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कैंसर की नकली दवा का काला बाज़ार: कैसे अस्पतालों से मरीजों तक पहुँच रहा है मौत का सौदा?

| Updated: April 13, 2026 14:35

दिल्ली के नामी अस्पतालों के कर्मचारियों से लेकर मरीजों तक कैसे पहुंच रहा था नकली 'कीट्रूडा' (Keytruda)? जानिए कैंसर के इलाज की आड़ में हो रहे इस खौफनाक मौत के सौदे की पूरी इनसाइड स्टोरी।

पंजाब के एक साधारण से घर में दुनिया की सबसे महंगी और असरदार कैंसर की दवाइयों में से एक की कहानी जन्म लेती है। यह कहानी उस देश की है जहां कैंसर के मरीजों की संख्या बेहद तेजी से बढ़ रही है।

साल 2022 की शुरुआत में चंडीगढ़ के पास रहने वाली एक 56 वर्षीय महिला ने पीजीआईएमईआर (PGIMER) में लिवर कैंसर का इलाज शुरू किया। डॉक्टरों ने उन्हें ‘कीट्रूडा’ (Keytruda) नामक दवा लेने की सलाह दी।

यह अमेरिकी फार्मा कंपनी मर्क एंड कंपनी (MSD) द्वारा बनाई गई एक बेहद असरदार इम्यूनोथेरेपी दवा है। बाजार में इसकी 100 मिलीग्राम की एक शीशी की आधिकारिक कीमत 1.5 लाख रुपये से अधिक है, जिसका खर्च उठाना ज्यादातर परिवारों के बस की बात नहीं है।

इतने भारी आर्थिक बोझ से जूझ रहे इस परिवार ने सितंबर से दिसंबर 2022 के बीच एक स्थानीय मेडिकल स्टोर से “डिस्काउंट” पर लगभग 16 लाख रुपये में 12 शीशियां खरीदीं।

लेकिन परिवार की यह छोटी सी राहत उस समय एक बड़े सदमे में बदल गई जब उनके पास दिल्ली पुलिस का फोन आया। पुलिस ने उन्हें बताया कि जो दवाएं उन्होंने इस्तेमाल की थीं, वे पूरी तरह से नकली थीं और उनके अंदर केवल एंटीफंगल दवा भरी हुई थी।

एक बड़े अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय गिरोह का पर्दाफाश

यह मामला भारत में कीट्रूडा के बढ़ते काले बाजार का सिर्फ एक उदाहरण है। एक विस्तृत पड़ताल और अंतरराष्ट्रीय खोजी पत्रकारों के सहयोग से इस खौफनाक रैकेट का पर्दाफाश हुआ है।

यह रिपोर्ट 12,500 से अधिक पन्नों के पुलिस व अस्पताल रिकॉर्ड की गहन जांच तथा ऑन्कोलॉजिस्ट सहित कई अस्पताल कर्मचारियों के साक्षात्कारों पर आधारित है। दिल्ली में 150 से अधिक ऐसे मरीजों के रिकॉर्ड खंगाले गए जिन्हें असली कीट्रूडा दी गई थी।

जांच में पाया गया कि मरीजों को दी गई दवा के बैच नंबर बिल्कुल वही थे जो जांचकर्ताओं ने दिल्ली के शीर्ष अस्पतालों के कर्मचारियों के पास से जब्त किए थे।

वैश्विक स्तर पर यह सामने आया है कि कैसे दवा बनाने वाली बड़ी कंपनियां अपनी बिक्री बढ़ाने और लॉबिंग के जरिए कीमतें ऊंची रखने की तरकीबें अपनाती हैं। वे इन दवाओं के सस्ते विकल्पों को लाखों कैंसर मरीजों तक पहुंचने से रोकने का भी प्रयास करती हैं। इसी बीच नेपाल से लेकर मैक्सिको तक नकली दवाओं का यह काला धंधा फल-फूल रहा है।

भारत में एंटीबायोटिक से लेकर एंटासिड तक नकली दवाएं मिलना आम बात है। लेकिन जब नकली कीट्रूडा लेने वाले मरीजों से बात की गई, तो एक खौफनाक तस्वीर सामने आई।

यह कहानी वैश्विक फार्मा कंपनियों, सरकारी नियमों और अस्पताल प्रशासन की निगरानी के बीच मौजूद उस खाली जगह की है, जहां एक भ्रष्ट गठजोड़ बेखौफ होकर मिलावटी जीवन रक्षक दवाएं बेच रहा है।

