भारतीय परिवारों का सोने के प्रति लगाव जगजाहिर है। इसे 1997 की सुपरहिट फिल्म ‘हीरो नंबर 1’ के उस मशहूर गाने ‘सोना कितना सोना है’ से बखूबी समझा जा सकता है। हालांकि यह एक फिल्मी उदाहरण है, लेकिन हकीकत यह है कि भारत में सोने को लेकर एक अलग ही जुनून देखने को मिलता है।
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार भारतीय घरों में लगभग 25,000 टन सोना जमा है। यह अनुमान कुछ साल पुराना है, इसलिए वर्तमान में यह मात्रा निश्चित रूप से कहीं अधिक होगी।
इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया बयान काफी अहम हो जाता है। उन्होंने जनता से अपील की है कि कम से कम एक साल तक किसी भी समारोह के लिए सोने के आभूषण न खरीदें। इसके साथ ही उन्होंने विदेशी यात्राओं और डेस्टिनेशन वेडिंग में कटौती करने के साथ-साथ सार्वजनिक परिवहन और कारपूलिंग के इस्तेमाल पर जोर दिया है।
प्रधानमंत्री का यह सुझाव केवल एक सामान्य सलाह नहीं है, बल्कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था के मौजूदा ढांचे और पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण पैदा हुए दबाव को दर्शाता है।
भारत अपनी खपत का लगभग पूरा सोना विदेशों से आयात करता है और इसका भुगतान अमेरिकी डॉलर में किया जाता है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश ने 72 अरब डॉलर मूल्य का सोना आयात किया, जो 2023-24 के 45.5 अरब डॉलर के मुकाबले 58 प्रतिशत अधिक है।
हालांकि इस बढ़ते आयात बिल का एक बड़ा कारण सोने की कीमतों में उछाल भी रहा है। अगर मात्रा की बात करें तो 2025-26 में 721 टन सोना आयात हुआ, जबकि 2023-24 में यह आंकड़ा 795 टन था।
व्यक्तिगत स्तर पर एक आम आदमी के लिए सोना खरीदना अपनी बचत को सुरक्षित रखने का एक तर्कसंगत तरीका हो सकता है। जब रुपए की कीमत गिरती है, तो लोग अपनी क्रय शक्ति बचाने के लिए सोने की ओर भागते हैं। लेकिन जब हम इसे पूरी अर्थव्यवस्था के नजरिए से देखते हैं, तो यह स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण हो जाती है।
व्यापक आर्थिक स्तर पर सोने के आयात को डॉलर की बर्बादी के रूप में देखा जाता है, क्योंकि औद्योगिक उपयोग में इसकी भूमिका सीमित है और यह कीमती विदेशी मुद्रा को देश से बाहर ले जाता है।
सामान्य परिस्थितियों में देश सोने के इस बोझ को सह लेता है, लेकिन वर्तमान समय सामान्य नहीं है। पश्चिम एशिया के संकट ने रुपए पर भारी दबाव डाल दिया है। फरवरी के अंत से अब तक भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 5 प्रतिशत से अधिक टूट चुका है।
जब भारतीय नागरिक विदेश घूमने जाते हैं या बाहर शादियां करते हैं, तो वे डॉलर की मांग बढ़ाते हैं। समस्या तब और जटिल हो जाती है जब बाजार में डॉलर की आपूर्ति अनिश्चित हो।
विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भारतीय शेयर बाजार से लगातार अपना पैसा निकाल रहे हैं। ये निवेशक शेयर बेचकर मिलने वाले रुपए को डॉलर में बदलते हैं, जिससे डॉलर की मांग में भारी इजाफा होता है। आंकड़ों पर गौर करें तो 2025-26 में विदेशी निवेशकों ने 1.81 लाख करोड़ रुपये (19.7 अरब डॉलर) के शेयर बेचे।
वहीं 2026-27 के शुरुआती समय में ही वे 84,282 करोड़ रुपये (8.9 अरब डॉलर) की निकासी कर चुके हैं। इसके अलावा देश में आने वाला प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) भी पिछले वर्षों के मुकाबले काफी धीमा रहा है।
पश्चिम एशिया के युद्ध के कारण वहां से आने वाले प्रेषण यानी रेमिटेंस पर भी नकारात्मक असर पड़ने की आशंका है। आईटी क्षेत्र से होने वाली डॉलर की कमाई भी फिलहाल उतनी तेज नहीं है जो इस कमी को पूरा कर सके।
दूसरी तरफ कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की बढ़ती कीमतों ने मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। भारतीय बास्केट के कच्चे तेल की कीमत फरवरी 2026 के 69 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 12 मई 2026 तक 109 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई है।
भारत अपनी जरूरत का 89 प्रतिशत कच्चा तेल और लगभग आधा प्राकृतिक गैस आयात करता है। कीमतों में इस भारी उछाल का सीधा मतलब है कि डॉलर का बाहरी प्रवाह और बढ़ेगा। इन परिस्थितियों में देश का चालू खाता घाटा (CAD) यानी डॉलर के आने और जाने के बीच का अंतर बहुत ज्यादा बढ़ने की संभावना है।
जब डॉलर की मांग इसकी आपूर्ति से अधिक हो जाती है, तो रुपए की कीमत गिरने लगती है और भारत को डॉलर खरीदने के लिए और अधिक रुपए खर्च करने पड़ते हैं।
इस आर्थिक चक्र को संभालने के लिए सरकार उन चीजों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है जो उसके हाथ में हैं। चूंकि व्यापक आर्थिक स्तर पर सोने की खरीदारी को डॉलर के भंडार के लिए खतरा माना जा रहा है, इसलिए इसे हतोत्साहित करना जरूरी हो गया है।
प्रधानमंत्री की अपील और सोने पर बढ़ाई गई कस्टम ड्यूटी इसी रणनीति का हिस्सा है। सरकार को उम्मीद है कि कीमतों में वृद्धि और इस तरह की अपीलों से लोग सोने की खरीदारी कम करेंगे, जिससे देश की विदेशी मुद्रा को बचाया जा सकेगा।
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