भारत में इस साल मानसून ने गहरी निराशा छोड़ी है। जून से सितंबर तक चलने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून के आधिकारिक अंत के साथ ही देश में 13 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है। बारिश में इस भारी कमी के कारण इस साल को आधिकारिक तौर पर ‘सूखे का साल’ घोषित किया जा सकता है।
आंकड़ों के लिहाज से देखें तो 2001 के बाद यह चौथा मौका है जब मानसूनी सीजन इतना कमजोर रहा है, जबकि 1901 के बाद से यह 13वां सबसे खराब साल साबित हुआ है।
हालांकि, दक्षिण भारत के लिए सर्दियों का मानसून कुछ उम्मीदें लेकर आ रहा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, 15 से 21 अक्टूबर के बीच दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में उत्तर-पूर्वी मानसून के दस्तक देने की प्रबल संभावना है। मौसम विभाग ने अक्टूबर से दिसंबर की अवधि के दौरान तमिलनाडु, पुडुचेरी, कराईकल, तटीय आंध्र प्रदेश, रायलसीमा क्षेत्र, केरल और दक्षिण आंतरिक कर्नाटक में सामान्य बारिश की भविष्यवाणी की है। फिर भी, सर्दियों की यह बारिश केवल कुछ सीमित क्षेत्रों को ही राहत दे पाएगी।
देश के अधिकांश अन्य हिस्सों में अक्टूबर से दिसंबर के दौरान ‘सामान्य से कम’ बारिश होने का अनुमान है। इसके विपरीत, उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ इलाकों जैसे पंजाब, हरियाणा के कुछ हिस्सों, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के साथ-साथ दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में ‘सामान्य या उससे अधिक’ बारिश हो सकती है। गौरतलब है कि पंजाब और प्रायद्वीपीय भारत को गर्मियों के मानसून में बारिश की भारी कमी का सामना करना पड़ा था, जिसके चलते इन राज्यों के कई जिलों में सूखे जैसे हालात पैदा हो गए थे।
दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत के लिए सर्दियों का मौसम बेहद महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यहां साल भर की कुल 30 प्रतिशत बारिश उत्तर-पूर्वी मानसून के दौरान ही होती है। वहीं, तमिलनाडु, पुडुचेरी और कराईकल में तो उनकी सालाना बारिश का 48 प्रतिशत हिस्सा इसी दौरान बरसता है। ऐसे में इस साल का सामान्य सर्दियों का मानसून इस क्षेत्र के लिए एक बड़ी राहत बन सकता है, जिसने 1901 के बाद से गर्मियों के मानसून में अपनी चौथी सबसे कम बारिश दर्ज की है।
आईएमडी के प्रमुख मृत्युंजय महापात्र ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि वर्तमान में दक्षिण प्रायद्वीप में सर्दियों के मानसून के आगमन की सटीक तारीख बताना मुश्किल है। आमतौर पर यह गर्मियों के मानसून की अंतिम विदाई के साथ मेल खाता है और 15 से 21 अक्टूबर के बीच कभी भी इस क्षेत्र में दस्तक दे सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर बारिश में 13 प्रतिशत की कमी है, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर यह अंतर कहीं ज्यादा चिंताजनक है।
बारिश की कमी के मामले में पूर्व और पूर्वोत्तर भारत 25 प्रतिशत के साथ सबसे बुरी स्थिति में है। इसके बाद दक्षिण प्रायद्वीप में 24 फीसदी, उत्तर-पश्चिम भारत में 6 फीसदी और मध्य भारत में 3 फीसदी कम बारिश हुई है। महापात्र ने यह भी बताया कि हाल के वर्षों में पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में बारिश के लगातार कम होने का एक स्पष्ट रुझान देखने को मिल रहा है।
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