चंडीगढ़ से दिल्ली तक: विश्वास का कत्ल

चंडीगढ़ की जिस मरीज को यह नकली दवा दी गई, उनका परिवार छोटी-मोटी खेती करता है। उनके लिए ये शीशियां तापमान-नियंत्रित पैकेजिंग में आई थीं और उन पर लगे लेबल बिल्कुल असली लग रहे थे। अस्पताल में ही ये दवाएं मरीज को चढ़ाई गईं। परिवार के मुताबिक उन्हें कभी इस बात का शक ही नहीं हुआ कि पैकेट में कुछ गड़बड़ है।

मरीज की पोती का कहना है कि उन्होंने जो खरीदा, उस पर पूरा भरोसा किया। कैंसर के इलाज का खर्च बहुत ज्यादा होता है और वे आज भी अपने लिए गए कर्ज का ब्याज चुका रहे हैं। पैसे की कमी के कारण अब उन्होंने कीट्रूडा लेना पूरी तरह से बंद कर दिया है।

इस परिवार की तरह ही कई अन्य मरीजों के पास भी कोई बीमा, रीइंबर्समेंट योजना या कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं थी। उन्हें यह भनक तक नहीं थी कि स्थानीय मेडिकल स्टोर को ये शीशियां एक ऐसे “डिस्ट्रीब्यूटर” ने दी थीं, जो पुलिस के रडार पर था।

जब तक पुलिस ने परिवार से संपर्क किया, तब तक जांच अधिकारी इस बहु-शहरी रैकेट की कड़ियां जोड़ चुके थे। इस मामले में 38 वर्षीय ‘डिस्ट्रीब्यूटर’ नीरज चौहान को 11 अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार किया गया है। वह इस पूरे नेटवर्क की एक अहम कड़ी है और फिलहाल न्यायिक हिरासत में है। दिल्ली पुलिस की एफआईआर के बाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया है।

अधिकारियों के अनुसार यह गिरोह बहुत ही शातिर तरीके से काम करता था। वे कीट्रूडा की खाली शीशियां इकट्ठा करते, उनमें एंटीफंगल जैसी सस्ती दवाइयां भरते, उन्हें फिर से सील करते और 100-मिलीग्राम की एक शीशी को 90,000 रुपये तक में बेच देते थे।

यह बाजार मूल्य से 40% कम था। थोड़ी सी भी छूट मरीजों को बड़ी राहत लगती है और अनिश्चितता के उस दौर में वे सिस्टम पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेते हैं।

11 मार्च 2024 को पुलिस ने चौहान को गुरुग्राम में हिरासत में लिया और उसके घर की तलाशी ली। वहां एक लकड़ी की अलमारी से कीट्रूडा के लेबल वाली कई शीशियां मिलीं, जिनके बैच नंबर X018554, X026725, X020722 और W033216 थे।

वहां से कुल 46 भरी हुई शीशियां, 165 खाली शीशियां और 239 खाली पैकिंग बॉक्स बरामद हुए। पुलिस का कहना है कि ये बैच नंबर ही इस जांच की सबसे अहम कड़ी बन गए।

कैंसर अस्पताल के अंदर की सेंधमारी

सच्चाई की तलाश जांचकर्ताओं को भारत के सबसे प्रतिष्ठित ऑन्कोलॉजी विभागों में से एक तक ले गई। 12 मार्च 2024 को दिल्ली के राजीव गांधी कैंसर संस्थान और अनुसंधान केंद्र (RGCIRC) के डी ब्लॉक की दूसरी मंजिल पर स्थित साइटोटॉक्सिक मिक्सिंग यूनिट से दो व्यक्ति बाहर निकले।

यह वह फार्मेसी सुविधा है जहां सीसीटीवी की चौबीसों घंटे निगरानी में शक्तिशाली कैंसर रोधी दवाएं मापी और तैयार की जाती हैं।

एक के पास काले और नीले रंग का बैग था, जबकि दूसरे के पास बैकपैक था। लेकिन वे अस्पताल के बाहर नहीं जा सके। अपराध शाखा के अधिकारियों ने संस्थान के ऑन्कोलॉजी विभाग के फार्मासिस्ट 39 वर्षीय कोमल तिवारी और 30 वर्षीय अभिनय को रास्ते में ही रोक लिया।

कोमल के बैग में कीट्रूडा की पांच आधी भरी हुई शीशियां थीं। इनमें से चार का बैच नंबर W031928 और एक का X018554 था। इसके साथ ही W031928 बैच के तीन खाली बॉक्स भी थे।

वहीं अभिनय के बैकपैक में आधी भरी हुई पांच और शीशियां मिलीं। इनमें W008961, W029734, और W023257 बैच की एक-एक और X018554 बैच की दो शीशियां थीं। उसके पास से W031928 और W034646 बैच के दो खाली बॉक्स भी बरामद हुए।

