गुजरात हाईकोर्ट ने साल 2013 में लगाई गई वन मंजूरी की शर्तों को पूरा करने में एक दशक से ज्यादा का समय लगाने पर शुक्रवार को आर्सेलरमित्तल (पूर्व में एस्सार स्टील) को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने साफ किया है कि नियमों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति वैभवी डी नानावटी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि केंद्र की सैद्धांतिक वन मंजूरी से जुड़ी शर्तों को पूरा करने में हुई इस भारी देरी को किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने कंपनी द्वारा पेश किए गए 3 करोड़ रुपये के मुआवजे के प्रस्ताव को ‘मूंगफली के दाने’ (अत्यंत मामूली) करार दिया और संकेत दिया कि इस स्टील दिग्गज को राज्य को काफी अधिक मुआवजा देना पड़ सकता है।
“मुआवजा बढ़ाएं या जमीन वापस करें”
पीठ ने सख्त लहजे में कहा कि अगर कंपनी इस जमीन को अपने पास रखने की इच्छुक है, तो उसे अधिक मुआवजे की पेशकश करनी होगी, अन्यथा उसे जमीन वापस करनी पड़ेगी। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अग्रवाल ने कड़ी टिप्पणी की।
“हमारा कहना यह है कि यदि आप वास्तव में इस जमीन को रखने के इच्छुक हैं, तो आपको कुछ और प्रयास करने होंगे। अन्यथा इसे वापस कर दें। यह वन भूमि है, इसे लौटा दें। सैद्धांतिक मंजूरी वैसे भी 5 साल बाद रद्द हो जाती है। राज्य सरकार उस जमीन का उपयोग करेगी और वहां जंगलों को बहाल करेगी।”
अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि हालांकि कंपनी ने कुछ कदम उठाए थे, लेकिन 2013 की शर्तों के पालन में हुई लंबी देरी की भरपाई के लिए वे बिल्कुल भी काफी नहीं थे। पीठ ने स्पष्ट किया कि वे यह नहीं कह रहे हैं कि कंपनी ने कुछ नहीं किया, लेकिन जो भी किया गया वह 10 साल पुरानी स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं था।
“दस वर्षों से अधिक समय से कंपनी की ओर से खामियां रही हैं… इसलिए हम कह रहे हैं कि इन कमियों की या तो भरपाई की जानी चाहिए या फिर आपको इसका हर्जाना देना होगा। यदि आप हमें एक उचित आंकड़ा देते हैं, तो हम उस पर विचार करेंगे। लेकिन आप 3 करोड़ रुपये बता रहे हैं। 3 करोड़ रुपये आपके लिए कुछ भी नहीं हैं।”
राज्य सरकार के सुस्त रवैये पर भी उठे सवाल
इस मामले में हाईकोर्ट ने केवल कंपनी को ही नहीं, बल्कि केंद्र सरकार द्वारा लगाई गई शर्तों के अनुपालन की निगरानी में राज्य के अधिकारियों के सुस्त रवैये पर भी गंभीर सवाल खड़े किए।
पीठ ने राज्य सरकार से जवाब मांगते हुए पूछा कि वे पिछले 10 साल तक क्या कर रहे थे। क्या यह सुनिश्चित करना राज्य के अधिकारियों की जिम्मेदारी नहीं थी कि नियमों का पालन हो रहा है या नहीं? अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार ने यह जिम्मेदारी राज्य को सौंपी थी, लेकिन एक दशक तक उनकी तरफ से कोई उचित प्रतिक्रिया नहीं आई।
जनहित याचिका और सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
यह पूरी कार्यवाही एक लंबे समय से लंबित जनहित याचिका (पीआईएल) से जुड़ी है। यह याचिका गुजरात में वन भूमि के डायवर्जन के लिए 8 जून, 2013 को केंद्र की सैद्धांतिक मंजूरी से जुड़ी शर्तों के अनुपालन को लेकर दायर की गई थी। इस मंजूरी में कंपनी को जुर्माना भरने और वन तथा पारिस्थितिक उद्देश्यों के लिए राज्य को वैकल्पिक भूमि हस्तांतरित करने सहित कई महत्वपूर्ण शर्तें पूरी करने के लिए कहा गया था।
