अहमदाबाद: इस साल की शुरुआत में सौराष्ट्र के एक स्कूल ने पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन किया था। स्कूल प्रबंधन ने केवल रिकॉर्ड और संचार के उद्देश्य से इसकी कुछ तस्वीरें साझा कीं। लेकिन इस बेहद सामान्य सी घटना का परिणाम खौफनाक साबित हुआ। किसी अज्ञात व्यक्ति ने एआई टूल्स का इस्तेमाल करके 15 वर्षीय छात्रा की तस्वीर के साथ छेड़छाड़ की और उसका आपत्तिजनक वीडियो बनाकर मैसेजिंग ग्रुप्स में वायरल कर दिया। इसके बाद पीड़ित छात्रा के माता-पिता ने पॉक्सो (POCSO) एक्ट 2012 के तहत मामला दर्ज कराया।
इस घटना के बाद गांधीनगर स्थित डायरेक्टरेट ऑफ फॉरेंसिक साइंसेज (DFS) की टीम ने डिजिटल सबूतों की गहराई से जांच शुरू की। जांचकर्ताओं द्वारा पहले से जब्त किए गए एक मोबाइल फोन की पिछली गतिविधियों के आधार पर डिजिटल फॉरेंसिक विशेषज्ञों ने उस फर्जी वीडियो को एक विशिष्ट अकाउंट से जोड़ दिया। जांच अधिकारियों ने उस विशेष एप्लिकेशन का भी सटीक पता लगा लिया जिसका इस्तेमाल इस वीडियो को बनाने में किया गया था।
विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही एआई ने ऑडियो, वीडियो और तस्वीरें बनाना बेहद आसान कर दिया है, लेकिन इसका स्याह पहलू खतरनाक है। लोग इसका दुरुपयोग किसी को बदनाम करने, छवि खराब करने या व्यंग्य के लिए कर रहे हैं। इन दिनों DFS ऐसे मामलों की जांच से पूरी तरह घिरा हुआ है। साल 2023 के पूरे वर्ष में ऐसे 815 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि इसके मुकाबले केवल 2026 के शुरुआती छह महीनों में ही DFS ने 687 मामले दर्ज कर लिए हैं।
DFS के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति की गंभीरता साफ समझ में आती है। साल 2023 में हर महीने औसतन 68 मामले सामने आते थे, जो 2026 में बढ़कर 115 प्रति माह हो गए हैं। जनवरी से जून 2026 के बीच आए इन 687 मामलों में से सबसे ज्यादा 50 प्रतिशत ऑडियो फाइलें हैं, जिन्हें पुलिस जांचकर्ताओं ने प्रामाणिकता जांचने के लिए भेजा है। इसके बाद 36 प्रतिशत तस्वीरें और 14 प्रतिशत वीडियो से जुड़े मामले शामिल हैं।
DFS के निदेशक एच. पी. संघवी बताते हैं कि मूल सामग्री में हेरफेर करने या अपराधों के लिए नई सामग्री बनाने में एआई का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि विभाग ने ऐसे मामलों की सटीक जांच के लिए आधुनिक उपकरण खरीदे हैं और अपने मानव संसाधनों को भी विशेष रूप से प्रशिक्षित किया है। संघवी के अनुसार, इस साल 3 जुलाई को मनाए गए ‘डीएफएस डे’ (DFS Day) की मुख्य थीम भी अपने कामकाज में एआई को शामिल करने और ऐसे मामलों से निपटने की क्षमता विकसित करने पर ही आधारित थी।
विशेषज्ञों ने एक और चौंकाने वाले मामले का हवाला दिया जिसमें एक ठुकराए हुए प्रेमी ने एक महिला की तस्वीरें ऑनलाइन वायरल कर दी थीं। उस व्यक्ति के एक परिचित ने एआई टूल्स का इस्तेमाल करके उसी महिला का एक बेहद अश्लील वीडियो तैयार कर लिया था।
डिजिटल फॉरेंसिक विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कंप्यूटर फॉरेंसिक डिवीजन के विशेषज्ञों ने डिजिटल सबूतों की गहन जांच की। इस दौरान वीडियो के मेटाडेटा, तकनीकी विशेषताओं और कंटेंट की अखंडता का बारीकी से विश्लेषण किया गया।
वैज्ञानिक विश्लेषण में वीडियो के अंदर कई एआई-जनित कलाकृतियों (artefacts) और संकेतकों की मौजूदगी का साफ पता चला। अधिकारी ने बताया कि जांच एजेंसी को सौंपे गए फॉरेंसिक निष्कर्षों ने सॉफ्टवेयर और एप्लिकेशन को पूरी तरह साबित कर दिया, जिससे आरोपी के खिलाफ अहम सबूत मिले। विशेषज्ञों ने साफ चेतावनी दी है कि एआई का इस्तेमाल अपराधियों को कोई सुरक्षा नहीं देता है। आधुनिक तकनीक अधिकांश मामलों में सबूतों को सीधे आरोपी से जोड़ने में पूरी तरह सक्षम है।
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