इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी गांधीनगर (IITGN) की स्मार्ट मैटेरियल्स लेबोरेटरी के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा अनोखा वियरेबल सेंसर विकसित किया है, जो आपकी फिटनेस रूटीन में क्रांति ला सकता है। यह छोटा सा पैच स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, टेनिस खेलने या तैराकी के दौरान शरीर के प्रदर्शन की सटीक निगरानी करने में सक्षम है।
इन लचीले पैच का परीक्षण फिलहाल जिम जाने वाले लोगों और एथलीट्स पर उनके वास्तविक ट्रेनिंग सेशन के दौरान किया जा रहा है। शोधकर्ताओं की टीम इस तकनीक को और उन्नत बनाने के लिए उद्योग जगत और सरकारी साझेदारों की तलाश कर रही है, ताकि सेंसर से मिलने वाले सिग्नल्स की तुलना अनुभवी एथलीट्स और ट्रेनर्स के डेटाबेस से की जा सके।
तकनीकी विकास के मामले में यह प्रोटोटाइप वर्तमान में ‘टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल 5’ (TRL 5) पर है। इसे मुख्य रूप से स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, टेनिस और स्विमिंग के लिए परखा जा रहा है और इसके पेटेंट की प्रक्रिया भी प्रगति पर है।
IITGN के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर बिस्वजीत साहा ने बताया कि बिना नियमित देखरेख के शुरुआत करने वाले लोगों को अक्सर अपनी गलतियों का एहसास नहीं हो पाता। एक अनुभवी कोच भले ही ऐसी कमियों को तुरंत पकड़ ले, लेकिन भीड़भाड़ वाले जिम में हर व्यक्ति के हर मूवमेंट पर नज़र रखना मानवीय रूप से संभव नहीं है। इसी समस्या को देखते हुए इस खास वियरेबल सेंसर का विचार सामने आया, जो कोच की गैरमौजूदगी में भी एक्सरसाइज की बारीक जांच कर सकता है।
शरीर के चुनिंदा हिस्सों पर लगाए जाने वाले ये पैच मूवमेंट से जुड़े विद्युतीय बदलावों को रिकॉर्ड करते हैं। यह तकनीक ‘पीज़ोरेसिस्टिव सेंसिंग’ के सिद्धांत पर काम करती है, जहां शारीरिक हलचल के कारण सेंसर का आकार त्वचा के साथ बदलता है। इस खिंचाव से सेंसर की इलेक्ट्रिकल प्रतिक्रिया में बदलाव आता है और एक ऐसा सिग्नल पैदा होता है जिसका आसानी से मापन किया जा सकता है।
प्रोफेसर साहा के अनुसार, यह सिग्नल एक छोटे इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम से होते हुए ब्लूटूथ के जरिए सीधे मोबाइल डिवाइस तक पहुंचता है। इसके बाद एक अत्याधुनिक मशीन-लर्निंग मॉडल इन सिग्नल्स के पैटर्न का बारीकी से विश्लेषण करता है। अंत में इसकी तुलना राज्य और राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों और कोच से प्राप्त किए गए संदर्भ डेटा से की जाती है।
रिसर्च टीम की सदस्य और पीएचडी स्कॉलर कोशा नवनीत वैष्णव का कहना है कि इन पैटर्न्स की तुलना अनुभवी पेशेवरों के डेटा से करके ट्रेनर्स को अतिरिक्त और सटीक जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी। इससे किसी भी एक्सरसाइज या खेल के दौरान व्यक्ति के प्रदर्शन का कहीं बेहतर आंकलन किया जा सकेगा।
हालांकि, थकान होने पर एक ही व्यक्ति के मूवमेंट में थोड़ा बदलाव आना स्वाभाविक है। ऐसे में दो अलग-अलग सिग्नल्स का मतलब हमेशा कोई गलती होना नहीं होता। रिसर्च टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही तय करना है कि कौन सा बदलाव वास्तव में मायने रखता है और वह व्यक्ति की तकनीक के बारे में क्या संकेत दे रहा है।
टीम के एक अन्य सदस्य और पोस्टडॉक्टरल फेलो रवि प्रकाश वर्मा ने स्पष्ट किया कि यह नया सिस्टम पारंपरिक कोचिंग को खत्म करने के लिए नहीं बनाया गया है। बल्कि यह सिस्टम कोच के लिए एक पूरक के तौर पर काम करेगा और मूवमेंट पैटर्न की ऐसी मात्रात्मक जानकारी देगा, जिसे सिर्फ आंखों से देखकर समझ पाना अक्सर मुश्किल होता है।
यह संभावित स्पोर्ट्स पैच, अलग-अलग इस्तेमाल के लिए वियरेबल सेंसर विकसित करने के IITGN समूह के एक व्यापक प्रयास का हिस्सा है। टीम अब तक वेटलिफ्टिंग और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग से जुड़े 50 लोगों की निगरानी कर चुकी है। इसके साथ ही टेनिस, तैराकी और अन्य गतिविधियों के 30 प्रशिक्षुओं के मूवमेंट को भी सफलतापूर्वक कैप्चर किया जा चुका है।
कोशा वैष्णव ने बताया कि इस वर्तमान शोध के निष्कर्ष अभी आधिकारिक तौर पर प्रकाशित नहीं हुए हैं। टीम ने सेंसिंग हार्डवेयर, डेटा अधिग्रहण और विश्लेषण को एक ही सुव्यवस्थित प्लेटफॉर्म पर एकीकृत कर दिया है।
भविष्य की योजनाओं पर प्रकाश डालते हुए प्रोफेसर साहा ने कहा कि वे इसे एक व्यावसायिक उत्पाद के रूप में बाजार में उतारने की तैयारी कर रहे हैं। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए फिटनेस सेंटर्स, स्पोर्ट्स अकादमियों और एथलीट्स के साथ सहयोग बढ़ाया जा रहा है। साथ ही, तकनीक को बड़े पैमाने पर विकसित करने के लिए संबंधित इंडस्ट्री और सरकारी निकायों से फंडिंग की भी तलाश की जा रही है।
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