शुक्रवार की सुनवाई के दौरान, पीठ ने बताया कि इस मामले की निगरानी भारत के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार की जा रही है, जिसने इससे पहले हाईकोर्ट के 3 मई, 2013 के फैसले को एक सीमित संशोधन के साथ बरकरार रखा था। हाईकोर्ट ने साफ किया कि उसकी वर्तमान भूमिका केवल वन मंजूरी से जुड़ी शर्तों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने तक ही सीमित है।
राज्य सरकार ने अदालत को सूचित किया कि उसने 2014 और अगस्त 2025 के बीच कंपनी को मंजूरी की शर्तों का पालन करने के लिए नौ बार पत्राचार किया था। राज्य की दलीलों के अनुसार, शर्तों के तहत आवश्यक जमीन का पहला हिस्सा अक्टूबर 2024 में हस्तांतरित किया गया, जो कि शुरुआती मंजूरी के एक दशक से भी अधिक समय बाद हुआ। अदालत ने पाया कि हालांकि कुछ वित्तीय दायित्व पहले ही पूरे कर लिए गए थे, लेकिन भूमि हस्तांतरण जैसी सबसे महत्वपूर्ण शर्त सालों तक अधूरी रही।
आर्सेलरमित्तल का बचाव: दिवालियापन और महामारी
अदालत की चिंताओं का जवाब देते हुए, आर्सेलरमित्तल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि कंपनी ने वन मंजूरी प्रक्रिया के हिस्से के रूप में लगाई गई कई शर्तों का पालन किया है और इसमें भारी खर्च भी उठाया है।
रोहतगी ने अदालत को बताया कि कंपनी ने प्रतिपूरक वनीकरण की आवश्यकता के तहत 133 हेक्टेयर जमीन खरीदकर राज्य सरकार को सौंप दी है। उन्होंने पीठ से कहा कि उन्होंने आज 133 हेक्टेयर जमीन दे दी है और उन्हें वह वापस नहीं चाहिए।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि इस देरी के लिए पूरी तरह से कंपनी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि 2017 के बाद कंपनी दिवालियापन (इन्सॉल्वेंसी) की कार्यवाही से गुजरी और बाद में कोविड-19 महामारी के कारण हुए व्यवधानों से भी अनुपालन की प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित हुई।
अदालत का अंतिम रुख
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि 2013 में मिली सैद्धांतिक मंजूरी के बाद से अब तक बीते समय को देखते हुए बाकी शर्तों को पूरा करने में हुई देरी को महज इन कारणों से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि शर्तों को स्वीकार करके कंपनी कोई खैरात नहीं बांट रही है।
“इन शर्तों को स्वीकार करके, आप कोई दान नहीं कर रहे हैं। गैर-कानूनी कार्यों को नियमित नहीं किया जा सकता, लेकिन यदि आपने समय पर इन सभी शर्तों को पूरा कर लिया होता, तो यह वन भूमि पर आपके कब्जे को नियमित करने जैसा होता।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि वह इस बात की जांच नहीं कर रही है कि पूरी परियोजना को ही खत्म कर दिया जाना चाहिए या नहीं, बल्कि उसका मुख्य उद्देश्य अनुपालन में हुई लंबी देरी के लिए जवाबदेही तय करना है। अदालत ने अपनी प्रारंभिक राय में कहा कि कंपनी तय समय (जो कि 5 साल होना चाहिए था) के भीतर शर्तों का पालन न करने की दोषी है।
अब इस मामले पर आगे की सुनवाई तब होगी जब कंपनी अदालत के समक्ष मुआवजे की राशि को लेकर एक नया और संशोधित प्रस्ताव पेश करेगी।
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