ये दोनों दुनिया की सबसे महंगी कैंसर दवा की दस आधी भरी शीशियां और पांच खाली बॉक्स साधारण बैग में छिपाकर उस अस्पताल के गलियारों से बाहर ले जा रहे थे जहां से इन्हें मरीजों को दिया गया था।

पुलिस ने इन सामानों को एक प्लास्टिक के डिब्बे में रखकर सील कर दिया। अब यह एक 12-सदस्यीय गिरोह के खिलाफ सबसे मजबूत सुबूतों में से एक है। तिवारी और अभिनय को फिलहाल जमानत मिल गई है।

पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि यह आधी भरी हुई कीट्रूडा उनके पूर्व सहकर्मी 33 वर्षीय परवेज़ के लिए थी, जो इस मामले का मुख्य आरोपी है और अभी न्यायिक हिरासत में है। परवेज़ ने फरवरी 2022 तक इसी अस्पताल में फार्मासिस्ट के रूप में काम किया था।

बाद में वह यमुना विहार में रियल एस्टेट के कारोबार में चला गया। वह एक अन्य आरोपी विफिल को 2014 से जानता था। गिरफ्तारी से ठीक एक महीने पहले कोमल और परवेज़ ने कैंसर अस्पताल के पास ‘डॉक्टर फार्मेसी’ नाम से एक दुकान खोली थी।

परवेज़ को दिल्ली में एक काले रंग के लैपटॉप बैग के साथ गिरफ्तार किया गया था। इस बैग में कीट्रूडा की छह आधी भरी हुई शीशियां थीं। उसने पुलिस को बताया कि यह पूरा गोरखधंधा कैसे चलता था। उसकी गिरफ्तारी से लगभग एक साल पहले विफिल ने उसे इस्तेमाल की गई कैंसर रोधी इंजेक्शनों में एंटीफंगल दवा भरकर कम कीमत पर बेचने का आइडिया दिया था।

परवेज़ ने कोमल और अभिनय को लालच दिया कि वह एक खाली शीशी के 3,000 रुपये और भरी हुई शीशी के 40,000 से 50,000 रुपये देगा। इस लालच में आकर पिछले आठ-नौ महीनों में उन्होंने परवेज़ को भारी मात्रा में खाली और भरी हुई शीशियां बेचीं।

निगरानी में चूक और अस्पताल के नए नियम

लगभग एक महीने बाद अस्पताल प्रशासन ने यह जांचने के लिए सितंबर 2023 से मार्च 2024 तक के डेटा की जांच की कि क्या पुलिस द्वारा बरामद किए गए बैच मरीजों को दी गई दवा से मेल खाते हैं। इस दौरान कम से कम 84 मरीजों को कीट्रूडा दी गई थी। जांच में पता चला कि इस्तेमाल किए गए छह बैच नंबर पुलिस को मिली शीशियों के नंबरों से पूरी तरह मेल खाते थे।

अस्पताल में कैंसर की दवा मिलाने का काम सीसीटीवी की निगरानी में होता था और खाली शीशियों को बारकोड करके निस्तारण के लिए दिया जाता था। इसके बावजूद यह चूक हुई।

अस्पताल प्रशासन ने पुलिस को बताया कि खाली शीशियों की गिनती करने की कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं थी क्योंकि व्यावहारिक रूप से ऐसा करना संभव नहीं था। इसी खामी का फायदा उठाकर खाली शीशियों को नष्ट करने से पहले ही गायब कर दिया जाता था।

इस पर राजीव गांधी कैंसर संस्थान के चिकित्सा निदेशक डॉ. सुधीर रावल ने बताया कि अस्पताल ने अब कई कड़े बदलाव किए हैं। कीट्रूडा जैसी महंगी कैंसर दवाएं अब मरीज के परिजनों के सामने तैयार की जाती हैं और दवा मिलाने वाली सभी जगहों पर कैमरे लगा दिए गए हैं।

हर शीशी की गिनती और प्रिस्क्रिप्शन से उसका मिलान करने की सख्त व्यवस्था की गई है। इस्तेमाल की गई शीशियों के निस्तारण के लिए पूरी तरह से लॉक होने वाले साइटोटॉक्सिक वेस्ट बिन लगाए गए हैं।

एक अन्य अस्पताल के नर्सिंग टीम लीडर की भूमिका

इस गिरोह के तार द्वारका स्थित वेंकटेश्वर अस्पताल तक भी फैले थे। 9 जुलाई 2018 को रोहित सिंह बिष्ट (36) ने वहां के ऑनको डे केयर यूनिट में नर्सिंग टीम लीडर के रूप में काम शुरू किया।

