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गुजरात के गिर में आठ शेरों की मौत: क्या है ‘बबेसिओसिस’ संक्रमण और विशेषज्ञ क्यों नहीं मान रहे इसे बड़ा खतरा?

| Updated: June 2, 2026 13:41

गुजरात के गिर में 'बबेसिओसिस' संक्रमण से आठ शेरों की जान जाने के बाद अलर्ट जारी किया गया है। जानिए क्या है यह बीमारी, वन्यजीव विशेषज्ञ इसे बड़ी आपात स्थिति क्यों नहीं मान रहे और एशियाई शेरों को विलुप्त होने से बचाने का स्थायी समाधान क्या है।

गुजरात के गिर क्षेत्र में एक संदिग्ध संक्रमण ने आठ शेरों की जान ले ली है। मरने वालों में शावक भी शामिल हैं। राज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने शुक्रवार, 29 मई को जानकारी दी कि इन मौतों के पीछे बबेसिओसिस (Babesiosis) नामक संक्रमण होने की आशंका है, जो बबेसिया परजीवी के कारण फैलता है।

एहतियात के तौर पर वन विभाग ने गिर सोमनाथ और अमरेली जिलों के प्रभावित इलाकों के 10 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले शेरों को अलग कर दिया है। इसके साथ ही जिन शेरों में संक्रमण के लक्षण दिख रहे हैं, उनका इलाज भी शुरू कर दिया गया है।

इस घटना के बाद वन्यजीव प्रेमियों में स्वाभाविक रूप से चिंता है, लेकिन देश के जाने-माने वन्यजीव वैज्ञानिक इसे कोई बड़ी आपात स्थिति नहीं मानते हैं। इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी और टीआईएफआर-नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज (बेंगलुरु) के वरिष्ठ वैज्ञानिक यादवेंद्रदेव वी. झाला के अनुसार, प्रकृति में बीमारियों और मेजबान (होस्ट) के बीच एक संतुलन होता है।

बाघों और शेरों पर व्यापक शोध का अनुभव रखने वाले इस वरिष्ठ वैज्ञानिक का कहना है कि गुजरात में शेरों की आबादी लगभग 1,000 तक पहुंच चुकी है, ऐसे में कुछ मौतों को लेकर घबराने या वन्यजीवों के प्राकृतिक जीवन में तुरंत दखल देने की कोई जरूरत नहीं है।

आखिर यह संक्रमण क्या है और कैसे फैलता है? बबेसिया एक परजीवी है जो मुख्य रूप से टिक्स (किलनी) के काटने से शेरों और अन्य वन्यजीवों के शरीर में पहुंचता है। यह परजीवी मवेशियों और चीतल या नीलगाय जैसे खुर वाले जंगली जानवरों में बहुत ही निचले स्तर पर पाया जाता है। सामान्य तौर पर यह बिना कोई लक्षण दिखाए या नुकसान पहुंचाए इन जानवरों के शरीर में मौजूद रहता है।

यह संक्रमण काफी हद तक मलेरिया की तरह ही काम करता है। प्लाज्मोडियम की तरह यह भी एक प्रोटोजोआ है, जो लाल रक्त कोशिकाओं को संक्रमित कर उन्हें नष्ट कर देता है। इसके प्रमुख लक्षणों में सुस्ती, एनीमिया (खून की कमी), तिल्ली (स्प्लीन) का बढ़ना और तेज बुखार शामिल हैं।

जब कोई जानवर पहले से ही किसी अन्य संक्रमण, पोषण की कमी या आनुवंशिक कमजोरी के कारण तनाव में होता है, तब यह बीमारी जानलेवा साबित होती है और अंगों के काम न करने से उसकी मौत हो सकती है।

वैज्ञानिक झाला का स्पष्ट मानना है कि जंगली आबादी में प्राकृतिक प्रक्रियाओं को उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए और बिना वजह वन्यजीवों का इलाज करने की कोई आवश्यकता नहीं है। हालांकि, वह एक बड़े खतरे की ओर जरूर इशारा करते हैं। रेबीज या कैनाइन डिस्टेंपर जैसी महामारियों से शेरों को बचाने के लिए उनकी आबादी को अलग-अलग और असंबद्ध क्षेत्रों में बांटना बेहद जरूरी है, जो भविष्य के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगा।

इस खतरे की गंभीरता को समझने के लिए 1990 के दशक के मध्य में अफ्रीका के सेरेनगेटी में आई महामारी का उदाहरण काफी है। उस समय महज तीन महीने के भीतर वहां के एक तिहाई शेरों की मौत हो गई थी। एशियाई शेर ऐसी किसी भी भयानक महामारी को बर्दाश्त नहीं कर सकते। इसके अलावा, ऐतिहासिक कारणों से एशियाई शेरों में आनुवंशिक विविधता (जेनेटिक डायवर्सिटी) बहुत कम है, जिससे वे बीमारियों की चपेट में जल्दी आ जाते हैं।

क्या यह घटना शेरों को गुजरात के बाहर किसी अन्य क्षेत्र में बसाने की एक और चेतावनी है? आंकड़े भी इसी ओर इशारा करते हैं। वर्तमान में एशियाई शेरों के पास गिर राष्ट्रीय उद्यान में केवल 250 वर्ग किलोमीटर का ही विशेष क्षेत्र है। सौराष्ट्र के बाकी हिस्सों में उन्हें इंसानों और मवेशियों के साथ जगह साझा करनी पड़ती है।

इसके उलट अगर बाघों की बात करें, तो वे 11 देशों में पाए जाते हैं। अकेले भारत में 58 टाइगर रिजर्व हैं और हर रिजर्व में बाघों के लिए 800 से 1,000 वर्ग किलोमीटर का इंसान-रहित क्षेत्र मौजूद है। संरक्षण जीव विज्ञान के सिद्धांत भी यही कहते हैं कि किसी एक जगह पर केंद्रित आबादी की तुलना में, अलग-अलग जगहों पर बसी आबादी के विलुप्त होने का जोखिम काफी कम होता है। इसलिए, एशियाई शेरों को उनके ऐतिहासिक क्षेत्रों में कई अलग-अलग जगह बसाना अब वक्त की सबसे बड़ी मांग है।

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