बहन की रक्षा के लिये जान न्यौछावर करने वाले डाकिये का मंदिर

| Updated: July 2, 2021 2:37 pm

देश के हर कोने में रहे कोई मंदिर या देवस्थान की कोई कहानी होती है, खासकर कोई शास्त्र या पुराणो से जुडी हुई कोई बात से उनका नाता रहेता है. किन्तु गुजरात के भावनगर-राजकोट हाईवे पर बजुड गांव के पास एक डाकिये का मंदिर है. जीसके पिछे एक वीरकथा जुडी हुई है. गांव के लोगो को ईस मंदिर से बडी आस्था है. ईसलिये वे पूजा-पाठ करते है.
ईस डाकिये का नाम हलकारो था. जो रिश्तेदारो तक डाक पहुंचाता था. लोगो ने ईसे हलकारे का नाम दिया था. हलकारो के बारे में राष्ट्रीय शायर जवेरचंद मेघाणी ने भी एक वार्ता लिखी हुई है. माना जाता है की धर्म के अनुसार मानी हुई बहन के प्राण बचाने के लिये उसने अपना जीवन न्यौछावर करी दीया.
पहले जटा हलकारा की छोटी सी जगह पर पूजा विधि होती थी. अब बडा मंदिर बना दिया गया है. भावनगर से राजकोट की ओर हाईवे पर सिंहोर, सोनगढ के बाद बजुड गांव आता है. जीसके पास हलकारा का मंदिर है. जो भावनगर से 40 किमी की दूरी पर है.
लोककथा के अनुसार एक रात को ईसी एरिया में एक दंपति जा रहा था. महिला जो थी वो हलकारा के गांव की थी. ईसी लिये उसने खबरअंतर पूछे. दंपति के पर कुछ लूटेरो ने हमला कर दीया, हलकाराने बहन की आवाज सुनकर लुटेरो का सामना किया. ईस लडाई में बहन तो बच गई मगर हलकारा के प्राण नीकल गये. उसके बाद बहन ने भी प्राण त्याग दीये,
एसा माना जा रहे है की ईस घटना को लंबा समय बीत चूका फिर भी लोग हलकारा की वीरता को भूले नहीं. वैसे भी सौराष्ट्र को वीर और सपुतो की भूमि माना जाता है. वे आज भी पूजनीय है. उनकी याद में धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है.
ईस मंदिर के दर्शन के लिये आनेवाले भाविक मलय व्यास कहते है की, यह भूमि श्रद्धा और आस्था का केन्द्र है. हलाकारा भले ही डाकिया था किन्तु उनका काम भगवान के समान है. मैं जब भी यहां से नीकलता हुं दर्शन कर के जाता हुं. कई भाविको के लिये ये मंदिर आस्थाकेन्द्र समान है. पूजारी भगतबापु कहते है की यह एक धर्मस्थान है. जो लोगो को बलशाली बनाता है. हलकारे के ईतिहास भी यहां लिखा हुआ है.

जिग्नेश ठाकर, भावनगर

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