गुजरात में पश्चिम रेलवे की विभागीय पदोन्नति परीक्षा में एक बड़े घोटाले का पर्दाफाश हुआ है। स्टाफ वेलफेयर इंस्पेक्टर (SWI) पद के लिए आयोजित इस परीक्षा में शामिल होने वाले उम्मीदवारों को बाकायदा कोचिंग दी गई थी। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की जांच में यह चौंकाने वाली बात सामने आई है कि इन कोचिंग कक्षाओं में सिलेबस पढ़ाने के बजाय रिश्वत के पैसों का जुगाड़ करना सिखाया जाता था। इसके साथ ही, विजिलेंस जांच होने पर अधिकारियों के सवालों से कैसे निपटना है, इसकी भी पूरी ट्रेनिंग दी जाती थी।
रेलवे से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इन संदिग्ध कोचिंग कक्षाओं का संचालन एक व्यावसायिक परिसर से किया जा रहा था। इस जगह को एक वरिष्ठ रेलवे अधिकारी की पत्नी ने किराए पर लिया था। जांच के दौरान एक बड़े अधिकारी ने बताया कि उम्मीदवारों को पहले ही समझा दिया गया था कि परीक्षा के दौरान नकल कैसे कराई जाएगी। उन्हें यह भी आश्वासन दिया गया था कि रेलवे के अधिकारियों की तरफ से हर तरह का लॉजिस्टिक सपोर्ट मिलेगा।
इस पूरे खेल में रिश्वत की रकम चुकाने का तरीका भी बेहद शातिराना था। उम्मीदवारों को परीक्षा से पहले क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी से लोन लेने की सलाह दी गई थी। विभागीय जांच में यह बात भी सामने आई है कि परीक्षा से ठीक पहले लोन बांटने की संख्या में अचानक भारी उछाल आ गया था। जांचकर्ताओं को पता चला है कि एसडब्ल्यूआई के पद पर प्रमोशन के लिए हर उम्मीदवार से 2 लाख से 5 लाख रुपये के बीच की रकम तय की गई थी। शक है कि मनचाहा परिणाम पाने के लिए कई लोगों ने 3 लाख से 5 लाख रुपये तक का भुगतान किया।
यह मामला तब खुला जब पश्चिम रेलवे के सतर्कता विभाग (विजिलेंस) ने 16 मार्च, 2024 को हुई कंप्यूटर आधारित परीक्षा में गड़बड़ी की शिकायत दर्ज कराई। इसी शिकायत के आधार पर सीबीआई ने अपना केस दर्ज किया है। जानकारी के मुताबिक, परीक्षा में कुल 100 उम्मीदवार शामिल हुए थे, जिनमें से चार कर्मचारियों ने 87.67 प्रतिशत से लेकर 90.33 प्रतिशत के बीच असाधारण रूप से ज्यादा अंक हासिल किए। सीबीआई सूत्रों का कहना है कि इन चारों ने परीक्षा से कुछ समय पहले ही लोन लिया था। परीक्षा के आस-पास उनके खातों से एटीएम निकासी और रिश्तेदारों या दोस्तों के जरिए पैसों के लेन-देन के कई सुबूत मिले हैं।
तकनीकी जांच में भी कई गंभीर खामियां उजागर हुई हैं। तय समय से लगभग दो घंटे की देरी से परीक्षा शुरू की गई थी। नियम के अनुसार परीक्षा खत्म होते ही सर्वर बंद हो जाना चाहिए था, लेकिन यह दो दिनों से अधिक समय तक एक्टिव रहा। एक सीबीआई अधिकारी ने बताया कि प्रश्न पत्र को देर से अपलोड करने और सर्वर को लंबे समय तक चालू रखने की घटना की गहन जांच की जा रही है।
जांच एजेंसी का आरोप है कि परीक्षा वाले सर्वर पर ‘एनीडेस्क’ (AnyDesk) नाम का रिमोट-एक्सेस सॉफ्टवेयर भी डाला गया था, जिससे परीक्षा के बाद भी सिस्टम तक बाहरी पहुंच बनाई जा सके। अब जांचकर्ता इन आरोपों की भी पड़ताल कर रहे हैं कि सबूत मिटाने के लिए बाद में सर्वर को पूरी तरह से फॉर्मेट कर दिया गया था।
इस परीक्षा से जुड़े कुछ रेलवे अधिकारियों के बैंक खातों में अचानक बड़ी रकम भी जमा हुई है, जिसका कोई स्पष्ट स्रोत नहीं मिला है। सीबीआई ने मामले को गंभीरता से लेते हुए वरिष्ठ रेलवे अधिकारियों, तकनीकी कर्मचारियों, लिपिक स्टाफ और पदोन्नत हुए चार वेलफेयर इंस्पेक्टरों के खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है।
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