कल्पना कीजिए कि आप किसी शहर की सड़क पर चल रहे हैं और आपके हर दस में से आठ कदम सिर्फ कंक्रीट या डामर पर पड़ रहे हैं। वहां शायद ही कोई घास या पेड़-पौधे बचे हों। अगर अनियंत्रित विकास इसी तरह जारी रहा, तो साल 2045 तक अहमदाबाद का ठीक यही हाल होने वाला है।
एक नए अध्ययन में यह चौंकाने वाला अनुमान लगाया गया है कि 2045 तक अहमदाबाद का ‘कृत्रिम कंक्रीट फुटप्रिंट’ महानगर क्षेत्र के 77.1 प्रतिशत हिस्से तक फैल जाएगा। इस क्षेत्र में अहमदाबाद नगर निगम (AMC), औडा (Auda) के साथ-साथ गूडा (Guda) और गांधीनगर नगर निगम (GMC) के छोटे हिस्से भी शामिल हैं।
इस तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण शहर का निर्मित या बिल्ट-अप क्षेत्र 310.2 वर्ग किलोमीटर तक पहुंच सकता है। वहीं दूसरी तरफ, शहर की हरियाली बहुत तेजी से खत्म होने की कगार पर है। शोध के अनुसार, शहर के फेफड़े कहे जाने वाले पेड़-पौधे और वनस्पतियां 2000 में 33.04 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले थे।
लेकिन 2045 तक यह सिमटकर मात्र 5 वर्ग किलोमीटर रह जाएंगे। यह 85 प्रतिशत की भारी गिरावट है, जिसका सीधा मतलब यह है कि भीषण गर्मी और लू से बचने के लिए अहमदाबाद के लोगों के पास पेड़ों की छांव नाम मात्र की रह जाएगी।
यह गंभीर चेतावनी सैटेलाइट डेटा पर आधारित एक नए अध्ययन से सामने आई है। “इंटीग्रेटिंग जीईई, मशीन लर्निंग, एंड मोल्यूस्के फॉर प्रिडिक्टिंग अर्बन एलयूएलसी डायनेमिक्स ऑफ अहमदाबाद मेट्रोपॉलिटन रीजन, इंडिया” नामक यह शोध दिल्ली विश्वविद्यालय के सतत शिक्षा और विस्तार विभाग के रूपेश गुप्ता द्वारा किया गया है।
उनके इस विस्तृत अध्ययन को प्रतिष्ठित ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इंजीनियरिंग एंड जियोसाइंसेस’ में प्रकाशित किया गया है।
अहमदाबाद पहले से ही इस बदलाव के दुष्प्रभावों का सामना कर रहा है। शोधकर्ता रूपेश गुप्ता का कहना है कि 45 वर्षों के भीतर प्राकृतिक वनस्पतियों का 85 प्रतिशत नष्ट हो जाना शहर के पारिस्थितिक संतुलन को बुरी तरह बिगाड़ देगा। इसका सीधा असर कार्बन अवशोषण, माइक्रोकलाइमेट नियमन, हवा की गुणवत्ता और जैव विविधता पर पड़ेगा।
उन्होंने बताया कि दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (DMIC), स्मार्ट सिटी परियोजनाओं और मेट्रो तथा एक्सप्रेसवे नेटवर्क के तेजी से विस्तार जैसे बड़े विकास प्रोजेक्ट्स एक बेहद असंतुलित शहरीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं।
इस अध्ययन के विश्लेषण से यह तथ्य भी सामने आया है कि साल 2000 से 2020 के बीच शहर के कंक्रीट वाले इलाके में 62 वर्ग किलोमीटर का विस्तार हुआ है। यह इलाका 161.4 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 223.4 वर्ग किलोमीटर हो गया।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस नए कंक्रीट का लगभग पूरा हिस्सा उस खुली बंजर जमीन पर बिछाया गया है, जो कभी 125.7 वर्ग किलोमीटर में फैली थी और अब सिमट कर केवल 50.8 वर्ग किलोमीटर रह गई है।
रूपेश गुप्ता स्पष्ट करते हैं कि बंजर भूमि अक्सर एक बफर या विकास रिजर्व के रूप में काम करती है, लेकिन इसमें भारी गिरावट आ रही है। इसका अर्थ यह है कि महानगर सीमा के भीतर मौजूद लगभग सभी खुली और कम उपयोग वाली जमीनों को निर्मित या अर्ध-निर्मित सतहों में बदल दिया जाएगा।
इसकी वजह से जलभराव और सतह से पानी बहने की समस्या गंभीर हो सकती है, जिससे भविष्य की शहरी योजना में लचीलापन कम हो जाएगा।
इससे बचने के लिए उन्होंने तुरंत एक मेट्रोपॉलिटन लैंड यूज ऑब्जर्वेटरी बनाने की वकालत की है, ताकि इन बदलावों पर रियल-टाइम नज़र रखी जा सके। साथ ही आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स) को बचाने, शहरी जंगलों को बढ़ावा देने और रूफटॉप गार्डन को अनिवार्य बनाने के लिए सख्त कानून लागू करने का सुझाव दिया है।
इस अध्ययन के लिए दशकों पुरानी सैटेलाइट तस्वीरों को प्रोसेस करने हेतु क्लाउड कंप्यूटिंग प्लेटफॉर्म गूगल अर्थ इंजन (GEE) का इस्तेमाल किया गया था। गुप्ता ने साल 2000 के लिए यूएसजीएस (USGS) लैंडसैट 7 सैटेलाइट और 2020 के लिए लैंडसैट 8 सैटेलाइट की तस्वीरों का चयन किया।
इन तस्वीरों को सेल्युलर ऑटोमेटा-आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क नामक एक एआई-आधारित विशेष सिम्युलेटर में फीड किया गया। बेहतर सिंचाई के कारण साल 2000 से 2020 के बीच अहमदाबाद के बाहरी इलाकों में खेती की जमीन में मामूली वृद्धि जरूर हुई थी। हालांकि, यह एआई मॉडल भविष्यवाणी करता है कि 2045 तक खेती की जमीन 97.4 वर्ग किलोमीटर से घटकर केवल 57.4 वर्ग किलोमीटर ही रह जाएगी।
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