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एशियन गेम्स में जलवा बिखेरने को तैयार रसोइए और दिहाड़ी मजदूर की बेटियां

| Updated: May 9, 2026 12:40

गरीबी और संघर्षों को मात देकर तेलंगाना की लहरी और सुरागनी ने रचा इतिहास; जानिए कैसे एक रसोइए और दिहाड़ी मजदूर की बेटियों ने 'सेलिंग' जैसे एलीट खेल में बनाई अपनी जगह।

तेलंगाना की रहने वाली 15 वर्षीय लहरी कोम्मरवेली और 16 वर्षीय सुरागनी एस्वा ने सेलिंग (नौकायन) जैसे एलीट खेल में अपनी जगह बनाकर इतिहास रच दिया है। लहरी की मां एक यॉट क्लब में रसोइया हैं और सिद्दीपेट की रहने वाली हैं। वहीं, सुरागनी की मां एक विधवा हैं जो सूर्यापेट की एक अचार फैक्ट्री में दिहाड़ी मजदूर के तौर पर काम करती हैं।

यह दोनों लड़कियां अब इस साल सितंबर में जापान में होने वाले एशियन गेम्स में हिस्सा लेने जा रही हैं। वे 29ईआरएस (29ers) टू-पर्सन बोट फीडर-क्लास यूथ कैटेगरी में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी।

साल 2020 में कोविड महामारी के दौरान लहरी की मां कविता को भारी आर्थिक संघर्षों का सामना करना पड़ा था। उनके पति पेशे से एक नाई हैं और उस मुश्किल दौर में उनकी कमाई का जरिया बंद हो गया था। मजबूरी में कविता ने एक स्थानीय अस्पताल के हाउसकीपिंग विभाग में भी काम किया।

लेकिन उनके परिवार की जिंदगी तब बदल गई, जब हैदराबाद यॉट क्लब ने उन्हें रसोइए के तौर पर काम पर रख लिया। इसी दौरान क्लब के अध्यक्ष सुहेम शेख ने उनकी तीनों बेटियों को सेलिंग की ट्रेनिंग देने की पेशकश की।

आईआईटी के पूर्व छात्र और उद्यमी सुहेम शेख ने पांच दशकों से अधिक समय तक सेलिंग की है। अपने अनुभव से उन्होंने महसूस किया कि हैदराबाद के हुसैन सागर झील में नौकायन करना केवल संपन्न वर्ग या सेना और नौसेना के लोगों तक ही सीमित था। इस खेल को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने हैदराबाद के नौकरशाहों से बात की और यह तय किया कि सेलिंग के दरवाजे हर किसी के लिए खोले जाएंगे।

इसी सोच के साथ साल 2015 में ‘प्रोजेक्ट नाविका’ की शुरुआत हुई। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य झुग्गी-झोपड़ियों, अनाथालयों, बेसहारा और छोड़ दिए गए परिवारों के गरीब बच्चों को ट्रेनिंग देना है।

शेख के मुताबिक इस पहल के जरिए वे सैकड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने के अपने लक्ष्य को पूरा कर रहे हैं। पिछले एक दशक में यहां से ट्रेनिंग लेने वाले 27 युवाओं ने स्पोर्ट्स कंपनियों के साथ-साथ नौसेना और सेना की सेलिंग यूनिट्स में अपनी जगह बनाई है।

हाल ही में इटली की गार्डा झील में हुए यूरोकप में एक्सपोजर टूर रेगाटा के दौरान लहरी की पार्टनर चिलुकुरु गांव की सुरागनी एस्वा थीं। सुरागनी के पिता एक एम्बुलेंस ड्राइवर थे, जिनके निधन के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई।

वह यदाद्री-भुवनगिरी जिले के महात्मा ज्योतिबा फुले तेलंगाना बैकवर्ड क्लासेस वेलफेयर स्कूल में पढ़ रही थीं, जहां से उनकी प्रतिभा को पहचाना गया। सुरागनी की मां माधवी अचार फैक्ट्री में काम करती हैं, जहां उन्हें 300 रुपये प्रतिदिन की दिहाड़ी और 2000 रुपये मासिक विधवा पेंशन मिलती है।

सुरागनी को सेलिंग करते हुए सिर्फ एक साल हुआ है। उन्हें इसलिए चुना गया क्योंकि वह पाल (सेल्स) को सीधा रखने और ट्रिमिंग, जिबिंग व टैकिंग में बहुत माहिर हैं। सुरागनी बताती हैं कि शुरुआत में उनकी मां काफी डरी हुई थीं और उन्हें पानी में जाने की अनुमति नहीं दे रही थीं।

