अहमदाबाद की एक दीवानी अदालत ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जो गोद लेने के कानूनी नियमों की सख्ती पर मुहर लगाता है। कोर्ट ने एक 19 वर्षीय युवक की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने अपने दस्तावेजों में दोबारा अपने जैविक पिता का नाम दर्ज कराने की गुहार लगाई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक बार वैध रूप से गोद लेने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसे रद्द नहीं किया जा सकता, भले ही बच्चा और गोद लेने वाला पिता दोनों इसके लिए पूरी तरह से सहमत हों।
इस मामले की शुरुआत साल 2015 में हुई थी। तब इस युवक की विधवा मां ने एक ऐसे व्यक्ति से दूसरी शादी की थी, जो खुद भी विधुर था और उसका पहले से एक बेटा था। शादी के कई सालों बाद, 2022 में सौतेले पिता ने बच्चे को अच्छी तरह से रखने का भरोसा दिया। इसके बाद विधिवत तरीके से गोद लेने का डीड तैयार किया गया और कोर्ट के आदेश से बच्चे के सभी दस्तावेजों में जैविक पिता की जगह गोद लेने वाले पिता का नाम दर्ज कर दिया गया।
हालांकि, दस्तावेजों में नाम बदलने के महज आठ महीने के भीतर ही हालात बदलने लगे। युवक को यह महसूस होने लगा कि उसके साथ सौतेले भाई की तुलना में अलग व्यवहार किया जा रहा है। वह अपने सौतेले पिता से दूरी बनाना चाहता था। बेटे की इस मानसिक स्थिति को देखते हुए मां ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अदालत से मांग की कि बच्चे के दस्तावेजों से गोद लेने वाले पिता का नाम हटाकर फिर से जैविक पिता का नाम दर्ज किया जाए।
अदालत में दी गई अपनी अर्जी में मां ने आरोप लगाया कि पति के व्यवहार के कारण उनका 19 वर्षीय बेटा मानसिक तनाव और हीन भावना का शिकार हो गया है। उन्होंने अपने बेटे के भविष्य को लेकर चिंता जाहिर की और दलील दी कि यह बदलाव बच्चे के हित में है। इस मामले में खास बात यह रही कि गोद लेने वाले पिता ने भी अपना नाम दस्तावेजों से हटाने पर अपनी सहमति जता दी थी।
लेकिन, अदालत ने साफ कहा कि आपसी सहमति कभी भी कानून की जगह नहीं ले सकती। कोर्ट ने हिंदू एडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट, 1956 की धारा 15 का हवाला दिया। जज ने कहा कि एक बार जब कानूनी रूप से गोद लेने की प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तो उसे न तो माता-पिता और न ही कोई अन्य व्यक्ति रद्द कर सकता है। यहां तक कि गोद लिया गया बच्चा भी खुद अपने इस दर्जे को त्याग नहीं सकता।
कोर्ट ने यह भी माना कि मां की चिंताएं जायज हैं और बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य व कल्याण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या सिर्फ इस आधार पर एक वैध गोदनामे को रद्द किया जा सकता है? अदालत ने पाया कि शुरुआत में गोद लेने की प्रक्रिया में कोई धोखाधड़ी, दबाव या नियमों की अनदेखी नहीं हुई थी। इसलिए बाद में पैदा हुए हालातों के आधार पर इस कानूनी प्रक्रिया को पलटा नहीं जा सकता।
अपने फैसले के अंत में अदालत ने कहा कि सौतेले पिता के बर्ताव को लेकर जो भी शिकायतें हैं, वो एक वैध गोदनामे को रद्द करने का कानूनी आधार नहीं बन सकतीं। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने पिता के व्यवहार को लेकर लगाए गए आरोपों की सच्चाई पर कोई राय नहीं दी है। अदालत के अनुसार, मां और बेटे के पास कानून के तहत अन्य जो भी अधिकार मौजूद हैं, वे उनका इस्तेमाल करने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र हैं।
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