बाजार में धड़ल्ले से बिकने वाली ‘हर्बल’ सिगरेट अगर आप यह सोचकर पी रहे हैं कि यह प्राकृतिक और पूरी तरह से सुरक्षित है, तो आपको तुरंत सतर्क होने की जरूरत है। हाल ही में हुए एक नए शोध से पता चला है कि तंबाकू मुक्त और औषधीय विकल्प के रूप में बेची जाने वाली ये हर्बल सिगरेट किसी भी मायने में सामान्य तंबाकू वाली सिगरेट से सुरक्षित नहीं हैं। इसके विपरीत, इनसे निकलने वाला धुआं तंबाकू के धुएं जितना ही या उससे भी अधिक नुकसानदायक हो सकता है।
यह चौंकाने वाला खुलासा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गांधीनगर (IITGN) और अमेरिका की इलिनोइस यूनिवर्सिटी अर्बाना-शैंपेन (UIUC) द्वारा किए गए एक संयुक्त अध्ययन में हुआ है। इस महत्वपूर्ण शोध को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘जर्नल ऑफ हजारडस मैटेरियल्स’ (Journal of Hazardous Materials) में प्रकाशित किया गया है, जिसका DOI (https://doi.org/10.1016/j.jhazmat.2026.142424) है। इस रिसर्च पेपर के सह-लेखक आईआईटी गांधीनगर के आलोक कुमार ठाकुर और समीर पटेल तथा इलिनोइस यूनिवर्सिटी के पी.एस. गणेश सुब्रमण्यम और विशाल वर्मा हैं।
इस अध्ययन में भारतीय बाजार में सबसे ज्यादा बिकने वाले दो तंबाकू ब्रांड्स और चार लोकप्रिय हर्बल सिगरेट ब्रांड्स के धुएं की व्यापक तुलना की गई। हर्बल सिगरेट के इन विकल्पों में तुलसी, लौंग, दालचीनी, पुदीना, ग्रीन टी, वाटर लिली और कैमोमाइल का मिश्रण शामिल था।
शोधकर्ताओं ने पाया कि दो हर्बल ब्रांड्स में भारत के सबसे ज्यादा पिए जाने वाले धूम्रपान उत्पाद ‘बीड़ी’ की तरह ही रैपर के रूप में तेंदू के पत्तों का इस्तेमाल किया गया था। अध्ययन में इन व्यावसायिक सिगरेटों से निकलने वाले मेनस्ट्रीम (फर्स्टहैंड) धुएं के भौतिक, रासायनिक और ऑक्सीडेटिव गुणों की बारीकी से जांच की गई।
उत्सर्जन को सटीक रूप से मापने के लिए प्रत्येक सिगरेट को एक सीलबंद और स्वचालित टू-चैंबर रिग के अंदर जलाया गया, जिसे बिल्कुल इंसानी सांस लेने की दर की नकल करने के लिए डिजाइन किया गया था।
इसके बाद सिगरेट के धुएं को रियल-टाइम उपकरणों में भेजा गया और कणों की रासायनिक विशेषताओं को जांचने के लिए फिल्टर नमूने एकत्र किए गए। धुएं के संभावित जहरीलेपन का पता लगाने के लिए एकत्र किए गए नमूनों के ‘ऑक्सीडेटिव पोटेंशियल’ (OP) की मात्रा को मापा गया।
जांच के नतीजों में एक बेहद अहम बात सामने आई कि हर्बल सिगरेट के धुएं में 500-नैनोमीटर से छोटे कण तंबाकू के धुएं की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत अधिक मात्रा में उत्सर्जित होते हैं। ये महीन कण हृदय और सांस की गंभीर बीमारियों के बढ़ते खतरे से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं।
इसके अतिरिक्त, हर्बल सिगरेट से निकलने वाले पार्टिकुलेट मैटर में तंबाकू सिगरेट की तुलना में काफी अधिक ऑक्सीडेटिव पोटेंशियल (OP) दर्ज किया गया। यह ऐसा गुण है जो खतरनाक प्रतिक्रियाशील ऑक्सीजन प्रजातियों को जन्म देता है, जिससे फेफड़ों के ऊतकों को नुकसान पहुंचता है और हृदय रोग का कारण बनने वाली सूजन बढ़ती है।
तेंदू के पत्तों में लिपटे हर्बल सिगरेट के वेरिएंट्स विशेष रूप से खतरनाक पाए गए, जिनका ओपी (OP) कागज में लिपटी सिगरेट की तुलना में लगभग 49 प्रतिशत अधिक था। रासायनिक विश्लेषण के दौरान सबसे हैरानी वाली बात यह रही कि तुलसी से भरी एक हर्बल सिगरेट में सीसे (लेड) की मात्रा सबसे अधिक पाई गई। यह तब है, जब उस उत्पाद को “स्वस्थ जीवन शैली के लिए 100% प्राकृतिक फिलर के साथ रसायन मुक्त” बताकर धड़ल्ले से बेचा जा रहा था।
