अहमदाबाद में बंदरों के हमलों और रेस्क्यू कॉल की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए वन विभाग ने एक बेहद अहम कदम उठाया है। शहर में पहली बार बंदरों की आधिकारिक गिनती शुरू की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रयास से केवल शिकायतों के आधार पर काम करने के बजाय, अब सटीक आंकड़ों के जरिये इंसानों और बंदरों के बीच होने वाले टकराव का बेहतर समाधान निकाला जा सकेगा।
दरअसल, मंदिरों, सब्जी मंडियों, आवासीय सोसाइटियों और खुले मैदानों के आसपास लंगूरों व बंदरों को खाना खिलाने का चलन काफी बढ़ गया है। इस वजह से कई तरह की चिंताएं पैदा हो रही हैं और इसी हालात को ध्यान में रखते हुए यह सर्वेक्षण किया जा रहा है।
मुख्य गिनती शुरू होने से पहले एक ऑनलाइन सर्वे किया जा रहा है। इसके लिए 27 बिंदुओं वाली एक विस्तृत प्रश्नावली तैयार की गई है। इसमें लोगों से बंदरों के झुंड के आकार, कचरा फेंकने के गलत तरीकों के प्रभाव और बंदरों द्वारा मचाए जाने वाले उपद्रव के बारे में अहम जानकारी मांगी गई है।
इस सर्वेक्षण के लिए अहमदाबाद नगर निगम (एएमसी) के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों को अलग-अलग जोन में बांटा गया है। गूगल फॉर्म के जरिए एक तय प्रारूप में आवासीय सोसाइटियों से जमीनी डेटा इकट्ठा किया जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक, इस सर्वे के बाद एक ट्रायल गिनती होगी ताकि मुख्य जनगणना के लिए सबसे सटीक तरीका अपनाया जा सके।
इस विशेष सर्वे का प्रस्ताव डिप्टी कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स (डीसीएफ) मीनल जानी ने रखा था, जिसे राज्य वन विभाग ने अपनी मंजूरी दे दी है। इस पूरे प्रोजेक्ट का नेतृत्व शोधकर्ता दीपा गवली के तहत अहमदाबाद सोशल फॉरेस्ट्री सर्कल कर रहा है।
प्रोजेक्ट के नोडल अधिकारी और मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) के. रमेश ने बताया कि लगातार आ रही शिकायतों के कारण बार-बार रेस्क्यू ऑपरेशन चलाने पड़ते हैं। ऐसे में अब अहमदाबाद को इन सटीक आंकड़ों की जरूरत है कि बंदर कहां रहते हैं, उनकी संख्या कितनी है, वे कहां प्रजनन करते हैं और किस तरह घरों में घुसकर परेशानी खड़ी करते हैं।
अंतिम जनगणना में कई महत्वपूर्ण बातों पर फोकस किया जाएगा। इनमें नर और मादा बंदरों का अनुपात, उनके प्रजनन की स्थिति, आवाजाही के रास्ते, मौसमी बदलाव, पेड़ों का दायरा और उनके रहने के ठिकाने शामिल हैं। रमेश के अनुसार, इन निष्कर्षों से रेस्क्यू रणनीति में बड़े बदलाव किए जा सकेंगे और ज्यादा टकराव वाले इलाकों में टीमों की तैनाती आसान होगी।
मीनल जानी ने इस बात पर जोर दिया कि बंदरों की संख्या के साथ-साथ रेस्क्यू कॉल में भी इजाफा हो रहा है। वन विभाग इस बात का गहराई से अध्ययन करना चाहता है कि शहरी इलाकों में बंदरों की मौजूदगी पर उनके रहने की जगह, भोजन की उपलब्धता और मौसम का क्या प्रभाव पड़ता है।
शहर में अक्सर बंदरों के काटने, हमला करने और खाने की तलाश में घरों में घुसने की आपातकालीन कॉल आती रहती हैं। इसे देखते हुए वन विभाग ने 198 ऐसी जगहों की पहचान की है, जहां बंदरों की मौजूदगी एक स्थायी समस्या बन चुकी है।
इन प्रभावित इलाकों में वस्त्रापुर, नवरंगपुरा, थलतेज, बोपल, घुमा, आंबावाड़ी, पालड़ी, शाहीबाग, चांदखेड़ा, कुबेरनगर, नरोडा, नारोल, साबरमती, बिलासिया, मणिनगर और असरवा मुख्य रूप से शामिल हैं। यहां के निवासी लंबे समय से इस परेशानी का सामना कर रहे हैं।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि बंदरों को खाना खिलाना पहले एक पुण्य या दया का काम माना जाता था, लेकिन अब यह उनकी आक्रामकता और इंसानों पर निर्भरता का मुख्य कारण बन गया है। अहमदाबाद आगामी अंतरराष्ट्रीय आयोजनों की मेजबानी करने जा रहा है, ऐसे में लंगूरों की यह मौजूदगी शहर की छवि पर नकारात्मक असर डाल सकती है।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि साबरमती नदी पार करते समय मेट्रो ट्रेन को भी कई बार रोकना पड़ता है। बंदरों को डराकर भगाने के लिए ट्रेन का हॉर्न बजाना अब एक आम दिनचर्या बन गई है।
इस बढ़ती समस्या से निपटने के लिए वन विभाग ने जागरूकता अभियान और नियमों की सख्ती तेज कर दी है। विभाग ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत लंगूरों समेत किसी भी बंदर को खाना खिलाना पूरी तरह से दंडनीय अपराध है। पहली बार यह नियम तोड़ने पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है, जबकि बार-बार ऐसा करने पर व्यक्ति को जेल की सजा भी भुगतनी पड़ सकती है।
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