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कौन हैं ईरान के नए सर्वोच्च नेता बने मोजतबा खामेनेई? पिता की मौत के बाद मिली सत्ता की कमान

| Updated: March 9, 2026 13:54

अमेरिका और इजरायल के भीषण हमलों में पिता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद मोजतबा खामेनेई को मिली ईरान की सत्ता; जानें कौन हैं मोजतबा और कैसा है उनका राजनीतिक रसूख।

ईरान पर अमेरिका और इजरायल द्वारा छेड़े गए युद्ध के पहले दिन अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई थी। अब उनकी जगह उनके दूसरे बेटे मोजतबा खामेनेई को ईरान का नया सर्वोच्च नेता (सुप्रीम लीडर) चुन लिया गया है।

इस भीषण हवाई हमले में 56 वर्षीय कट्टरपंथी मौलवी मोजतबा की मां, पत्नी और उनकी एक बहन की भी जान चली गई। हालांकि, मोजतबा उस वक्त वहां मौजूद नहीं थे और ईरान पर हो रही इस लगातार बमबारी के बीच अब तक सुरक्षित हैं।

देश के सर्वोच्च नेता का चुनाव करने वाली 88 सदस्यीय मौलवियों की संस्था, ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ ने सभी ईरानियों से एकजुटता बनाए रखने और मोजतबा खामेनेई का समर्थन करने का आह्वान किया है।

रविवार को सरकारी मीडिया पर जारी एक बयान में इस असेंबली ने स्पष्ट किया कि मोजतबा को एक “निर्णायक वोट” के आधार पर चुना गया है। बयान में देशवासियों, विशेषकर मदरसों और विश्वविद्यालयों के बुद्धिजीवियों तथा कुलीन वर्ग से नए नेतृत्व के प्रति निष्ठा की शपथ लेने और राष्ट्रीय एकता को कायम रखने का आग्रह किया गया।

सत्ता के आंतरिक घेरे में दशकों का प्रभाव

मोजतबा खामेनेई ने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा है और न ही उन्होंने जनता के बीच जाकर सार्वजनिक पद की मांग की है। इसके बावजूद, वह पिछले कई दशकों से अपने पिता के आंतरिक घेरे में एक बेहद प्रभावशाली व्यक्ति रहे हैं। अर्धसैनिक बल ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) के साथ उनके हमेशा से बहुत गहरे संबंध रहे हैं।

शनिवार, 28 फरवरी को तेहरान स्थित उनके परिसर पर हुए हमले में अयातुल्ला अली खामेनेई के मारे जाने से पहले ही मोजतबा को उनके शीर्ष संभावित उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा था। उनके दिवंगत पिता ने लगभग आठ वर्षों तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया था और उसके बाद 36 वर्षों तक देश की पूर्ण सत्ता संभाली थी।

युवा खामेनेई का सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि ईरान के सत्ता प्रतिष्ठान में अभी भी कट्टरपंथी गुटों की पकड़ बेहद मजबूत है। इससे यह भी अंदेशा होता है कि मौजूदा सरकार निकट भविष्य में किसी भी तरह के समझौते या बातचीत के पक्ष में नहीं है।

वंशवाद का आरोप और लो-प्रोफाइल छवि

मोजतबा ने कभी भी सार्वजनिक रूप से अपने उत्तराधिकार के संवेदनशील मुद्दे पर चर्चा नहीं की। इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि उनका सर्वोच्च नेता बनना 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले के पहलवी राजतंत्र (वंशवाद) की याद दिलाता है।

विवादों से बचने के लिए उन्होंने हमेशा खुद को काफी लो-प्रोफाइल रखा। उन्होंने कभी कोई सार्वजनिक भाषण, शुक्रवार की नमाज का उपदेश या राजनीतिक संबोधन नहीं दिया। स्थिति यह है कि कई ईरानियों ने आज तक उनकी आवाज तक नहीं सुनी है, भले ही वे यह भली-भांति जानते थे कि मोजतबा धार्मिक सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर तेजी से उभरता हुआ एक सितारा हैं।

विरोध प्रदर्शनों के हिंसक दमन के आरोप

पिछले करीब दो दशकों से, घरेलू और विदेशी विरोधी मोजतबा का नाम ईरानी प्रदर्शनकारियों के हिंसक दमन से जोड़ते रहे हैं। ईरान के सुधारवादी खेमे ने सबसे पहले उन पर 2009 के ‘ग्रीन मूवमेंट’ के दौरान चुनाव में धांधली करने और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को कुचलने के लिए IRGC के बासिज बल का इस्तेमाल करने का गंभीर आरोप लगाया था। यह आंदोलन तब शुरू हुआ था जब लोकलुभावन नेता महमूद अहमदीनेजाद को एक विवादित चुनाव में फिर से राष्ट्रपति चुना गया था और उसके बाद सुधारवादी नेताओं और उनके समर्थकों पर कड़ी कार्रवाई की गई थी।

