दिल्ली की एक अदालत ने गूगल, मेटा और कई अज्ञात मीडिया घरानों पर सख्त रुख अपनाते हुए एक अहम आदेश जारी किया है। कोर्ट ने इन सभी प्लेटफॉर्म्स को मनोज केसरी चंद संदेसरा और उनके परिवार का नाम स्टर्लिंग बायोटेक लिमिटेड के कथित बैंक धोखाधड़ी मामले से जोड़ने वाली किसी भी सामग्री को प्रकाशित या होस्ट करने से रोक दिया है।
तीस हजारी कोर्ट की सीनियर सिविल जज ऋचा चड्ढा ने इस मामले में एकतरफा अंतरिम निषेधाज्ञा (ex parte interim injunction) जारी की है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और ‘जॉन डो’ (अज्ञात) प्रतिवादियों को निर्देश दिया है कि वे संदेसरा द्वारा बताए गए विशिष्ट लेखों और यूआरएल को तुरंत डी-इंडेक्स और डी-लिस्ट करके हटा दें।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी साफ किया है कि याचिका में स्पष्ट रूप से पहचाने नहीं गए किसी भी अन्य लिंक को भी 36 घंटे के भीतर सर्च रिजल्ट्स और प्लेटफॉर्म से हटाना अनिवार्य होगा।
यह महत्वपूर्ण आदेश 4 अप्रैल को पारित किया गया। इससे पहले संदेसरा ने अदालत में एक मानहानि का मुकदमा दायर किया था। उनकी दलील थी कि उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही पूरी तरह बंद होने के बावजूद कई समाचार रिपोर्ट और ऑनलाइन वीडियो लगातार उन्हें और उनके परिवार को भगोड़े और वित्तीय अपराधी के रूप में पेश कर रहे हैं।
याचिका के अनुसार, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने नवंबर और दिसंबर 2025 में एक समझौते को स्वीकार किया था। इस समझौते के तहत बैंकों को 5,100 करोड़ रुपये से अधिक का भारी-भरकम भुगतान किया गया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने प्रमोटरों के खिलाफ आपराधिक मामलों और उससे जुड़ी सभी जांचों को रद्द करने का आदेश दे दिया था।
इस मामले में संदेसरा ने ‘भूल जाने के अधिकार’ (right to be forgotten) का भी मजबूती से हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि इस तरह की भ्रामक सामग्री का लगातार इंटरनेट पर मौजूद रहना उनके निजता और सम्मान के मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है, जो उनकी प्रतिष्ठा को लगातार नुकसान पहुंचा रहा है।
अदालत ने इन सभी दलीलों से सहमति जताते हुए कहा कि संदेसरा और उनके परिवार को इस मामले से जोड़ने वाली सामग्री का लगातार प्रकाशन उन्हें कलंकित करेगा। जज ने इस बात पर विशेष रूप से टिप्पणी की कि प्रेस की स्वतंत्रता असीमित नहीं है और इसे हमेशा उचित सीमाओं के भीतर ही काम करना चाहिए।
कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि कई खबरों की हेडलाइन में जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया था, वह वादी को सीधे तौर पर अपराधी ठहराने वाली थी। अदालत ने माना कि कानूनी कार्यवाही रद्द होने के बाद भी ऐसी सामग्री का उपलब्ध रहना किसी की भी प्रतिष्ठा को उस हद तक नुकसान पहुंचा सकता है जिसकी भरपाई केवल पैसों से नहीं की जा सकती।
मीडिया की जिम्मेदारी पर जोर देते हुए अदालत ने कहा कि रिपोर्टिंग हमेशा सटीकता, निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता के मानकों पर खरी उतरनी चाहिए और सनसनीखेज होने से पूरी तरह बचना चाहिए। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने तुरंत अनुपालन का निर्देश देते हुए यह अंतरिम निषेधाज्ञा प्रदान कर दी है।
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