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कच्छ में मिला 11वीं सदी का आबाद शहर, कंकालों और खंडहरों ने खोले कई राज

| Updated: August 4, 2026 15:46

बीएसएफ की गश्त के दौरान कच्छ के दुर्गम इलाके में मिला 11वीं सदी का एक समृद्ध शहर, जहां 100 मानव कंकालों और प्राचीन धरोहरों ने खोले इतिहास के कई गहरे राज।

भारत-पाकिस्तान सीमा के करीब कच्छ के दुर्गम इलाके में एक चौंकाने वाला पुरातात्विक खुलासा हुआ है। सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवानों ने गश्त के दौरान जिस जगह को केवल एक वीरान इलाका समझ लिया था, वह असल में मध्यकाल का एक बेहद समृद्ध और आबाद शहर निकला। साल 2023-24 की नियमित गश्त के दौरान जब बीएसएफ के जवानों ने पहली बार इन अजीबोगरीब ढांचों को देखा, तो उन्होंने इस सुनसान जगह को ‘उजाड़गांव’ का नाम दे दिया था।

हालांकि, जब पुरातत्वविदों ने इस क्षेत्र की गहराई से जांच की, तो एक पूरी तरह से विकसित मध्यकालीन बस्ती के प्रमाण सामने आए। विशेषज्ञों ने फिलहाल इस जगह को ‘बर्बादगांव’ का अस्थायी नाम दिया है। इस प्राचीन स्थल पर ईंटों की चारदीवारी, पक्के फर्श, मिट्टी के बर्तन और कई घरेलू इस्तेमाल की चीजें भारी मात्रा में मिली हैं। शुरुआती जांच से यह पता चला है कि यह बस्ती 11वीं से 14वीं शताब्दी ईस्वी के बीच सूमरा काल के दौरान अपने चरम पर थी।

इस ऐतिहासिक खोज की आधिकारिक घोषणा क्रांतिगुरु श्यामजी कृष्ण वर्मा कच्छ (KSKVK) विश्वविद्यालय और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के व्यापक शोध के बाद की गई है। बीएसएफ की मदद से केएसकेवीके विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने सबसे पहले इस जगह का वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था। इसके बाद भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL), बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान और डेक्कन कॉलेज पोस्ट-ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों ने भी इस स्थल का बारीकी से अध्ययन किया।

केएसकेवीकेयू के सहायक प्रोफेसर गौरव चौहान के अनुसार, जब इलाके की जांच की गई तो यह स्पष्ट हो गया कि यह कोई अकेला ढांचा नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ी पुरातात्विक बस्ती है। यहां मौजूद ढांचों के घनत्व, चारदीवारी की बनावट और मिट्टी के बर्तनों ने तुरंत यह संकेत दे दिया कि यह एक बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है। यहां मिले सबूतों से यह साफ होता है कि इस बस्ती की आबादी काफी अच्छी-खासी थी और यहां के लोग एक बेहद सुव्यवस्थित जीवन जीते थे।

खुदाई और जांच के दौरान इस स्थल से कई महत्वपूर्ण प्राचीन वस्तुएं बरामद की गई हैं। इनमें चावल छीलने की टेराकोटा मशीनें, तेल के दीये, भंडारण के जार, घरेलू बर्तन, एक तांबे का सिक्का और टेराकोटा से बनी ऊंट की मूर्ति शामिल है। विशेषज्ञों ने सतह पर मिले सिरेमिक और निचले सिंध की मध्यकालीन बस्तियों की सामग्री से तुलना करके इस जगह के समय का प्रारंभिक अनुमान लगाया है।

पुणे स्थित डेक्कन कॉलेज पोस्ट-ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर प्रबोध शिरवलकर का मानना है कि यहां मिले चावल छीलने के उपकरण, दीये और घरेलू बर्तन इस स्थल को निचले सिंधु घाटी के व्यापक मध्यकालीन सांस्कृतिक परिदृश्य से जोड़ते हैं। उनका कहना है कि कोई भी बस्ती कभी एकांत में नहीं बसती, बल्कि उनका एक बहुत लंबा इतिहास होता है।

चावल प्रसंस्करण के उपकरण इस बात का अहम सुराग देते हैं कि उस समय इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था कैसी रही होगी। शोधकर्ताओं का कहना है कि मौसमी बाढ़ ने शायद इस क्षेत्र में चावल की खेती को बढ़ावा दिया होगा, जिसमें ‘गराहा’ चावल नाम की एक स्थानीय किस्म भी शामिल है। भंडारण के बर्तनों की मौजूदगी यह साबित करती है कि यह समुदाय भोजन उत्पादन और रोजमर्रा के व्यापार में सक्रिय था।

इसके अलावा, इस जगह पर एक कब्रिस्तान भी मिला है जहां लगभग 100 मानव कंकाल मौजूद हैं। माना जा रहा है कि किसी भूकंप के बाद प्राकृतिक रूप से ये कंकाल बाहर आ गए। इन सभी कंकालों की सबसे खास बात यह है कि इनके सिर पश्चिम दिशा की ओर रखे गए हैं।

भौगोलिक दृष्टि से भी ‘बर्बादगांव’ एक बेहद महत्वपूर्ण ऊंचे स्थान पर बसा है। यह इलाका नदियों के रास्ते बदलने, ज्वार-भाटे, मिट्टी जमा होने और टेक्टोनिक गतिविधियों के कारण लगातार बदलता रहा है। इसकी स्थिति से पता चलता है कि यह कोरी नदी-धोरो पुरान-नारा मार्ग से अलग एक समुद्री गलियारे पर स्थित रहा होगा। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि निचली सिंधु नदी की पूर्वी धाराएं कभी सर क्रीक प्रणाली की ओर बहती रही होंगी, जिससे अंतर्देशीय बस्तियों और अरब सागर के बीच नौगम्य संपर्क बना होगा।

इन जलमार्गों ने लोगों, कृषि उपज और अन्य सामानों की आवाजाही को आसान बनाया होगा। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ता अजय यादव बताते हैं कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय सीमाएं उन परिदृश्यों को बांट देती हैं जिनका पुरातात्विक इतिहास हजारों साल पुराना है। यह जगह सिंधु, हाकरा प्रणाली, ज्वारीय खाड़ियों और समुद्री मार्गों के बीच के ऐतिहासिक संबंध को समझने का एक दुर्लभ अवसर प्रदान करती है।

फिलहाल केएसकेवीकेयू और ऑक्सफोर्ड का बहु-विषयक सहयोग जारी है और शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि वैज्ञानिक डेटिंग से जल्द ही इस बस्ती के सटीक कालखंड का पता चल सकेगा। ‘उजाड़गांव’ से शुरू हुआ यह सफर जल्द ही कच्छ के प्राचीन समुद्री अतीत का एक भुला दिया गया अध्याय पूरी तरह से दुनिया के सामने ला सकता है।

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