गुजरात में हाईकोर्ट के नए निर्देशों के खिलाफ वकीलों का गुस्सा फूट पड़ा है। राज्य भर के वकीलों ने अदालती कामकाज का पूरी तरह से बहिष्कार करते हुए अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी है। यह पूरा विवाद याचिकाओं और कानूनी दस्तावेजों के लिए अनिवार्य किए गए विशिष्ट ए4 साइज पेपर और कंप्यूटर फॉन्ट के नए नियमों से जुड़ा है।
बृहस्पतिवार को इस विरोध प्रदर्शन ने तब और जोर पकड़ लिया जब गुस्साए वकीलों ने वडोदरा जिला अदालत के गेट पर ताला जड़ दिया। दरअसल, हाईकोर्ट ने अप्रैल में एक सर्कुलर जारी किया था, जिसे एक अगस्त से सख्ती से लागू कर दिया गया है। इसके बाद से ही पूरे राज्य के बार एसोसिएशन इस नए नियम को रोकने या इसमें अहम बदलाव की मांग को लेकर लामबंद हो गए हैं।
इस राज्यव्यापी आंदोलन के कारण जिला अदालतों में न्यायिक कार्यवाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। वकीलों का स्पष्ट कहना है कि कंप्यूटर आधारित इस नई व्यवस्था का पालन करने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा कई जिलों में मौजूद ही नहीं है। खासकर आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है, जिससे इस आदेश का पालन करना लगभग असंभव हो गया है।
यह सारा विवाद गुजरात हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा 15 अप्रैल 2026 को जारी किए गए एक सर्कुलर के बाद शुरू हुआ। इसमें सभी प्रमुख जिला न्यायाधीशों और विभिन्न अदालतों के प्रमुखों को एक अगस्त से नए नियमों का आवश्यक अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था। बार एसोसिएशन के अनुरोध पर पहले इसके कार्यान्वयन को टाल दिया गया था।
गुजरात बार काउंसिल की सदस्य और बड़ौदा बार एसोसिएशन की कोषाध्यक्ष, वकील निमिषा धोत्रे ने बताया कि वकीलों ने अपना कड़ा विरोध जताने के लिए वडोदरा अदालत के गेट बंद कर दिए हैं। उनका कहना है कि अदालत ने अब कंप्यूटरीकृत आवेदनों को अनिवार्य कर दिया है, जबकि पहले आसानी से हस्तलिखित आवेदन भी स्वीकार कर लिए जाते थे।
उन्होंने स्पष्ट किया कि छोटा उदयपुर जैसे छोटे बार एसोसिएशन इस नई प्रणाली के बिल्कुल भी आदी नहीं हैं। वहां के वकील और मुवक्किल दोनों ही कंप्यूटर फॉन्ट की इस जटिल व्यवस्था से पूरी तरह अनजान हैं। यहां तक कि कई अदालती अधिकारियों के सिस्टम में भी जरूरी फॉन्ट उपलब्ध नहीं हैं। इस गंभीर समस्या को लेकर बार काउंसिल ऑफ गुजरात ने सोमवार को मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखा है और उन्हें एक सकारात्मक समाधान की उम्मीद है।
वकीलों के संगठनों का स्पष्ट कहना है कि वे अदालती कामकाज के डिजिटलीकरण या उसकी एकरूपता के बिल्कुल भी खिलाफ नहीं हैं। उनकी मुख्य आपत्ति इस बात पर है कि जिला अदालतों, वकीलों और मुवक्किलों के पास आवश्यक सॉफ्टवेयर, फॉन्ट और प्रिंटिंग सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित किए बिना ही इन कड़े निर्देशों को अचानक लागू कर दिया गया।
दूरस्थ आदिवासी जिले दाहोद में भी वकीलों ने अदालत परिसर के बाहर जमकर विरोध प्रदर्शन किया। दाहोद जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अजय चौहान ने कहा कि दूरदराज के इलाकों में वकीलों को इस सर्कुलर के पालन में भारी व्यावहारिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय स्तर पर आवश्यक तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध न होने के कारण सभी वकीलों ने इस आदेश को संशोधित करने की पुरजोर अपील की है।
अजय चौहान के अनुसार, कई वकील बहुत दूर-दराज के इलाकों से अदालत पहुंचते हैं और वर्तमान में उनके लिए जरूरी बुनियादी ढांचा पूरी तरह नदारद है। इसलिए दाहोद जिले के सभी वकीलों ने एकजुट होकर तब तक अदालती कामकाज से दूर रहने का फैसला किया है, जब तक कि हाईकोर्ट अपने सर्कुलर में संशोधन या उसे निलंबित नहीं कर देता।
