क्या चुनाव आयुक्तों के बीच असहमति होना कोई समस्या है? जरूरी नहीं। वास्तव में, असहमति एक स्वस्थ प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है। हालांकि, असली मुद्दा यह है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी का कहना है कि उन्हें बड़े फैसलों की जानकारी ही नहीं दी गई। और जब उन्होंने आपत्ति जताई, तो आगे क्या कदम उठाए जाने चाहिए, इसके लिए कोई स्पष्ट प्रक्रिया मौजूद नहीं थी।
अक्सर हम चुनाव में पारदर्शिता की बात एक ही नजरिए से करते हैं। हम यह जानना चाहते हैं कि चुनाव आयोग नागरिकों, राजनीतिक दलों, अदालतों और पत्रकारों को कितनी जानकारी देता है। यह चर्चा का एक सामान्य और अक्सर सही तरीका होता है। लेकिन सार्वजनिक डोमेन में सामने आए नए खुलासों ने एक अलग ही सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग खुद अपने भीतर पूरी जानकारी साझा कर रहा है?
द इंडियन एक्सप्रेस की एक पड़ताल के अनुसार, दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीने के भीतर कम से कम 14 औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराईं। उनकी शिकायतों में कई अहम मुद्दे शामिल थे। इनमें मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने, फॉर्म 6 में बदलाव, मतदाता डेटाबेस तक पहुंच और आयोग के अपने आईटी सिस्टम की कार्यप्रणाली जैसे विषय शामिल थे। एक से अधिक बार, उन्होंने कहा कि उनकी जानकारी के बिना ही फैसले ले लिए गए। क्या यह सही है कि दो मौजूदा चुनाव आयुक्तों को बड़े फैसलों के बारे में मीडिया से पता चले?
दुर्भाग्य से, संधू के अनुसार अप्रैल में ठीक ऐसा ही हुआ। उन्हें नए आईटी मॉड्यूल और पोर्टल के बारे में तब पता चला, जब वे पहले ही बन चुके थे। बाद में जोशी ने एक अलग चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची डेटाबेस का केंद्रीकरण हो रहा है, जिससे कम लोग ही यह देख सकते हैं कि इसका प्रबंधन कैसे हो रहा है। उन्होंने इसकी जांच के लिए एक आंतरिक ऑडिट का प्रस्ताव रखा, जो एक सही कदम था। संधू ने भी इस विचार का समर्थन किया। लेकिन संधू के अपने बयान के अनुसार, उन्हें कभी नहीं बताया गया कि उस प्रस्ताव का क्या हुआ।
अब, आइए यहां थोड़ा रुकते हैं।
क्या आयुक्तों के बीच असहमति होना वास्तव में एक समस्या है? बिल्कुल नहीं। यह स्वाभाविक है कि एक राष्ट्रीय संस्थान चलाने के लिए नियुक्त तीन लोग हर बात पर सहमत न हों, और ऐसा होना भी नहीं चाहिए। असहमति स्वस्थ हो सकती है, जिसका अर्थ है कि व्यवस्था के भीतर कोई व्यक्ति जनता के सामने आने से पहले कड़े सवाल पूछ रहा है। हालांकि, असली समस्या यह नहीं है कि संधू और जोशी फैसलों से असहमत थे। समस्या यह है कि उनका दावा है कि उन्हें उन फैसलों के बारे में बताया ही नहीं गया था। और जब उन्होंने आपत्ति जताई, तो यह स्पष्ट नहीं था कि आगे क्या होना चाहिए।
यह निश्चित रूप से एक गंभीर समस्या है। कोई भी संस्थान असहमति को बर्दाश्त कर सकता है और फिर भी ठीक से काम कर सकता है, बशर्ते चिंता व्यक्त करने, प्रतिक्रिया प्राप्त करने और किसी समाधान तक पहुंचने का एक तरीका हो। लेकिन रिपोर्ट जो संकेत देती है वह अलग है। एक आयुक्त अपनी आपत्ति दर्ज करता है, और फिर उसे इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती। उस आपत्ति या असहमति का क्या होता है? क्या वह हवा में गायब हो जाती है?