तब से लेकर अब तक, बासिज बलों ने कई राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों को बेरहमी से दबाया है। इसका सबसे प्रमुख उदाहरण दो महीने पहले देखने को मिला था। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, 8 और 9 जनवरी की रातों को सरकारी बलों ने हजारों लोगों की हत्या कर दी थी। हालांकि, दिवंगत सर्वोच्च नेता और मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान इन अभूतपूर्व हत्याओं के लिए हमेशा की तरह अमेरिका और इजरायल द्वारा वित्तपोषित, प्रशिक्षित और हथियारबंद आतंकवादियों तथा दंगाइयों को ही जिम्मेदार ठहराते रहे हैं।

आर्थिक साम्राज्य और सैन्य पृष्ठभूमि

मोजतबा खामेनेई ने अपने युवा दिनों से ही IRGC के भीतर मजबूत संबंध विकसित करने शुरू कर दिए थे। उन्होंने 1980 के दशक के ईरान-इराक युद्ध के दौरान इस बल की ‘हबीब बटालियन’ में कई अभियानों में सेवाएं दी थीं। उनके कई साथी, जिनमें अन्य मौलवी भी शामिल थे, बाद में इस्लामी गणराज्य के सुरक्षा और खुफिया तंत्र में शीर्ष पदों पर पहुंचे।

अमेरिका और पश्चिमी देशों के सख्त प्रतिबंधों का सामना कर रहे मोजतबा के बारे में पश्चिमी मीडिया की रिपोर्ट्स का दावा है कि उन्होंने कई देशों में संपत्तियों वाला एक विशाल आर्थिक साम्राज्य खड़ा कर लिया है। माना जाता है कि उनका नाम सीधे तौर पर किसी भी वित्तीय लेन-देन में शामिल नहीं होता, लेकिन कथित तौर पर उन्होंने सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े लोगों के एक बड़े नेटवर्क के जरिए पिछले कई वर्षों में अरबों डॉलर का हेरफेर किया है।

एक प्रमुख वित्तीय रिपोर्ट में मोजतबा के तार अली अंसारी से भी जोड़े गए थे। अंसारी पिछले साल के अंत में तब चर्चा में आए थे जब उनके ‘बैंक अयान्देह’ को दिवालिया होने के कारण सरकार द्वारा जबरन भंग कर दिया गया था। इस बैंक ने अज्ञात प्रभावशाली लोगों को भारी कर्ज दिया था, जिससे उस पर भारी कर्ज चढ़ गया था। बैंक के डूबने से ईरान की बेलगाम महंगाई और बढ़ गई तथा जनता को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा, क्योंकि घाटे की भरपाई आंशिक रूप से सार्वजनिक धन के माध्यम से की गई थी। मोजतबा और अंसारी दोनों ने ही इन आरोपों पर कभी सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहा है, जिनमें यूरोपीय देशों में लग्जरी संपत्तियों की खरीद की बात भी शामिल है।

धार्मिक पद का पेंच और मौजूदा हालात

मोजतबा की धार्मिक साख भी ईरान के भीतर एक बहस का विषय रही है। वह एक ‘होजतोलस्लाम’ (मध्यम स्तर के मौलवी) हैं, न कि सर्वोच्च धार्मिक पद ‘अयातुल्ला’ के धारक। हालांकि, उनके पिता भी 1989 में देश के सर्वोच्च नेता बनते समय अयातुल्ला नहीं थे और उनके लिए तब विशेष रूप से कानून में संशोधन किया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि मोजतबा के मामले में भी ऐसा ही कोई कानूनी संशोधन संभव है।

फिलहाल, यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है कि ईरान अपने नए नेतृत्व की औपचारिक घोषणा कब और कैसे आगे बढ़ाएगा। देश भर में अमेरिका और इजरायल का तीव्र बमबारी अभियान जारी है, जिसके बीच ईरान ने एक बार फिर राष्ट्रव्यापी इंटरनेट ब्लैकआउट लागू कर दिया है और सूचनाओं के प्रवाह पर सख्त पाबंदियां लगा दी हैं।

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