अहमदाबाद से एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां महीने के मुश्किल से 10 से 12 हजार रुपये कमाने वाला एक 28 वर्षीय रैपिडो बाइक ड्राइवर 550 करोड़ रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क का मुख्य मोहरा निकला है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अनुसार, इस युवक के बैंक खातों का इस्तेमाल अवैध ऑनलाइन सट्टेबाजी की रकम को ठिकाने लगाने और शेयर बाजार में हेरफेर करने के लिए किया गया था।
इस गंभीर मामले में ईडी ने मंगलवार को क्राइम ब्रांच (डीसीबी) में एक आपराधिक शिकायत दर्ज कराई है और एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। एक सामान्य वित्तीय जांच के रूप में शुरू हुआ यह मामला अब गुजरात के सबसे जटिल मनी ट्रेल इन्वेस्टिगेशन में बदल चुका है। इस जांच ने फर्जी कंपनियों, किराए की पहचान और अवैध सट्टेबाजी के पैसे से जुड़े शेयरों की कीमत में हेरफेर के एक बड़े जाल का पर्दाफाश किया है।
यह शिकायत ईडी अहमदाबाद के सहायक निदेशक हृदेश कुमार ने दर्ज कराई है। इसमें ‘1xBet अवैध सट्टेबाजी गिरोह’ से जुड़ी तलाशी के दौरान प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत मिले सबूतों का विस्तार से जिक्र किया गया है। 27 नवंबर 2025 को ईडी ने अहमदाबाद शहर के पुलिस आयुक्त को इन निष्कर्षों की जानकारी दी थी और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), आईटी एक्ट तथा अन्य संबंधित कानूनों के तहत आपराधिक मामला दर्ज करने का आग्रह किया था।
जांच के केंद्र में प्रदीप ओड नामक रैपिडो राइडर है। आरोप है कि उसके पैन और आधार कार्ड का इस्तेमाल करके जालसाजों ने बैंक खाते और ‘मैसर्स प्रदीप एंटरप्राइजेज’ नाम से एक प्रोपराइटरशिप कंपनी खोली और चलाई।
पीएमएलए की धारा 17 के तहत दर्ज अपने बयान में प्रदीप ने बताया कि उसे प्रति खाता 25,000 रुपये और चेक पर हस्ताक्षर करने के लिए 400 रुपये दिए जाते थे। उसने साफ किया कि इन खातों से होने वाले भारी-भरकम लेन-देन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं था।
जांच एजेंसी का दावा है कि साल 2024 में फर्जी केवाईसी दस्तावेजों, संदिग्ध पतों और हेरफेर किए गए उद्यम पंजीकरणों का उपयोग करके तीन कंपनियां बनाई गई थीं। इनमें प्रदीप एंटरप्राइजेज के अलावा कमलेश कुमार कलाल के नाम पर ‘कमलेश ट्रेडिंग’ और रौनक रमेश ओड के नाम पर ‘रौनक ट्रेडर्स’ शामिल हैं। जांचकर्ताओं ने पाया है कि महज एक साल के भीतर इन खातों में जमा और निकासी का कुल आंकड़ा लगभग 550 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
शिकायत के अनुसार, इन बैंक खातों का इस्तेमाल मुख्य रूप से अवैध सट्टेबाजी से कमाए गए पैसे को वैध बनाने, पेनी स्टॉक्स (सस्ते शेयरों) की कीमत कृत्रिम रूप से बढ़ाने के लिए सर्कुलर ट्रेडिंग करने और निजी खर्चे उठाने के लिए किया जाता था। हैरान करने वाली बात यह है कि इसी पैसे से गांधीधाम के एक व्यवसायी आदित्य ज़ुला की शादी से जुड़े भुगतान भी किए गए। इसके अलावा, क्राउडफंडिंग प्लेटफॉर्म ‘इम्पैक्ट गुरु’ को दिए गए दान भी इस जांच के दायरे में आ गए हैं।
इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड किरण परमार उर्फ लाला को बताया जा रहा है, जिस पर पूरे नेटवर्क को नियंत्रित करने का आरोप है। शिकायत में महादेव, जुगल, रवि और जीवराज नाम के अन्य लोगों का भी जिक्र है। इन लोगों ने सिम कार्ड की व्यवस्था करने, चेक बुक संभालने से लेकर बैंक खातों की गतिविधियों पर नजर रखने जैसी अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालीं।
ईडी की शिकायत पर सख्त कार्रवाई करते हुए, डीसीबी पुलिस ने धोखाधड़ी, पहचान की चोरी, आपराधिक साजिश और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल से जुड़ी बीएनएस की प्रासंगिक धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कर ली है।
शेयर बाजार में हेरफेर ने खड़े किए सवाल
इस वित्तीय धांधली में शेयर बाजार से जुड़ा एक बड़ा पहलू भी सामने आया है। धन का एक बड़ा हिस्सा मुरे ऑर्गनाइज़र लिमिटेड (पूर्व में इयूरम फार्मास्यूटिकल्स), प्रधिन लिमिटेड (पूर्व में भगवानदास मेटल्स लिमिटेड) और केकेआरराफ्टन डेवलपर्स लिमिटेड (अब भारत ग्लोबल डेवलपर्स के नाम से जानी जाती है) जैसी सूचीबद्ध कंपनियों में लगाया गया था।
जांचकर्ताओं ने शेयरों की कीमतों में असामान्य उतार-चढ़ाव, सेबी की निगरानी और संदिग्ध जमा राशियों से जुड़े टर्नओवर में भारी उछाल दर्ज किया है। एक मामले में तो एक साल के भीतर शेयर की कीमत में 10,000% की वृद्धि होने के बाद सेबी को उसकी ट्रेडिंग ही रोकनी पड़ी।
अधिकारियों का मानना है कि इन संदिग्ध संस्थाओं के जरिए टर्नओवर और स्टॉक की कीमतों को कृत्रिम रूप से बढ़ाया गया और फिर मुनाफा वसूला गया। इस सिलसिले में नवी मुंबई, अहमदाबाद, गांधीनगर और बेंगलुरु में दर्ज कई एफआईआर के बाद बैंक खातों को सीज किया जा चुका है।
‘अकाउंट म्यूल्स’ का बढ़ता नेटवर्क
इस विस्तृत जांच ने ‘अकाउंट म्यूल्स’ के रूप में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को फंसाने के बढ़ते चलन को भी उजागर किया है। चंद हजार रुपयों के लालच में जरूरतमंद लोग अपने पहचान पत्र, सिम कार्ड और चेक बुक जालसाजों को सौंप देते हैं। फिर उनके नाम पर फर्जी शेल कंपनियां पंजीकृत की जाती हैं और वैधानिक फाइलिंग में नकली पते तथा कर्मचारियों का विवरण दिया जाता है।
एक बार चालू होने के बाद, ये खाते बड़े पैमाने पर लेन-देन का जरिया बन जाते हैं, जो अक्सर सैकड़ों करोड़ तक पहुंच जाते हैं। जांचकर्ताओं का कहना है कि इस गिरोह ने पैसे का सुराग मिटाने के लिए लेयर्ड ट्रांसफर, रैपिड डेबिट-क्रेडिट साइकिल और सर्कुलर ट्रेड का जमकर सहारा लिया। ज्यादातर मामलों में, जिनके नाम पर यह खाते थे, उन्हें इस भारी-भरकम लेन-देन की भनक तक नहीं थी और मामले का खुलासा होने के बाद ही उनके खाते फ्रीज हुए।
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