अप्रैल 2021 तक उसे इंचार्ज बना दिया गया और कीमोथेरेपी की सभी दवाएं उसी की देखरेख में आने लगीं। 14 मार्च 2024 को रोहित को अपने ही यूनिट से कीट्रूडा की शीशियां चुराने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।

जमानत पर बाहर आ चुके रोहित का संपर्क करीब डेढ़ साल पहले नीरज से हुआ था। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, नीरज के लालच देने पर रोहित ने कैंसर की दवाइयां चुरानी शुरू कर दीं क्योंकि उसे इसके बदले 65,000 रुपये मिलते थे।

गिरफ्तारी से करीब आठ महीने पहले उसने नीरज को 40 इंजेक्शन और 10-15 खाली शीशियां दी थीं। नीरज के पास से बरामद की गई कीट्रूडा की शीशियां वेंकटेश्वर अस्पताल के मरीजों को दी गई दवाइयों के बैच से सटीक रूप से मेल खाती थीं।

इस खुलासे के बाद वेंकटेश्वर अस्पताल ने पुलिस को बताया कि उन्होंने अब खाली शीशियों को जमा करने और नष्ट करने की प्रक्रिया को पूरी तरह से निगरानी में और सुरक्षा गार्ड्स की मौजूदगी में करने का कड़ा नियम बना लिया है।

फार्मासिस्ट से तस्कर बनने की कहानी

जिस दिन रोहित की गिरफ्तारी हुई, उसी दिन 33 वर्षीय जितेंद्र को दिल्ली पुलिस ने गुरुग्राम में नीरज के घर जाते समय पकड़ लिया। उसके पास कीट्रूडा की दो भरी हुई शीशियां थीं जो उसने फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट में एक मरीज की दवा से चोरी की थीं।

अक्टूबर 2023 में जितेंद्र फोर्टिस में क्लिनिकल फार्मासिस्ट के तौर पर जुड़ा था। उसने पुलिस को बताया कि 2022 के अंत में एक इंटरव्यू के दौरान उसकी मुलाकात नीरज चौहान से हुई थी।

नीरज ने उसे खाली शीशियों के 5,000 रुपये और भरी हुई शीशियों के लिए बाजार मूल्य का 40% देने का प्रस्ताव रखा था। व्हाट्सएप चैट्स से यह साबित हुआ कि वे दोनों किस तरह से नए बैच और खाली शीशियों की व्यवस्था करने की योजना बनाते थे।

फोर्टिस के एक प्रवक्ता ने इस मामले पर सफाई देते हुए कहा कि संस्थान ऑन्कोलॉजी दवाओं की खरीद और इस्तेमाल के लिए कड़े प्रोटोकॉल का पालन करता है और हर स्तर पर कड़ी जांच की जाती है।

विशेष पुलिस आयुक्त (अपराध) देवेश चंद्र श्रीवास्तव ने इस मामले को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि यह जांच सीधे तौर पर गंभीर मरीजों की सुरक्षा से जुड़ी है। इस रैकेट ने दिखाया है कि कैसे सस्ते इलाज की तलाश में मरीज आसानी से नकली दवाओं का शिकार बन जाते हैं और पुलिस लगातार ऐसे और गिरोहों की तलाश कर रही है।

मौत के बाद आया पुलिस का फोन

कीट्रूडा जैसी दवाओं की आस लगाए बैठे मरीजों के लिए ये गिरफ्तारियां कोई मायने नहीं रखतीं। जनवरी 2022 में बिहार के खजौली की एक 38 वर्षीय गृहिणी के गले में सूजन और लगातार दर्द की शिकायत हुई। दिल्ली के राजीव गांधी कैंसर संस्थान में उन्हें गाल और होंठ के अंदर मेटास्टेटिक कार्सिनोमा होने का पता चला।

इलाज के भारी खर्च के कारण उन्हें पटना के बुद्धा कैंसर सेंटर में शिफ्ट होना पड़ा। बाजार कीमत न चुका पाने के कारण, उन्होंने एक ई-कॉमर्स साइट के जरिए 90,000 रुपये प्रति इंजेक्शन के भारी डिस्काउंट पर दो इंजेक्शन खरीदे। दूसरा इंजेक्शन लगने के बाद उनकी हालत तेजी से बिगड़ने लगी और 11 सितंबर 2022 को उनका निधन हो गया। परिवार बस अपनी किस्मत को कोसता रह गया।

लगभग दो साल बाद, 17 अप्रैल 2024 को उनके परिवार के पास एक फोन आया। वह फोन दिल्ली पुलिस का था, जिसने उन्हें बताया कि अपनी जान बचाने के लिए उन्होंने जो दवा खरीदी थी, वह असल में मौत का एक नकली सौदा थी।

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