इस पूरे मामले में हस्तक्षेप करते हुए गुजरात बार काउंसिल ने पांच अगस्त को रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा है। सचिव सिद्धि भावसार द्वारा हस्ताक्षरित इस पत्र में हाईकोर्ट से नए नियमों के कार्यान्वयन पर तुरंत पुनर्विचार करने का आग्रह किया गया है।
बार काउंसिल के 23 निर्वाचित सदस्यों और राज्य भर के बार एसोसिएशनों की ओर से सौंपे गए इस ज्ञापन में वकीलों की रोजमर्रा की परिचालन संबंधी चुनौतियों को प्रमुखता से उजागर किया गया है। ज्ञापन में बताया गया है कि अदालती कार्यवाही के दौरान कई दस्तावेज तुरंत तैयार करने होते हैं, जिन्हें सीमित समय में टाइप और प्रिंट करवाना बिल्कुल अव्यावहारिक है।
जमानत बांड, छूट आवेदन और स्थगन अनुरोध जैसे कई जरूरी और तत्काल वाले कामों के लिए हाथ से लिखे विवरण की आवश्यकता होती है। ज्ञापन में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों की निचली अदालतों में आज भी अनियमित बिजली आपूर्ति और खराब डिजिटल ढांचे की विकराल समस्या बनी हुई है।
निचली अदालतों में प्रैक्टिस करने वाले लगभग अस्सी प्रतिशत वकीलों के पास अपना कोई स्वतंत्र कार्यालय या कंप्यूटर सुविधा नहीं है। वे अपने कानूनी दस्तावेजों के लिए आज भी पूरी तरह से स्थानीय टाइपिस्टों पर ही निर्भर हैं। इन टाइपिस्टों को भी नए फॉन्ट की कोई तकनीकी जानकारी नहीं है।
बार काउंसिल ने मुख्य न्यायाधीश से विशेष अनुरोध किया है कि जब तक पूरे राज्य में उचित तकनीकी समाधान और पर्याप्त बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं हो जाता, तब तक इसके कार्यान्वयन को स्थगित रखा जाए। साथ ही नई व्यवस्था में ढलने के लिए छह महीने की संक्रमण अवधि देने की भी मांग की गई है।
अधिवक्ताओं ने ट्रायल की कार्यवाही के लिए वर्तमान में इस्तेमाल होने वाले नियमित फॉन्ट के उपयोग की अनुमति देने की गुहार लगाई है। इसके अलावा, लीगल-साइज पेपर, टाइप किए गए दस्तावेजों और हस्तलिखित आवेदनों को भी फिलहाल जारी रखने का आग्रह किया गया है, खासकर निचली अदालतों के तत्काल मामलों में।
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 123 के तहत गुजरात हाईकोर्ट नियम समिति और जिला न्यायपालिका नियम समिति की सिफारिश पर यह विवादित सर्कुलर जारी किया गया था। यह आदेश पूरे गुजरात की जिला अदालतों में याचिकाओं, हलफनामों, अपीलों और फैसलों समेत सभी प्रकार के दस्तावेजों के लिए ए4 आकार के कागज का समान रूप से उपयोग करना अनिवार्य बनाता है।
फाइलिंग के लिए तय की गई सख्त तकनीकी विशिष्टताओं के अनुसार, इस्तेमाल होने वाला ए4 साइज पेपर (29.7 सेमी x 21 सेमी) 75 जीएसएम से कम का नहीं होना चाहिए। इस बेहतर गुणवत्ता वाले कागज के दोनों तरफ छपाई होनी चाहिए और मार्जिन के तौर पर बाएं और दाएं 4 सेमी तथा ऊपर और नीचे 2 सेमी की सटीक जगह छोड़ना अनिवार्य किया गया है।
टाइपिंग के लिए केवल गुजराती फॉन्ट (लोहित गुजराती, नोटो सेन्स गुजराती या नोटो सेरिफ गुजराती, फॉन्ट साइज 13) अथवा अंग्रेजी फॉन्ट (टाइम्स न्यू रोमन, फॉन्ट साइज 14) का ही इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें 1.5 लाइन स्पेसिंग रखनी होगी, जबकि किसी कोटेशन के लिए सिंगल लाइन स्पेसिंग के साथ 12 फॉन्ट साइज तय किया गया है।
हालांकि, हाईकोर्ट के इस सर्कुलर में यह भी स्पष्ट किया गया है कि ये नए तकनीकी नियम पुलिस दस्तावेजों, चार्जशीट, पुलिस रिपोर्ट, फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) रिपोर्ट या अन्य संस्थानों की मूल रिपोर्ट पर लागू नहीं होंगे।
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