इस मुद्दे की अत्यंत गंभीर प्रकृति को भी समझना चाहिए, क्योंकि यह आयोग के आंतरिक कामकाज से कहीं आगे तक जाता है, यह देखते हुए कि इस समय वास्तव में दांव पर क्या लगा है।
ये खुलासे मायने क्यों रखते हैं
चुनाव आयोग मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन संशोधन’ (Special Intensive Revision) के बीच में है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसने ड्राफ्ट चरण में ही 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13 करोड़ से अधिक नामों को प्रभावित किया है। अगर इस अभ्यास के दौरान कोई नाम गलत तरीके से जोड़ा या हटाया जाता है, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। मतदान करने के लिए पूरी तरह से पात्र व्यक्ति चुनाव के दिन सूची में शामिल नहीं हो सकता है। उस व्यक्ति के लिए अपील की कोई प्रक्रिया उपलब्ध नहीं है जिसे यह भी नहीं पता कि उसे सूची से हटा दिया गया है। इसलिए जब उन अधिकारियों का कहना है जिन्हें इस अभ्यास को मंजूरी देने और निगरानी करने का काम सौंपा गया है कि उन्हें पूरी जानकारी नहीं है कि इसे कैसे चलाया जा रहा है, तो यह कोई छोटी प्रशासनिक शिकायत नहीं है। यह पूरी कहानी का केंद्र बिंदु है।
इसके अलावा, एक तकनीकी कारण भी है कि इसे पहले की तुलना में अब पकड़ना मुश्किल क्यों है। अतीत में, फैसलों का एक ‘पेपर ट्रेल’ (दस्तावेज़ी रिकॉर्ड) होता था। एक फाइल एक अधिकारी के डेस्क से दूसरे पर जाती थी। कोई एक आदेश पर हस्ताक्षर करता था, और यदि कुछ गलत होता था, तो आप ठीक-ठीक पता लगा सकते थे कि किसने, क्या और कब मंजूरी दी। लेकिन डिजिटल सिस्टम इस तरह से काम नहीं करते हैं। डेटाबेस तक पहुंच को लॉगिन क्रेडेंशियल का उपयोग करके चालू या बंद किया जा सकता है। एक नया फीचर या मॉड्यूल तकनीकी टीम के बाहर किसी को जाने बिना बनाया और तैनात किया जा सकता है। एक वर्कफ़्लो को फिर से डिज़ाइन किया जा सकता है ताकि एक अधिकारी सिस्टम पर काम कर सके और दूसरा नहीं, और उस बदलाव का कोई एक दृश्य रिकॉर्ड नहीं होता है जब तक कि कोई विशेष रूप से इसका दस्तावेजीकरण न करे।
इसका मतलब है कि डिजिटल सिस्टम में, “किसकी किस चीज़ तक पहुंच है” यह अपने आप में परिणामों वाला एक निर्णय है। और यदि वह निर्णय एक छोटे समूह द्वारा चुपचाप लिया जाता है, तो वे लोग जो औपचारिक रूप से निगरानी के लिए जिम्मेदार हैं, किसी के द्वारा तकनीकी रूप से कोई नियम तोड़े बिना बाहर रह सकते हैं।
खुलासे के अनुसार, यह असहमति आंतरिक नोटों से आगे बढ़ गई। दोनों आयुक्त कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन के पास एक प्रशासनिक आदेश को लेकर पहुंचे, जिसके बारे में उनका मानना था कि यह आईटी विभाग का नियंत्रण कम हाथों में केंद्रित कर देगा। बाद में उन्होंने खुद उस आदेश को वापस ले लिया। एक आंतरिक विवाद को सुलझाने के लिए कैबिनेट सचिव के पास जाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? आयोग की अपनी आंतरिक प्रक्रिया ने इसे क्यों नहीं संभाला? इन सवालों का सार्वजनिक रूप से उत्तर नहीं दिया गया है, और उत्तर मान लेने के बजाय उन्हें सीधे पूछना उचित है।
एक चेतावनी (Caveat)
इन सबके बीच, यहां एक निष्पक्ष चेतावनी की आवश्यकता है। यह पूरा विवरण एक जांच पर आधारित है। चुनाव आयोग ने इन घटनाओं का अपना विस्तृत विवरण नहीं दिया है, कम से कम ऐसा कोई विवरण नहीं जिसे इतनी प्रमुखता से रिपोर्ट किया गया हो। आयोग ने केवल इतना कहा है कि वह एक ‘बहु-सदस्यीय’ संवैधानिक निकाय है, और उसके सभी कार्य आयोग के कानूनों और निर्देशों के अनुसार किए गए हैं। चुनाव आयोग के बयान में उठाई गई चिंताओं को भी कमतर आंका गया है और उन्हें ड्राफ्ट चरणों में ‘परिचालन संबंधी प्रश्नों या इनपुट’ (operational queries or inputs) के तहत रखा गया है।
यह संभव है कि जो बहिष्कार जैसा दिखता है, वह सुरक्षा उपाय के रूप में किया गया हो। कुछ संदर्भों में डेटाबेस तक पहुंच को सीमित करना एक उचित अभ्यास है, न कि कोई लीपापोती। आयोग के अपने विस्तृत विवरण के बिना, इसे पूरी तरह से खारिज करना मुश्किल है।
लेकिन उस चेतावनी को ध्यान में रखते हुए भी, रिपोर्ट किया गया मूल पैटर्न अभी भी गंभीरता से लेने लायक है। फैसले के लिए जिम्मेदार अधिकारी कहते हैं कि उनके पास इसे लेने के लिए आवश्यक जानकारी नहीं थी। और जब उन्होंने समीक्षा प्रक्रिया के लिए कहा, तो उनका कहना है कि उन्हें कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला।
उक्त रिपोर्ट मूल रूप से द वायर वेबसाइट द्वारा प्रकाशित किया जा चुका है.
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