नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (TMC) में मची भारी उथल-पुथल के बीच 20 में से 19 बागी लोकसभा सांसदों के नामों की सूची आखिरकार सामने आ गई है। इन सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के कार्यालय को एक पत्र सौंपा है। इस महत्वपूर्ण पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान और सयोनी घोष जैसे प्रमुख नाम भी शामिल हैं। बागी गुट ने यह पत्र 18 मई को लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दिया था।
इस विद्रोही गुट का नेतृत्व पार्टी की वरिष्ठ नेता काकोली घोष दस्तीदार कर रही हैं। मौजूदा समय में 28 सदस्यों के साथ तृणमूल कांग्रेस लोकसभा में कांग्रेस (99) और समाजवादी पार्टी (37) के बाद तीसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। हालांकि, अब इस बड़ी बगावत ने सदन में पार्टी की स्थिति पर गहरा संकट खड़ा कर दिया है।
बागी गुट में 19 सांसद शामिल हैं, जो पार्टी की कुल संसदीय ताकत का दो-तिहाई हिस्सा है। यह भारी संख्या बल उन्हें दल-बदल विरोधी कानून (एंटी-डिफेक्शन लॉ) की कार्रवाई से बचने की कानूनी शक्ति प्रदान करता है। इन सांसदों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे भाजपा के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में सीधे तौर पर शामिल नहीं होंगे, बल्कि केवल उसे अपना समर्थन देंगे।
इस बागी गुट में शामिल सभी 19 सांसदों के नामों की सूची में काकोली घोष दस्तीदार, शताब्दी डॉय, बापी हलदर, शर्मिला सरकार और शर्मिला बंद्योपाध्याय के नाम प्रमुखता से शामिल हैं।
इनके अलावा जगदीश बर्मा बसुनिया, असित कुमार माल, अरूप चक्रवर्ती, रचना बनर्जी, सयोनी घोष, खलीलुर रहमान, अबू ताहेर खान और यूसुफ पठान ने भी इस पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। साथ ही मिताली बेग, माला रॉय, कालीपाड़ा सोरेन, दीपक अधिकारी, जून मालिया और पार्थ भौमिक भी इस बगावती खेमे का हिस्सा हैं।
लोकसभा से पहले टीएमसी को अपने विधायकों के बीच भी इसी तरह के कड़े विद्रोह का सामना करना पड़ा था। पार्टी से निष्कासित किए गए विधायक रितब्रत बनर्जी ने हाल ही में यह सनसनीखेज दावा किया था कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में 80 में से 58 टीएमसी विधायकों को विपक्षी समूह के हिस्से के रूप में मान्यता दी गई है।
अप्रैल में हुए विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद से ही तृणमूल सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को लगातार आंतरिक विद्रोह का सामना करना पड़ रहा है। इस चुनाव में भाजपा के हाथों मिली शिकस्त ने राज्य में टीएमसी के 15 साल के लंबे शासन को समाप्त कर दिया और भाजपा पहली बार सूबे की सत्ता में काबिज हुई है।
पार्टी के भीतर मची यह भगदड़ केवल निचले सदन तक ही सीमित नहीं है। संकट की इस घड़ी में टीएमसी के तीन राज्यसभा सांसदों ने भी उच्च सदन और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता दोनों से अपना इस्तीफा दे दिया है।
यह भी पढ़ें-











