अहमदाबाद शहर के दक्षिण-पश्चिमी छोर पर 1980 के दशक से कचरे का एक विशाल पहाड़ खड़ा है, जिसे हम पिराना के नाम से जानते हैं। हर दिन यहां लगभग 4,000 मीट्रिक टन कचरा डंप किया जाता है। 22 मीटर ऊंचे इस कचरे के ढेर से होने वाला प्रदूषण भले ही हमें सीधे तौर पर दिखाई न दे, लेकिन अब यूरोपीय और जापानी अंतरिक्ष एजेंसियों के सैटेलाइट्स ने इसकी भयावहता पर एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया है।
एक नए अध्ययन के अनुसार, पिराना डंपिंग साइट हर साल औसतन 38,000 मीट्रिक टन मीथेन गैस हवा में छोड़ रही है। साल 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर 42,000 टन तक पहुंच गया है। यह भारी चिंता का विषय इसलिए है क्योंकि 20 साल की अवधि में मीथेन गैस, कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में लगभग 80 गुना अधिक शक्तिशाली और खतरनाक होती है।
इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि भारत के सभी लैंडफिल में पिराना में साल-दर-साल सबसे कम उतार-चढ़ाव देखा गया है, जो किसी अस्थायी उछाल के बजाय एक निरंतर और स्थिर रिसाव का संकेत देता है। इन नतीजों की स्वतंत्र रूप से नासा (NASA) के एमिट (EMIT) उपकरण द्वारा भी पुष्टि की गई है।
यह महत्वपूर्ण शोध आईआईटी दिल्ली (IIT Delhi) के ‘सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंसेज’ के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। शालिनी यादव, सजीव फिलिप, रवि कुमार कुंचला और शुभदीप घोष के नेतृत्व में हुआ यह अध्ययन ‘एनवायर्नमेंटल रिसर्च कम्युनिकेशंस’ में प्रकाशित हुआ है।
रिपोर्ट स्पष्ट रूप से बताती है कि पिराना में गैस रिसाव को रोकने के लिए कोई प्रभावी प्रणाली नहीं है। वहां न तो कोई गैस कलेक्शन वेल (कुएं) हैं, न कचरे के नीचे कोई इंजीनियर लाइनर है और न ही इसके ऊपर कोई सुरक्षित आवरण (कैपिंग) है। इसी वजह से पैदा होने वाली ज्यादातर मीथेन सीधे वायुमंडल में घुल रही है।
शोधकर्ताओं ने भारत और विदेशों के लैंडफिल की इंजीनियरिंग में एक बुनियादी अंतर को भी उजागर किया है। अमेरिका और चीन जैसे देशों में गैस कलेक्शन सिस्टम और लाइनर के साथ कचरे के ऊपर वनस्पति की परत बिछाई जाती है।
इसके विपरीत, भारत में खुले डंपिंग यार्ड हैं। कचरे के प्रबंधन की इसी कमी के कारण पिराना का 2024 का मीथेन उत्सर्जन स्तर, अमेरिका के सबसे ज्यादा उत्सर्जन वाले ‘ली काउंटी लैंडफिल’ के चरम स्तर के बराबर दर्ज किया गया है।
मीथेन तब उत्पन्न होती है जब जैविक कचरा बिना ऑक्सीजन के कचरे की दबी हुई परतों के नीचे सड़ने लगता है। अध्ययन के मुताबिक, अमेरिका या चीन की तुलना में भारतीय डंपसाइट्स में जैविक कचरे की मात्रा कहीं अधिक होती है। अहमदाबाद के नगर निगम कचरे में भोजन और जैविक अंश ज्यादा होने के कारण मीथेन पैदा करने वाले बैक्टीरिया को पनपने के लिए भरपूर अनुकूल माहौल मिलता है।
अहमदाबाद के इस कचरे के पहाड़ की तुलना देश की राजधानी दिल्ली से भी की गई है। साल 2024 में दिल्ली के तीन प्रमुख डंपसाइट्स ने मिलकर करीब 2 लाख मीट्रिक टन मीथेन का उत्सर्जन किया। 1984 से संचालित और अब 60 मीटर से अधिक ऊंचे दिल्ली के गाजीपुर लैंडफिल ने करीब 1.2 लाख टन मीथेन छोड़ी, जो 2019 में 61,000 टन थी।
दिलचस्प बात यह है कि पिराना में गाजीपुर (2,000-2,200 टन) के मुकाबले रोजाना अधिक कचरा (4,000 टन) आता है, लेकिन पिराना की कम ऊंचाई और कचरे की अलग संरचना के कारण यहां उत्सर्जन थोड़ा कम है।
वैज्ञानिकों ने गैस के सटीक मापन के लिए सैटेलाइट-आधारित ‘क्रॉस-सेक्शनल फ्लक्स’ तकनीक का इस्तेमाल किया। इस तरीके से पता चला कि पुराने पारंपरिक अनुमान गाजीपुर में वास्तविक उत्सर्जन से 70-90% और भलस्वा में 30-70% कम आंके गए थे।
इस बेलगाम उत्सर्जन का राष्ट्रीय स्तर पर भी गहरा असर देखने को मिला है। आंकड़ों के मुताबिक, 2019 से 2024 के बीच भारत के वायुमंडल में मीथेन का स्तर बढ़कर लगभग 1,980 पीपीबी (ppb) तक पहुंच गया है, जो करीब 60 पीपीबी की कुल वृद्धि को दर्शाता है।
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