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अडानी ग्रुप का 30,000 करोड़ रुपए का भागलपुर पावर प्रोजेक्ट बदलेगा बिहार की किस्मत, बिजली उत्पादन से मिलेगा उद्योगों को बूस्ट

| Updated: November 7, 2025 18:03

यह कई दशकों में पहली बार है जब बिहार राज्य में बड़े निजी निवेशों की लहर देखी जा रही है।

अहमदाबाद। अडानी ग्रुप की ओर से करीब 30,000 करोड़ रुपए के निवेश से बनाया जा रहा भागलपुर पावर प्रोजेक्ट बिहार के आर्थिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ की भूमिका निभाएगा। यह एनर्जी गैप और उद्योगों को उभरने में मदद करेगा और 13.5 करोड़ लोगों के लिए नए अवसर पैदा करेगा।

यह कई दशकों में पहली बार है जब बिहार राज्य में बड़े निजी निवेशों की लहर देखी जा रही है।

सच्चाई यह है कि आधी सदी से भी ज्यादा समय से बिहार भारत की औद्योगिक प्रगति के हाशिये पर रहा है। अपनी जनसांख्यिकीय मजबूती और रणनीतिक स्थिति के बावजूद, राज्य निजी निवेश आकर्षित करने या एक स्थायी औद्योगिक आधार बनाने के लिए संघर्ष करता रहा है।

आंकड़े भी एक गंभीर सच्चाई बयां करते हैं। बिहार का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) करीब 776 डॉलर है, जबकि प्रति व्यक्ति बिजली खपत 317 किलोवाट घंटा (केडब्लूएच) है, जो कि प्रमुख भारतीय राज्यों में सबसे कम है।

दूसरी तरफ, गुजरात में प्रति व्यक्ति बिजली खपत 1,980 केडब्ल्यूएच है और प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 3,917 डॉलर है।

शक्ति और समृद्धि साथ-साथ चलते हैं। जहां विश्वसनीय बिजली आपूर्ति होती है, वहां उद्योग पनपते हैं, रोजगार पैदा होते हैं और आय बढ़ती है।

जहां यह नहीं होती, वहां मानवीय क्षमताएं पलायन कर जाती हैं। बिहार आज लगभग 3.4 करोड़ कामगारों को दूसरे राज्यों में भेजता है। इसके युवा दूसरी जगहों पर आजीविका तलाशने को मजबूर हैं क्योंकि राज्य के भीतर उद्योगों विकसित करने की क्षमता नहीं है।

इस कारण, अडानी समूह द्वारा 30,000 करोड़ रुपए के निवेश से विकसित किया जा रहा भागलपुर (पीरपैंती) पावर प्रोजेक्ट ऐतिहासिक महत्व रखता है। यह सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह बिहार के लिए भारत के विकास के ग्रिड से जुड़ने और अंततः औद्योगिक प्रगति में अपना हिस्सा हासिल करने का अवसर है।

बिहार में आधी सदी से निजी औद्योगिक गतिविधियां न के बराबर रही हैं। पिछले पांच वर्षों में यहां लगभग कोई भी नई बड़े पैमाने की परियोजनाएं नहीं लगी हैं। राज्य की कृषि पर निर्भरता अभी भी उच्च स्तर पर है और इसकी लगभग 50 प्रतिशत कार्यशील आबादी खेती, वानिकी या मछली पकड़ने में लगी है, जबकि केवल 5.7 प्रतिशत लोग ही विनिर्माण क्षेत्र में कार्यरत हैं।

2,400 मेगावाट क्षमता वाला भागलपुर पावर प्रोजेक्ट, जिसकी परिकल्पना मूल रूप से बिहार राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी लिमिटेड (बीएसपीजीसीएल) ने 2012 में की थी, को सरकार ने 2024 में पारदर्शी ई-बोली प्रक्रिया के माध्यम से पुनर्जीवित किया।

इसके टेंडर में चार विश्वसनीय बोलीदाताओं – अडानी पावर, टोरेंट पावर, ललितपुर पावर जेनरेशन और जेएसडब्ल्यू एनर्जी – ने भाग लिया। अडानी पावर 6.075 रुपए प्रति किलोवाट घंटा की दर से सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी के रूप में उभरी।

इस प्रोजेक्ट में कोई भूमि हस्तांतरण शामिल नहीं है। प्रोजेक्ट के लिए एक दशक से भी पहले अधिग्रहित की गई भूमि, बिहार औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन नीति 2025 के तहत कंपनी को नाममात्र किराए पर पट्टे पर दी गई है और बिहार सरकार के पूर्ण स्वामित्व में है। प्रोजेक्ट की अवधि समाप्त होने पर, यह जमीन स्वतः ही राज्य को वापस मिल जाएगी।

ऐसे युग में जहां निवेशकों का विश्वास पारदर्शिता और शासन पर निर्भर करता है, भागलपुर मॉडल जिम्मेदार निवेश के लिए एक आदर्श उदाहरण के रूप में उभर कर सामने आता है और सार्वजनिक स्वामित्व और निजी दक्षता के बीच संतुलन स्थापित करता है।

हाल के वर्षों में बिहार में बिजली की मांग में तेजी से वृद्धि हुई है, लेकिन आपूर्ति में तेजी नहीं आई है। राज्य के पास लगभग 6,000 मेगावाट की स्थापित उत्पादन क्षमता है, जबकि वित्त वर्ष 25 में अधिकतम मांग 8,908 मेगावाट दर्ज की गई थी, जिसके कारण राज्य को राष्ट्रीय ग्रिड से बिजली आयात करनी पड़ती है।

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) के अनुसार, वित्त वर्ष 35 तक मांग लगभग दोगुनी होकर 17,097 मेगावाट होने का अनुमान है। नए पावर प्रोजेक्ट्स के बिना राज्य में आपूर्ति और मांग में अंतर बढ़ जाएगा और औद्योगिक विस्तार सीमित होगा, रोजगार सृजन कम होगा और समग्र विकास धीमा हो जाएगा।

भागलपुर प्रोजेक्ट इस ऊर्जा मांग की महत्वपूर्ण कमी को पूरा करने में मदद कर सकती है। इस प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों के अनुसार, बिहार के ग्रिड में 2,400 मेगावाट जोड़कर, यह अगले दशक में राज्य की अनुमानित अतिरिक्त बिजली जरूरतों का लगभग एक-चौथाई हिस्सा पूरा करेगा।

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