अहमदाबाद: ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (जीआईबी) के एक बेहद दुर्लभ चूजे की मौत ने आखिरकार गुजरात सरकार को सालों की गहरी नींद से जगा दिया है। इस चूजे का जन्म मार्च महीने में कच्छ अभयारण्य में बेहद जटिल ‘जंप स्टार्ट’ तकनीक के जरिए हुआ था। अफ़सोस की बात है कि अब यह चूजा जीवित नहीं है। इसे बचाने के लिए लगभग 50 कर्मचारियों की फौज तैनात की गई थी, लेकिन इसके बावजूद माना जा रहा है कि यह शिकारियों का निवाला बन गया।
इस पूरी तरह से टाले जा सकने वाले नुकसान के बाद अब जाकर राज्य सरकार की आंखें खुली हैं। घटना के बाद प्रशासन ने अचानक से उस ब्रीडिंग सेंटर के प्रस्ताव को पुनर्जीवित करने की कवायद तेज कर दी है, जो सालों से लालफीताशाही में अटका पड़ा था।
राजस्थान में पहले से चल रही एक सुविधा की तर्ज पर शिकारियों से सुरक्षित ऊंची बाड़ वाला एक समर्पित ब्रीडिंग सेंटर बनाने की यह योजना कोई नई नहीं है। इस योजना को बस ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था और सरकारी तंत्र इसे अपनी सुविधानुसार भूल चुका था।
अक्टूबर 2022 में, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक को जीआईबी ब्रीडिंग सेंटर के प्रस्ताव प्रस्तुत करने के स्पष्ट निर्देश दिए थे। भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) को इसकी रूपरेखा तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
राज्य वन विभाग के सूत्रों का कहना है कि गुजरात समय पर अपना प्रस्ताव भेजने में पूरी तरह विफल रहा। जब तक यह प्रजाति विलुप्त होने के कगार पर नहीं पहुंच गई, तब तक यह अहम योजना बस धूल फांकती रही।
इस बड़ी संरक्षण विफलता को स्वीकार करते हुए एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि चूजे को खोने के बाद ही विभाग अचानक नींद से जागा है। उन्होंने यह भी माना कि यह प्रस्ताव पिछले कई सालों से फाइलों में दबा पड़ा था।
सरकार की अन्य वन्यजीव प्राथमिकताओं के साथ इस लापरवाही का अंतर बहुत आसानी से देखा जा सकता है। साल 2023 में प्रस्तावित कच्छ चीता परियोजना पर उल्लेखनीय तेजी के साथ काम किया गया। दूसरी ओर, जीआईबी जैसी अति-लुप्तप्राय प्रजाति, जिसके संरक्षण में गलती की कोई गुंजाइश ही नहीं है, उसे उसके हाल पर छोड़ दिया गया।
राज्य सरकार बड़ी जद्दोजहद के बाद राजस्थान से एक कीमती अंडा लेकर आई थी। डब्ल्यूआईआई के वैज्ञानिकों ने अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग करके इसे सफलतापूर्वक सेने का काम भी किया। इसके बाद चूजे को वन विभाग को सौंप दिया गया, जिसने पहले से शिकारियों से बचाव वाली बाड़ सुनिश्चित करने की जहमत तक नहीं उठाई।
एक वरिष्ठ वन अधिकारी ने स्पष्ट किया कि वर्तमान स्थिति में किसी और अंडे के भेजे जाने की संभावना नहीं है, क्योंकि विभाग किसी अन्य चूजे को जोखिम में नहीं डालना चाहेगा।
उनका कहना था कि डब्ल्यूआईआई की टीम ने अंडे से चूजा निकलने की प्रक्रिया सुनिश्चित की, लेकिन गुजरात वन विभाग उसकी देखभाल करने में नाकाम रहा। अधिकारी ने यह भी कहा कि शिकारियों को रोकना मुश्किल जरूर है, लेकिन इसके लिए बाड़ लगाने का काम बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था।
लंबे समय से लंबित इस प्रीडेटर-प्रूफ बाड़ को बनाने की योजना पर अब वन विभाग काम कर रहा है। इस बाड़ के तैयार होने के बाद कैप्टिव ब्रीडिंग कार्यक्रम शुरू करने के लिए राजस्थान से दो चूजों और एक वयस्क नर पक्षी को लाने की तैयारी है।
इस बीच पर्यावास सुधार के साथ-साथ ‘जंप स्टार्ट’ विधि भी समानांतर रूप से जारी रहेगी। चूजे के लापता होने के बाद जारी एक सरकारी सूचना में पुष्टि की गई है कि भविष्य के प्रयासों में जीवित रहने की संभावनाओं को अधिकतम करने के लिए वन विभाग द्वारा कई उपाय किए जा रहे हैं।
इनमें प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा (विलायती बबूल) को हटाना, बाड़े को मजबूत करना, शिकारियों को दूसरी जगह ले जाना और जल प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण कदम शामिल हैं।
गौरतलब है कि एक नर जीआईबी को लेकर गुजरात और राजस्थान पहले भी आमने-सामने आ चुके हैं। दिसंबर 2018 में कच्छ के जीआईबी अभयारण्य में आखिरी नर पक्षी के लापता होने के बाद, राजस्थान ने अपने नर पक्षी को गुजरात स्थानांतरित करने से साफ इनकार कर दिया था।
अब सबसे बड़ा और असहज सवाल यही है कि क्या राजस्थान सरकार भविष्य में अपने और पक्षियों के लिए गुजरात पर भरोसा कर पाएगी।
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