अमीर घर पर रहते हैं, गरीब स्वास्थ्य देखभाल पर खर्च से जूझते हैं

| Updated: July 22, 2021 2:34 pm

ऐसा कहा जाता है कि अधिकांश भारतीयों और गरीबी के बीच बस एक बीमारी की दूरी है, और कोविड ने यह साबित कर दिया है |

जुहापुरा के एक ऑटोरिक्शा चालक अकबर मियां (32) दूसरी लहर के दौरान बचत में हुए नुकसान की भरपाई के लिए दिन में लगभग 18 घंटे काम कर रहे हैं। उनकी भतीजी, जो पिछले महीने कोविड से संक्रमित हुई और एक सरकारी अस्पताल से इलाज कराकर लौटी, उसे जल्‍द ही म्‍यूकरमायकोसिस (काली फंगस) का पता चला।

इलाज का खर्च तो पूरी तरह से अस्पताल ने ही उठाया,लेकिन अब छुट्टी के बाद दवाओं की लागत अकबर और उसके परिवार की रातों की नींद हराम कर रही है।

अकबर ने कहा, “एक महीना हो गया है और वह अभी भी काली फंगस के लिए घर पर इलाज करा रही है। हमें 2 लाख रुपये के करीब उधार लेना पड़ा और अब हम इसे चुकाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।’ उन्‍होंने बताया कि कोविड के कारण लगे लॉकडाउन ने उनकी आय को कम कर दिया है क्योंकि अधिक से अधिक लोग अब अपने स्वयं के वाहनों में यात्रा करना पसंद करते हैं।

प्रहलाद नगर इलाके में एक कॉफी शॉप की कर्मचारी सुरभि देसाई ने अप्रैल में अपनी मां को कोविड के कारण खो दिया था। उन्होंने कहा, ‘मैं परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य हूं और जहां मैं काम करती हूं, वह बंद चल रहा था और मेरी आय का रास्ता बंद था। मैंने अपनी मां के अंतिम संस्कार के खर्च की व्यवस्था के भी संघर्ष किया।’

दृष्टि परमार (31) और उनकी मां को एक महीने पहले कोविड-19 संक्रमण का पता चला था। जब दृष्टि की मां संक्रमण के कारण अंतिम सांस ले रही थीं, तब दृष्टि म्यूकरमायकोसिस के कारण जबड़े की सर्जरी करा रही थी। द्रष्टि के दूर के रिश्तेदार ने कहा, ‘दृष्टि अब घर में उपचार करा रही हैं। ब्लैक फंगस के इलाज की दवा की कीमत 20,000 रुपये प्रति शीशी और एक टैबलेट स्ट्रिप की कीमत 10,000 रुपये है। अब तक उन्हेंं इन दवाओं की खरीद के लिए प्रति सप्ताह 80,000 से 90,000 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। उनके पति इलेक्ट्रीशियन का काम करते हैं और लॉकडाउन के बाद से काम के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनके दो छोटे बच्चे हैं। हमें उनकी मदद के लिए एक फंडरेजर शुरू करना पड़ा।

गरीब होते गए और गरीब 

मार्च 2021 में प्रकाशित यूएस-आधारित फैक्ट-टैंक प्यू रिसर्च सेंटर के निष्कर्षों के अनुसार, कोविड-19 के कारण आई मंदी की वजह से भारत में गरीब लोगों की संख्या (एक दिन में 2 डॉलर या उससे कम की आय) में 7.5 करोड़ की वृद्धि का अनुमान है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत और चीन में वैश्विक आबादी का एक तिहाई है। इनमें से किसी देश में आय वितरण का पैटर्न वैश्विक अर्थव्यवस्था पर एक बड़ा प्रभाव डालता है। भारत के मामले में प्रति दिन 2 डॉलर से कम आय वाले लोगों की संख्या में 7.5 करोड़ की वृद्धि वैश्विक स्तर पर गरीबी में वृद्धि का लगभग 60 प्रतिशत है।

प्रवासी मजदूरों पर सबसे ज्यादा असर

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के कंज्यूमर पिरामिड हाउसहोल्ड सर्वे ने अप्रैल और मई, 2021 के दौरान रोजगार पर कोविड -19 के प्रभाव को दिखाया। यह समय पूरे भारत में दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों के लिए मुश्किल बीता था। अप्रैल-मई में कुल 2.23 करोड़ नौकरियां गईं, जिनमें से 1.72 करोड़ दैनिक वेतन भोगियों की थीं।

अहमदाबाद के एक श्रम अधिकार संगठन आजीविका ब्यूरो के अनौपचारिक अनुमानों के अनुसार शहर में 13 लाख सर्कुलर प्रवासी श्रमिक हैं, जो 5 प्रमुख क्षेत्रों – कंस्ट्रक्शन, मैन्यूफैक्चरिंग, होटल व रेस्तरां, हेड लोडिंग और घरेलू कार्यों में कार्यरत श्रमिकों का बड़ा हिस्सा हैं। 

संगठन के एक सदस्य ने कहा कि यह आबादी दूसरी लहर के दौरान बुरी तरह प्रभावित हुई। आजीविका ब्यूरो के एक वकील और शोधकर्ता शुभम कौशल ने कहा, ‘हमारे सर्वेक्षण से पता चला है कि शहर में दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों की साप्ताहिक कमाई में दूसरी लहर की शुरुआत के बाद आंशिक लॉकडाउन के दौरान 30 प्रतिशत की गिरावट आई। लगभग 60 प्रतिशत ने कहा कि उनके पास कोई पैसा नहीं बचा है। इनमें से 27 प्रतिशत श्रमिकों ने कहा कि उन्हें कोविड -19 संक्रमण सहित विभिन्न स्वास्थ्य समस्याएं हैं।’

कौशल ने कहा कि वित्तीय स्थिति इतनी विकट है कि कोविड प्रभावित श्रमिकों को साहूकारों से 10 प्रतिशत या उससे अधिक के ब्याज पर उधार लेने के लिए मजबूर होना पड़ा, ताकि वे स्वास्थ्य देखभाल का खर्च उठा सकें। कौशल ने कहा, ‘कोई यह नहीं मान सकता कि इन श्रमिकों को उचित उपचार भी मिला होगा, क्योंकि इनमें से कई ऐसे निजी स्वास्थ्य पेशेवरों के पास गए, जो कोविड के इलाज में सक्षम नहीं थे। जागरूकता की कमी के कारण इनमें से कई झोलाछाप डॉक्टरों के पास भी गए और उन्होंने उनसे बहुत पैसे वसूले।’

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