जब पहली बार उनकी नाव पलटी तो उन्हें कुछ समझ नहीं आया था, लेकिन अब वह तेजी से सीख रही हैं और उन्हें यह खेल बहुत पसंद आने लगा है।

यह खेल काफी मेहनत मांगता है, इसके बावजूद इस जोड़ी ने नाव पलटने जैसी चुनौतियों का सामना किया। उन्होंने सेल के नीचे चलने वाले ट्रैपीज कॉर्ड (trapeze chord) को संभालना सीखते हुए पिछले दिसंबर में हुए मुंबई ट्रायल में शानदार प्रदर्शन किया।

इन दोनों लड़कियों ने अंतरराष्ट्रीय यात्राओं के माहौल में खुद को बहुत जल्दी ढाल लिया था। हालांकि, भारत में 39 डिग्री सेल्सियस तापमान में ट्रेनिंग करने वाली लहरी और सुरागनी को उत्तरी इटली की ठंडी हवाओं ने काफी हैरान कर दिया था।

हैदराबाद लौटने पर यॉट क्लब से जुड़ी ऐसी कई और प्रेरणादायक कहानियां सामने आती हैं। रमीजा बानो नाम की एक लड़की के माता-पिता शराब के आदी थे और उसे सड़क पर भीख मांगने के लिए मजबूर करते थे। रमीजा घर से भाग गई और पार्कों व फुटपाथों पर रहने लगी। टैंक बंड पर नावों को देखकर उसका रुझान सेलिंग की तरफ बढ़ा और वह क्लब से जुड़ गई।

लहरी की ही तरह 19 साल की रावली परांडी भी बेहद प्रतिभाशाली हैं। वह क्लब से जुड़ने से पहले दो साल तक सड़कों पर बेसहारा थीं। उन्होंने 2021 में वाईएआई (YAI) यूथ नेशनल्स में प्रतिष्ठित मेजर जनरल हैरी कपूर ट्रॉफी जीती। यॉट क्लब इन बच्चों की शिक्षा का खर्च भी उठाता है और उन्हें नौकरी दिलाने में मदद करता है। रावली ने गोएथे-जेनट्रम (Goethe-Zentrum) से जर्मन भाषा भी सीखी है।

इसी तरह कोंडापुर कलां गांव के वडला मल्लेश सेलिंग सीखकर अग्निवीर बन गए हैं। रसूलपुरा के दुर्गा प्रसाद ने अमीर पड़ोस के सेलर्स को पीछे छोड़ते हुए अंडर-17 नेशनल चैंपियन का खिताब जीता और अब वह नौसेना में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

तेलंगाना के कुरावी के एक आदिवासी इलाके पेद्दा टांडा की रहने वाली तुंगारा महबूबी ने अपने पिता को खो दिया था और अपनी मां की गिरती सेहत देखी थी। सेलिंग ने उन्हें निराशा के उस भंवर से निकाला और आज वह एक पुलिस कांस्टेबल के पद पर तैनात हैं।

एक नाविक (सेलर) की शारीरिक बनावट बहुत महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इससे उन्हें अपनी नाव को संतुलित करने में मदद मिलती है। इटली रेगाटा में लहरी और सुरागनी का कुल वजन 103 किलोग्राम था, जो कि बेड़े के औसत वजन से कम से कम 27 किलोग्राम कम था।

लहरी बताती हैं कि जब वह अन्य हट्टे-कट्टे नाविकों को देखती हैं, तो उन्हें वजन के महत्व का एहसास होता है। वजन बढ़ाने के प्रयास में उन्हें चिकन बिरयानी, केएफसी और अपनी मां के हाथ की टमाटर पचड़ी खाना बहुत पसंद है। वह यह भी कहती हैं कि अंतरराष्ट्रीय यात्राओं पर कभी-कभी खाना अजीब लगता है, लेकिन नाव को स्थिर रखने के लिए उन्हें वह सब खाना पड़ता है।

सुरागनी, जो टैकिंग में अभी थोड़ी धीमी हैं, कहती हैं कि सेलिंग ने उन्हें पारिवारिक कलह और पिता के निधन के सदमे से बाहर निकाला है। उनका मानना है कि पानी पर तेज हवाओं के बीच कभी वो आगे गिरती हैं तो कभी पीछे, लेकिन सेलिंग उन्हें वापस उठना और फिर से शुरुआत करना सिखाती है।

जीवन का यह इतना बड़ा और महत्वपूर्ण सबक इन दोनों लड़कियों ने पानी में कदम रखने से पहले ही, बहुत कम उम्र में सीख लिया है।

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