भारतीय रुपये पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। विदेशी फंड की भारी निकासी और महंगे होते कच्चे तेल के कारण रुपये की कीमत में गिरावट का दौर जारी है। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) इस गिरावट को थामने की पूरी कोशिश कर रहा है, लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि जल्द ही एक डॉलर की कीमत 100 रुपये के ऐतिहासिक स्तर तक पहुंच सकती है।
पिछले कुछ दिनों में आरबीआई द्वारा उठाए गए सख्त कदमों से मुद्रा बाजार को थोड़ी राहत जरूर मिली है। इसी का नतीजा है कि रुपया 96.79 प्रति डॉलर के स्तर से सुधरकर 95 के करीब आ गया है। लेकिन बाजार के रणनीतिकारों की मानें तो यह सिर्फ एक फौरी राहत है। इस साल के अंत और 2027 के मध्य तक रुपये में भारी कमजोरी आने की आशंका है, जिससे 100 रुपये प्रति डॉलर का आंकड़ा भी अछूता नहीं रहेगा।
एसएंडपी ग्लोबल मार्केट इंटेलिजेंस की एशिया-पैसिफिक इकोनॉमिक्स प्रमुख हैना लुचनिकावा-शोर्श का कहना है कि आरबीआई के कदम रुपये की गिरावट की गति को धीमा जरूर कर सकते हैं, लेकिन वे बुनियादी समस्याओं को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते। उनके अनुसार, महंगे तेल, बढ़ते चालू खाते के घाटे और वैश्विक पूंजी प्रवाह की चुनौतियों के कारण यह दबाव लगातार बना रहेगा। उनकी फर्म का अनुमान है कि 2026 के अंत तक भारतीय मुद्रा 97 और 2027 के मध्य तक 98 रुपये प्रति डॉलर के आसपास कारोबार करेगी। इसी तरह, मिजुहो सिक्योरिटीज के विष्णु वरथन ने भी 2026 के अंत या अगले साल की शुरुआत तक रुपये के 98 तक खिसकने की भविष्यवाणी की है।
रुपये को संभालने के लिए केंद्रीय बैंक अपनी तरफ से हर संभव उपाय कर रहा है। आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मंगलवार को स्थानीय मीडिया आउटलेट मनीकंट्रोल को दिए एक साक्षात्कार में स्पष्ट किया कि विदेशी मुद्रा बाजार में सुचारू हलचल सुनिश्चित करने के लिए जो भी जरूरी कदम होंगे, वे उठाए जाएंगे। इसी कड़ी में शनिवार को केंद्रीय बैंक ने सट्टेबाजी को महंगा करने और रद्द किए गए विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंधों की रीबुकिंग को सीमित करने जैसे कड़े उपाय घोषित किए। इसके साथ ही, तीन सार्वजनिक तेल विपणन कंपनियों की दैनिक डॉलर की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक विशेष विंडो भी खोली गई है।
एचडीएफसी सिक्योरिटीज के रिसर्च हेड देवर्ष वकील इन कदमों को केवल अल्पकालिक या मध्यम अवधि का सहारा मानते हैं। उनका कहना है कि ये कदम लंबे समय तक रुपये को मजबूत नहीं रख सकते। इससे पहले जून में भी आरबीआई ने अनिवासी भारतीयों (एनआरआई) के लिए विदेशी मुद्रा जमा आकर्षित करने के लिए एफसीएनआर-बी (FCNR-B) जैसी विशेष योजना शुरू की थी। ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म नोमुरा की एक रिपोर्ट बताती है कि इस योजना से देश के विदेशी मुद्रा भंडार में 105 बिलियन डॉलर का बड़ा इजाफा तो हुआ, लेकिन वैश्विक प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण आरबीआई को हाजिर बाजारों में आक्रामक तरीके से डॉलर बेचकर हस्तक्षेप करना पड़ा।
इस जमा योजना के 30 अगस्त को बंद होने के बाद से रुपये में डॉलर के मुकाबले 1.9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। एम्बिट कैपिटल की बुधवार को आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, रुपये को बचाने के लिए आरबीआई द्वारा की गई डॉलर की बिक्री के कारण 2 अक्टूबर तक विदेशी मुद्रा भंडार में 51 बिलियन डॉलर की भारी कमी आ चुकी है। इसके अलावा, एफसीएनआर-बी और अन्य करेंसी स्वैप उपायों ने 200 बिलियन डॉलर की फॉरवर्ड डॉलर प्रतिबद्धताएं पैदा कर दी हैं। इससे आरबीआई का प्रभावी रिजर्व कवर कम हो गया है और रुपया और अधिक कमजोर होने की स्थिति में आ गया है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत का आयात कवर अब लगभग 6.2 महीने का रह गया है, जो 2013 के बाद का सबसे निचला स्तर है।
रुपये की इस खस्ताहाल स्थिति के पीछे ईरान युद्ध का भी बड़ा हाथ है। युद्ध के कारण आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई है। भारत अपनी ईंधन जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है और होर्मुज जलडमरूमध्य इसका एक प्रमुख मार्ग रहा है। ऊर्जा की इस आसमान छूती लागत और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) निवेश की कमी के बीच विदेशी निवेशकों ने जोखिम से बचते हुए भारतीय पूंजी बाजारों से भारी निकासी की है। भारतीय डिपॉजिटरी एनएसडीएल के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने इस साल 13 अक्टूबर तक 32.5 बिलियन डॉलर मूल्य की प्रत्यक्ष भारतीय इक्विटी बेची है।
अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे इस चौतरफा दबाव को कम करने के लिए खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आगे आना पड़ा है। उन्होंने पिछले महीने आम नागरिकों से विदेश यात्रा से बचने और सोना न खरीदने की विशेष अपील की थी ताकि स्थानीय मुद्रा को कुछ सहारा मिल सके। इससे पहले मई में भी उन्होंने ईरान युद्ध से पैदा हुए आर्थिक जोखिमों के बीच देशवासियों से ऐसा ही आग्रह किया था।
आनंद राठी ग्लोबल फाइनेंस के एसोसिएट डायरेक्टर हरसिमरन साहनी का मानना है कि मार्च 2027 को समाप्त होने वाले वित्तीय वर्ष तक रुपये पर यह दबाव इसी तरह बना रहेगा। उन्होंने सभी व्यवसायों को अपनी हेजिंग रणनीतियों को मजबूत करने और विदेशी मुद्रा जोखिमों का स्ट्रेस-टेस्ट करने की सलाह दी है।
उनका कहना है कि आरबीआई का हस्तक्षेप बाजार के उतार-चढ़ाव को कुछ हद तक कम जरूर कर सकता है, लेकिन यह बाहरी असंतुलन को अनिश्चित काल तक नहीं रोक सकता। आर्थिक विश्लेषकों की आम राय यही है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहती हैं, विदेशी फंड की निकासी जारी रहती है और चालू खाते का घाटा और बढ़ता है, तो रुपये का 100 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंचना अब महज समय की बात हो सकती है।
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