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सूरत कपड़ा उद्योग पर संकट: मजदूर लौटे घर, मिलें हफ्ते में दो दिन रहेंगी बंद

| Updated: March 31, 2026 14:46

एलपीजी संकट और मजदूरों के भारी पलायन से सूरत का टेक्सटाइल सेक्टर बेहाल, उत्पादन 50% गिरा; मिल मालिकों ने लिया हफ्ते में दो दिन काम बंद रखने का बड़ा फैसला।

सूरत का कपड़ा उद्योग इस समय भारी मजदूरों की कमी से जूझ रहा है। उत्पादन और बढ़ती लागत को नियंत्रित करने के लिए टेक्सटाइल प्रोसेसर्स ने काम के घंटे कम करने और हफ्ते में दो दिन अपनी इकाइयां बंद रखने का बड़ा फैसला लिया है।

दक्षिण गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन (SGTPA) के अध्यक्ष जीतू वखारिया के अनुसार, हर साल होली और फसल कटाई के मौसम में मजदूर अपने गृह राज्यों को लौट जाते हैं। लेकिन इस बार पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण पैदा हुए एलपीजी गैस संकट ने इस समस्या को और भी गंभीर बना दिया है।

आमतौर पर मिल और प्रोसेसिंग हाउस के कर्मचारियों को हफ्ते में एक दिन की छुट्टी मिलती है, जिसे भारी मांग के दौरान रद्द कर दिया जाता है। मिल मालिकों का कहना है कि अब यह दो दिन का शटडाउन साप्ताहिक अवकाश को मिलाकर होगा। इसके अलावा, निर्यात के लिए भेजा गया माल बंदरगाहों या रास्ते में फंसा हुआ है, जिससे भविष्य में मांग गिरने की भी आशंका जताई जा रही है।

सूरत के पावर लूम्स में उत्तर प्रदेश, बिहार और ओडिशा के आठ लाख से अधिक प्रवासी मजदूर काम करते हैं। वखारिया का कहना है कि इनमें से लगभग 30 प्रतिशत लोग अपने घर जा चुके हैं, जिससे यह भारी संकट पैदा हुआ है।

मजदूरों की इस कमी, कपड़े की मांग और अन्य अहम मुद्दों पर चर्चा के लिए SGTPA ने कपड़ा उद्योग समूहों के साथ एक अहम बैठक की। इसी बैठक में मिलों को हफ्ते में दो दिन बंद रखने पर सहमति बनी है।

वखारिया ने बताया कि जब तक हालात सामान्य नहीं हो जाते, यह दो दिन की बंदी जारी रहेगी। इसका मुख्य उद्देश्य उत्पादन की गति और बाजार में मांग-आपूर्ति का संतुलन बनाए रखना है। हालात इतने चुनौतीपूर्ण हैं कि कुछ कारखानों ने अपनी नाइट शिफ्ट पूरी तरह रद्द कर दी है और वे केवल दिन में सीमित मजदूरों के साथ काम कर रहे हैं।

सूरत में लगभग 400 डाइंग और प्रिंटिंग मिलें तथा लाखों पावरलूम इकाइयां हैं, जो भारी संख्या में प्रवासी मजदूरों को रोजगार देती हैं। उद्योग से जुड़े लोगों के मुताबिक, हर एक डाइंग और प्रिंटिंग मिल में करीब 350 से 400 मजदूर काम करते हैं। SGTPA द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है कि इस प्रस्ताव का मकसद उत्पादन लागत को घटाना और लंबे समय में उद्योग के भीतर स्थिरता बनाए रखना है।

सचिन वीविंग एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष महेंद्र रामोलिया, जो खुद 160 रेपिअर लूम मशीनों वाली एक यूनिट चलाते हैं, बताते हैं कि सचिन जीआईडीसी में पावर लूम, रेपिअर जैक्वार्ड और प्रिंटिंग मिलों सहित लगभग 2,200 कारखाने हैं। मजदूरों के न होने से उद्योग ने अपने उत्पादन में 50 प्रतिशत तक की कटौती कर दी है। रामोलिया को आशंका है कि आने वाले दिनों में स्थिति और बिगड़ेगी तथा उत्पादन का ग्राफ और नीचे जाएगा।

एलपीजी गैस सिलेंडर की कमी के कारण कई कारखाने अपने मजदूरों को सस्ती दरों पर भोजन उपलब्ध करा रहे हैं। हालांकि, रामोलिया के अनुसार, जो मजदूर अपने परिवारों के साथ यहां रहते हैं, उनके लिए स्थिति बेहद कष्टदायक हो गई है, जिसके चलते उन्हें अपनी जन्मभूमि वापस लौटना पड़ रहा है।

पांडेसरा में एक डाइंग और प्रिंटिंग मिल के मालिक कमल तुलस्यान का कहना है कि हर साल होली के बाद लगभग 25 प्रतिशत लेबर कम हो जाती है। लेकिन इस बार युद्ध की स्थिति ने कपड़ा उद्योग में दहशत पैदा कर दी है। निर्यात का माल फंसा हुआ है और घरेलू बाजार में भी कोई खास मांग नहीं है।

तुलस्यान ने आगे बताया कि एलपीजी संकट ने मजदूरों की कमी में 10 प्रतिशत का और इजाफा कर दिया है। एक बार जब मजदूर अपने गांव चले जाते हैं, तो वे दो महीने या उससे अधिक समय बाद ही लौटते हैं, जिससे कारखानों को सुचारू रूप से चलाना बेहद मुश्किल हो जाता है।

टेक्सटाइल कारोबारी संजय सरोगी ने अपने कर्मचारियों को शहर में रोके रखने के लिए एक नई पहल की है। उन्होंने मजदूरों को मुफ्त भोजन देना शुरू कर दिया है।

वह बताते हैं कि वे मजदूरों के परिवारों के लिए भी घर पर खाने का इंतजाम कर रहे हैं, क्योंकि लोगों को मजबूरी में ब्लैक मार्केट से रसोई गैस खरीदनी पड़ रही है। सरोगी के मुताबिक, मिलों में इस समय 40 प्रतिशत तक मजदूरों की कमी देखी जा रही है और हर दिन लोग ट्रेनों व लग्जरी बसों के जरिए अपने घरों की ओर पलायन कर रहे हैं।

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