कैश फ्लो स्टेटमेंट न जमा करने के कारण बाजार का भरोसा टूटा और इसके शेयरों में ऐतिहासिक गिरावट आई।
2 अप्रैल 2026 तक शेयर लुढ़ककर मात्र 80.11 रुपये पर आ गया, जिससे कंपनी का मार्केट कैप घटकर 2,365.33 करोड़ रुपये रह गया। इस भयानक गिरावट से प्रमोटरों की हरकतों के कारण आम पब्लिक निवेशकों की लगभग 12,725.53 crore रुपये की गाढ़ी कमाई पूरी तरह स्वाहा हो गई।
सेबी के पूर्णकालिक सदस्य कमलेश चंद्र वरश्ने द्वारा 3 जून 2026 को जारी किए गए इस अंतरिम आदेश में प्रमोटर राजेश मेहता पर राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयरों को खरीदने, बेचने या बाजार में किसी भी तरह का लेनदेन करने पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है। इसके साथ ही नियामक ने दोनों नोटिसियों को 30 दिनों के भीतर सभी आवश्यक दस्तावेज और स्पष्टीकरण जमा करने का कड़ा निर्देश दिया है।
मामले की गंभीरता और पूर्व में हुए असहयोग को देखते हुए सेबी एक नए फॉरेंसिक ऑडिटर की नियुक्ति कर रहा है, और साथ ही कंपनी के वैधानिक ऑडिटर्स ‘बीएसडी एंड कंपनी’ व ‘पी वी रमना रेड्डी एंड कंपनी’ के खिलाफ उचित कार्रवाई के लिए इस आदेश की कॉपी नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी (एनएफआरए) को भेज दी गई है।
अपने आदेश में नियामक ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया ‘रिलायंस इंडस्ट्रीज बनाम सेबी (2026)’ फैसले का भी संदर्भ दिया है, जो प्रमोटरों के दुर्भावनापूर्ण इरादे और निवेशकों को धोखा देने के आचरण पर पूरी तरह सटीक बैठता है।
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