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गुजरात में सोशल मीडिया अकाउंट्स ब्लॉक होने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची आम आदमी पार्टी, केंद्र और मेटा से मांगा जवाब

| Updated: May 8, 2026 17:57

गुजरात निकाय चुनाव से ठीक पहले फेसबुक-इंस्टाग्राम अकाउंट बैन होने पर AAP ने किया सुप्रीम कोर्ट का रुख, अदालत ने केंद्र सरकार और मेटा को नोटिस जारी कर मांगा जवाब।

आम आदमी पार्टी ने गुजरात में अपनी आधिकारिक फेसबुक प्रोफाइल और इंस्टाग्राम हैंडल को ब्लॉक किए जाने के विरोध में देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया है। पार्टी का आरोप है कि राज्य में स्थानीय निकाय चुनावों से ठीक पहले बिना किसी पूर्व सूचना के यह कार्रवाई की गई है।

इस महत्वपूर्ण मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने शुक्रवार को केंद्र सरकार, गुजरात सरकार और मेटा प्लेटफॉर्म्स को नोटिस जारी किया है। अदालत ने इन सभी पक्षों से इस मामले में अपना जवाब दाखिल करने को कहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि इस याचिका को ‘सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर बनाम भारत सरकार’ के लंबित मामले के साथ जोड़ा जाए। यह मामला मुख्य रूप से सरकार की डिजिटल सेंसरशिप शक्तियों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही और ऑनलाइन कंटेंट हटाने की प्रक्रिया से जुड़े कानूनी पहलुओं पर आधारित है।

विवाद की शुरुआत तब हुई जब आम आदमी पार्टी की गुजरात इकाई के सचिव शर्मा अनूप ने याचिका दायर कर बताया कि स्थानीय निकाय चुनावों से पहले पार्टी के सोशल मीडिया अकाउंट अचानक भारत में इनएक्सेसिबल हो गए। इससे पार्टी का ऑनलाइन चुनावी अभियान और जनसंपर्क बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

मेटा ने इस संबंध में पार्टी को सूचित किया था कि भारत सरकार और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के निर्देश पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79(3)(b) के तहत यह प्रतिबंध लगाया गया है। हालांकि, पार्टी ने इस कानूनी प्रावधान के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

आम आदमी पार्टी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने दलील दी कि धारा 79(3)(b) मूल रूप से डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह है, न कि पूरे अकाउंट को सस्पेंड करने की स्वतंत्र शक्ति। उन्होंने कोर्ट को बताया कि चुनाव के समय इस तरह पोर्टल का गायब हो जाना अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है।

सुनवाई के दौरान वकील ने अदालत से अंतरिम राहत की भी मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि सक्रिय चुनावी दौर में किसी राजनीतिक दल की डिजिटल मौजूदगी को इस तरह खत्म कर देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बाधा डालने जैसा है।

दूसरी ओर केंद्र सरकार की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुझाव दिया कि ऑनलाइन सेंसरशिप से जुड़े ऐसे ही कानूनी सवाल पहले से ही एक संवैधानिक पीठ के समक्ष विचाराधीन हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले को अलग नोटिस जारी करने के बजाय पुरानी सुनवाई के साथ ही जोड़ दिया जाना चाहिए।

पार्टी का एक मुख्य आरोप यह भी है कि इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय या गुजरात पुलिस ने अकाउंट ब्लॉक करने से पहले कोई लिखित आदेश या कारण नहीं बताया। याचिका के अनुसार, बिना किसी नोटिस के की गई यह कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

संभावना जताई जा रही है कि पार्टी द्वारा चुनावी प्रचार में गुजराती फिल्मों की छोटी क्लिप्स का उपयोग करने पर मिली कॉपीराइट शिकायतों की वजह से यह पाबंदी लगी हो सकती है। हालांकि, पार्टी का तर्क है कि कॉपीराइट मुद्दे के आधार पर पूरे अकाउंट को बंद कर देना एक असंवैधानिक और कठोर कदम है।

पार्टी ने अपनी दलील को पुख्ता करने के लिए ‘श्रेया सिंघल’ और ‘अनुराधा भसीन’ जैसे ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया है। इन मामलों में अदालत ने स्पष्ट किया था कि इंटरनेट और डिजिटल अभिव्यक्ति पर कोई भी प्रतिबंध आनुपातिकता और पारदर्शिता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।

गुजरात अब दिल्ली और पंजाब के बाद आम आदमी पार्टी के विस्तार के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। साल 2022 के गुजरात विधानसभा चुनाव में लगभग 13 प्रतिशत वोट शेयर हासिल करने के बाद पार्टी को राष्ट्रीय दल का दर्जा प्राप्त हुआ था।

पार्टी का मानना है कि चुनाव के समय सोशल मीडिया पर रोक लगाने से छोटे और विपक्षी दलों को अधिक नुकसान होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि ये दल बड़े मीडिया संसाधनों के बजाय डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन वॉलिंटियर नेटवर्क पर अधिक निर्भर रहते हैं।

यह मामला अब भारत में डिजिटल सेंसरशिप, सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी और चुनावी दौर में राजनीतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के भविष्य को लेकर एक बड़ी बहस का केंद्र बन गया है।

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