आईआईटी गांधीनगर में सिविल और केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के सहायक प्रोफेसर और डॉ. किरण सी पटेल सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट के सह-समन्वयक प्रोफेसर समीर पटेल ने निष्कर्षों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि उनके नतीजे इस आम धारणा को पूरी तरह गलत साबित करते हैं कि तंबाकू मुक्त का मतलब जोखिम मुक्त होता है।
उनके द्वारा मापे गए लगभग हर मीट्रिक पर हर्बल सिगरेट का उत्सर्जन तंबाकू सिगरेट के बराबर या उससे अधिक ही निकला, जिसमें पत्तों में लिपटे हर्बल विकल्प सबसे अधिक खतरनाक साबित हुए। इलिनोइस यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर विशाल वर्मा ने भी कहा कि यह खोज बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि कई उपभोक्ता निकोटीन मुक्त उत्पादों को कम नुकसानदेह मान बैठते हैं।
इस अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉ. आलोक कुमार ठाकुर ने बताया कि परीक्षण की गई कई हर्बल सिगरेट खांसी से राहत, बेहतर नींद या चिंता दूर करने के भ्रामक दावों के साथ बेची जाती हैं। हालांकि, इन उत्पादों के जहरीले प्रभावों का मूल्यांकन करने वाले वैज्ञानिक साक्ष्य बहुत सीमित हैं।
बता दें कि डॉ. ठाकुर ने आईआईटी गांधीनगर से प्रधानमंत्री रिसर्च फेलो के रूप में अपनी पीएचडी पूरी की है और वे वर्तमान में अमेरिका की कोलोराडो स्टेट यूनिवर्सिटी में पोस्टडॉक्टरल रिसर्च कर रहे हैं।
यह रिसर्च हर्बल सिगरेट के इर्द-गिर्द मौजूद एक बड़े ‘नियामक अंतराल’ (Regulatory Gap) को भी उजागर करती है। भारत का सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 (COTPA) चेतावनी लेबल और विज्ञापन प्रतिबंधों के जरिए तंबाकू उत्पादों को नियंत्रित करता है, लेकिन तंबाकू मुक्त के रूप में बेचे जाने वाले उत्पाद अक्सर इन कानूनी दायरों से आसानी से बच निकलते हैं।
कई अन्य देशों में भी इसी तरह की खामियां मौजूद हैं। अमेरिका के सेंट लुइस स्थित वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में पोस्टडॉक्टरल रिसर्चर डॉ. पीएस गणेश सुब्रमण्यम का स्पष्ट कहना है कि डिब्बे पर क्या लिखा है, इससे ज्यादा फर्क इस बात से पड़ता है कि सिगरेट के जलने की प्रक्रिया, उसके महीन कण, कालिख, धातु के अंश और उसका रैपर कैसा है।
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि उनका यह अध्ययन बीमारियों के सीधे दावों के बजाय उत्सर्जित धुएं के मापने योग्य गुणों और उनकी जैविक प्रतिक्रिया पर केंद्रित है। यह महत्वपूर्ण शोध विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा हर साल 31 मई को मनाए जाने वाले ‘विश्व तंबाकू निषेध दिवस’ के अवसर पर सामने आया है। इस वर्ष की थीम “अपील को बेनकाब करना: निकोटीन और तंबाकू की लत का मुकाबला करना” रखी गई है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन सरकारों और स्वास्थ्य संगठनों के साथ मिलकर अगली पीढ़ी के लिए तंबाकू और निकोटीन मुक्त भविष्य सुरक्षित करने की दिशा में काम कर रहा है। वेलनेस और स्वास्थ्य की आड़ में हर्बल सिगरेट युवा उपभोक्ताओं और पहली बार धूम्रपान करने वालों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है।
ऐसे में वैकल्पिक धूम्रपान उत्पादों के विपणन को विनियमित करने के लिए सख्त नीतियां बनाने की तत्काल आवश्यकता है। यह अध्ययन उस वैज्ञानिक साक्ष्य को और मजबूत करता है, जो जन-स्वास्थ्य चर्चाओं और इन उत्पादों के खिलाफ सख्त नियम बनाने में मदद कर सकता है।
यह भी पढ़ें-
शहाना गोस्वामी का ‘ओपन रिलेशनशिप’ पर बेबाक खुलासा: ‘मेरे कई पार्टनर हैं और किसी से कुछ छिपा नहीं है’
गुजरात में अंधविश्वास का खूनी खेल: पत्नी को ‘डायन’ बताकर भीड़ ने पति को उतारा मौत के घाट









