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विधानसभा चुनाव परिणाम: 1967 जैसे बड़े राजनीतिक बदलाव की आहट

| Updated: May 8, 2026 14:22

द्रविड़ किलों में सेंध और बंगाल में भगवा उदय: क्या भारतीय राजनीति में 1967 जैसा ऐतिहासिक बदलाव शुरू हो चुका है?

पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के हालिया विधानसभा चुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जो करीब छह दशक पुराने 1967 के ऐतिहासिक दौर की याद दिलाता है। जवाहरलाल नेहरू के निधन के ठीक तीन साल बाद, उस समय इन दोनों राज्यों की राजनीतिक जमीन पूरी तरह बदल गई थी और आज एक बार फिर वैसी ही हलचल महसूस की जा रही है।

तमिलनाडु में फरवरी 1967 का वह क्षण बेहद चौंकाने वाला था, जब कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री के. कामराज एक छात्र नेता से चुनाव हार गए थे। यह देश में दूसरी बार था जब किसी गैर-कांग्रेसी दल ने पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता संभाली थी। इससे पहले 1957 में केरल में कम्युनिस्ट पार्टी ने यह करिश्मा किया था।

उस दौर में सी.एन. अन्नादुराई के नेतृत्व वाली द्रमुक (DMK) ने बढ़ती कीमतों और केंद्र द्वारा हिंदी थोपे जाने के खिलाफ उपजे गुस्से के दम पर सत्ता हासिल की थी। बाद के वर्षों में द्रमुक से अलग होकर एमजीआर ने अन्नाद्रमुक (AIADMK) बनाई।

इन दो द्रविड़ दलों ने मिलकर एक ऐसा मजबूत तंत्र विकसित किया कि कांग्रेस 2026 तक सत्ता से बाहर रही। इस ‘द्रविड़ मॉडल’ ने सामाजिक न्याय और आर्थिक प्रगति को साथ जोड़कर राज्य में साठ वर्षों तक अपनी धाक जमाए रखी।

अब सिनेमाई पर्दे के सुपरस्टार और ‘तमिल वेट्री कड़गम’ (TVK) के नेता सी. जोसेफ विजय ने इस पुराने द्विध्रुवीय समीकरण को ध्वस्त कर दिया है। 1967 के बाद यह पहला मौका है जब किसी ऐसे दल के लिए सत्ता के द्वार खुले हैं, जो न तो द्रमुक है और न ही अन्नाद्रमुक। राज्य की राजनीति में आए इस अचानक बदलाव ने गठबंधन की नई संभावनाएं पैदा कर दी हैं।

कांग्रेस का टीवीके की ओर झुकाव भी इसी रणनीति का हिस्सा नजर आता है। द्रमुक के साथ कांग्रेस के संबंध पिछले कुछ समय से तनावपूर्ण थे। अब कांग्रेस को लग रहा है कि तमिलनाडु के इस बदलते नक्शे पर वह अपनी खोई हुई जमीन वापस पा सकती है।

यह कदम उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बिहार में राजद जैसे सहयोगियों के लिए भी एक संकेत है, जहां कांग्रेस लंबे समय से खुद को ‘जूनियर पार्टनर’ के रूप में उपेक्षित महसूस कर रही थी।

दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल में भी 1967 में पहली बार ‘संयुक्त मोर्चा’ की सरकार बनी थी। मार्च 1967 में बांग्ला कांग्रेस के अजय मुखर्जी ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली और ज्योति बसु उपमुख्यमंत्री बने।

वह राज्य के लिए भारी राजनीतिक उथल-पुथल का समय था, जब नक्सलबाड़ी आंदोलन की लहरें पूरे बंगाल को झकझोर रही थीं। हालांकि, वह गठबंधन सरकार उसी साल गिर गई और इसके बाद अस्थिरता का लंबा दौर चला।

सिद्धार्थ शंकर राय के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार 1972 से 1977 तक सत्ता में रही, लेकिन उनका कार्यकाल हिंसक चुनावों और आपातकाल के साये में रहा। 1977 के चुनावों में राय की सरकार बाहर हुई और वाम मोर्चे का 34 साल लंबा शासन शुरू हुआ। बंगाल की सत्ता में कांग्रेस की वापसी तब से अब तक नहीं हो पाई है।

वर्तमान स्थिति की बात करें तो, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ भारी असंतोष और मतदाता सूची में हुए बड़े बदलावों के बीच भाजपा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। राज्य की 294 सीटों में से 208 सीटें जीतकर भाजपा पहली बार बंगाल की सत्ता पर काबिज हुई है। इससे पहले केवल 1941 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने फजलुल हक की कैबिनेट में मंत्री के तौर पर सरकार में हिस्सेदारी की थी।

तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति के पारंपरिक ढांचे का टूटना अब हर बड़े राजनीतिक दल को अपनी पुरानी मान्यताओं पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करेगा। यदि कांग्रेस यहां ‘जूनियर पार्टनर’ की भूमिका से बाहर निकलने की कोशिश करती है, तो इसका असर उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के गठबंधन समीकरणों पर भी पड़ना तय है।

बंगाल में भी अब पुरानी पहचान वाली राजनीति और विपक्षी बिखराव के फॉर्मूले शायद उस तरह काम न आएं जैसे पहले आते थे। हालांकि भाजपा ने एक बड़ा जनादेश हासिल किया है, लेकिन इतनी बड़ी जीत अपने साथ कड़ी सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियां भी लेकर आती है। इतिहास गवाह है कि बड़े जनादेश हमेशा स्थिरता की गारंटी नहीं होते।

भले ही 2026 का यह साल हूबहू 1967 न हो, लेकिन इसका प्रभाव तात्कालिक नतीजों से कहीं आगे तक जाएगा। यह बदलाव केवल दो राज्यों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश में नए गठबंधनों को जन्म देगा और पुराने समीकरणों को ध्वस्त करेगा। आने वाले समय में राजनीतिक दल अपनी रणनीतियों को नए सिरे से तैयार करने पर मजबूर होंगे।

इस चुनावी नतीजे को एक अंतिम फैसले के रूप में देखने के बजाय, इसे एक नई राजनीतिक हलचल की शुरुआत के रूप में देखा जाना चाहिए। यह अंत नहीं, बल्कि एक व्यापक पुनर्गठन का आगाज़ है, जिसके परिणाम आने वाले वर्षों में भारतीय लोकतंत्र की एक नई तस्वीर पेश करेंगे।

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