ऑनलाइन बैंकिंग और डिजिटल ट्रांजैक्शन के इस दौर में साइबर ठगी के शिकार होने वाले लोगों के लिए एक राहत भरी खबर है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने डिजिटल धोखाधड़ी के पीड़ितों को वित्तीय सुरक्षा देने के लिए एक नया और बेहद खास मुआवजा ढांचा तैयार किया है। इस नए नियम के तहत इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजैक्शन में पैसा गंवाने वाले आम ग्राहकों को उनके नुकसान की एक बड़ी भरपाई मिल सकेगी।
केंद्रीय बैंक द्वारा जारी इस नए फ्रेमवर्क को 1 जनवरी 2027 से पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा। इस नई प्रणाली का मुख्य उद्देश्य डिजिटल भुगतान में होने वाले फ्रॉड से ग्राहकों को बचाना और उनकी वित्तीय जिम्मेदारी को सीमित करना है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब देश में डिजिटल बैंकिंग से जुड़े फ्रॉड के मामले लगातार चिंता का विषय बने हुए हैं।
वित्तीय वर्ष 2025-2026 (FY26) के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में कुल रिपोर्ट किए गए फ्रॉड के मामलों की संख्या घटकर 10,114 रह गई है, जो कि पिछले साल के मुकाबले आधी से भी कम है। हालांकि, हैरान करने वाली बात यह है कि धोखाधड़ी में शामिल कुल रकम 46 फीसदी की भारी बढ़ोतरी के साथ 48,021 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। इसी को देखते हुए रिजर्व बैंक ने ग्राहकों के हक में यह बड़ा फैसला लिया है।
इस नए मुआवजे नियम के तहत यदि कोई वास्तविक ग्राहक इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग ट्रांजैक्शन (EBT) के जरिए 50,000 रुपये तक की धोखाधड़ी का शिकार होता है, तो उसे उसके शुद्ध नुकसान का 85 प्रतिशत या अधिकतम 25,000 रुपये का मुआवजा दिया जाएगा। इन दोनों में से जो भी राशि कम होगी, वही पीड़ित को मिलेगी। यह वित्तीय सहायता ग्राहक को उसके पूरे जीवनकाल में केवल एक बार ही मिल सकेगी।
नियमों के मुताबिक, यदि किसी ग्राहक के साथ 29,412 रुपये से कम की ऑनलाइन ठगी होती है, तो उसे कुल गंवाई गई रकम का पूरा 85 फीसदी मुआवजा मिलेगा। हालांकि, इसके लिए एक अनिवार्य शर्त यह है कि पीड़ित को धोखाधड़ी होने के 5 कैलेंडर दिनों के भीतर अपने बैंक में इसकी आधिकारिक शिकायत दर्ज करानी होगी। इसके साथ ही बैंक की आंतरिक प्रक्रिया के तहत इस नुकसान की पुष्टि होना भी जरूरी है।
इस नई व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत यह है कि मुआवजे की इस राशि का एक बहुत बड़ा हिस्सा खुद रिजर्व बैंक (RBI) वहन करेगा। 29,412 रुपये से कम के फ्रॉड के मामलों में मिलने वाले 85 प्रतिशत मुआवजे का 65 फीसदी हिस्सा RBI देगा, जबकि 10 फीसदी पीड़ित का बैंक और बाकी 10 फीसदी वह बैंक चुकाएगा जिसके खाते में धोखाधड़ी का पैसा ट्रांसफर हुआ है। विदेशी या क्रॉस-बॉर्डर ट्रांजैक्शन के मामलों में पीड़ित के बैंक की हिस्सेदारी बढ़कर 20 फीसदी हो जाएगी।
वहीं, अगर धोखाधड़ी की राशि 29,412 रुपये से लेकर 50,000 रुपये के बीच है, जहां पीड़ित को अधिकतम 25,000 रुपये का मुआवजा मिलना तय है, वहां RBI कुल 19,118 रुपये (76.5%) का योगदान देगा। इस स्थिति में घरेलू ट्रांजैक्शन होने पर पीड़ित का बैंक और लाभार्थी बैंक दोनों 2,941-2,941 रुपये (लगभग 12-12%) का भुगतान करेंगे। अंतरराष्ट्रीय मामलों में पीड़ित के बैंक को 5,882 रुपये देने होंगे।
आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि यदि फ्रॉड का पैसा एक से अधिक बैंकों के खातों में गया है, तो वे सभी बैंक अपने यहां क्रेडिट हुई रकम के अनुपात में मुआवजे का खर्च उठाएंगे। मान लीजिए कि किसी ग्राहक के साथ 40,000 रुपये की धोखाधड़ी हुई और उसमें से 15,000 रुपये रिकवर हो गए।
ऐसी स्थिति में ग्राहक 21,250 रुपये (85%) के मुआवजे का हकदार होगा, जिसमें आरबीआई 16,250 रुपये देगा और दोनों संबंधित बैंक 2,500-2,500 रुपये देंगे। यदि कोई भी रकम रिकवर नहीं होती है, तो निर्धारित अनुपात के तहत पूरा 25,000 रुपये का मुआवजा दिया जाएगा।
बैंकों की लापरवाही के मामलों में नियम और भी सख्त हैं। यदि धोखाधड़ी बैंक की किसी चूक जैसे सुरक्षा तंत्र की विफलता, 500 रुपये से अधिक के ट्रांजैक्शन पर अनिवार्य अलर्ट न भेजना, शिकायत के लिए 24 घंटे की हेल्पलाइन न होना या सिस्टम में खराबी के कारण हुई है, तो बैंक को ग्राहक के पूरे नुकसान की 100 फीसदी भरपाई अकेले करनी होगी। बैंकों को घरेलू फ्रॉड की शिकायतों का निपटारा 45 दिनों में और विदेशी मामलों का निपटारा 60 दिनों में करना होगा।
मुआवजे का दावा करने के लिए पीड़ित को ठगी का पता चलते ही तुरंत अपने बैंक और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल या राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर (1930) पर संपर्क करना चाहिए। शिकायत मिलते ही बैंक का पहला काम ग्राहक के खाते से होने वाले अन्य अनधिकृत लेनदेन को तुरंत रोकना होगा। 5 दिनों के भीतर शिकायत दर्ज होने के बाद यह साबित करने की जिम्मेदारी बैंक की होगी कि उनकी तरफ से कोई चूक नहीं हुई थी।
जांच प्रक्रिया के दौरान ग्राहकों के हितों की रक्षा के लिए भी कड़े प्रावधान किए गए हैं। रिकवरी के बाद जब राशि ग्राहक के खाते में वापस डाली जाएगी, तो उसे पुरानी तारीख से ही मान्य किया जाएगा ताकि ग्राहक को ब्याज का नुकसान न हो।
इसके अलावा, क्रेडिट कार्ड से जुड़े फ्रॉड के मामलों में शिकायत मिलने के 5 दिनों के भीतर बैंक को पीड़ित को ‘शैडो रिवर्सल’ यानी अस्थायी क्रेडिट देना होगा, जिससे जांच चलने तक ग्राहक पर किसी भी प्रकार के अतिरिक्त ब्याज या शुल्क का बोझ नहीं पड़ेगा।
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