अमेरिका में रह रहे भारतीय प्रवासियों और पेशेवरों के लिए एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है। अमेरिकी कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन द्वारा H-1B वीजा आवेदनों पर लगाई गई 100,000 डॉलर (करीब 83 लाख रुपये) की भारी-भरकम फीस को पूरी तरह खारिज कर दिया है। अदालत के इस फैसले का अमेरिका में सक्रिय भारतीय प्रवासी संगठनों ने पुरजोर स्वागत किया है।
सोमवार, 8 जून 2026 को मैसाचुसेट्स की एक संघीय अदालत ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस आदेश को अवैध घोषित कर दिया, जिसके तहत नए H-1B वीजा आवेदकों के लिए यह मोटी रकम तय की गई थी। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि इस तरह की फीस लगाने के लिए अमेरिकी संसद (कांग्रेस) की मंजूरी नहीं ली गई थी, जो कि कानूनन अनिवार्य है।
इस बड़े फैसले के बाद भारतीय समुदाय में खुशी का माहौल है। ‘फाउंडेशन फॉर इंडिया एंड इंडियन डायस्पोरा स्टडीज’ (FIIDS) के नीति और रणनीति प्रमुख खंडेराव कंद ने कहा कि कोर्ट का यह निर्णय रोजगार-आधारित आव्रजन प्रणाली में निष्पक्षता और स्थिरता को वापस लाने वाला है। इससे नवाचार और उद्यमिता के क्षेत्र में अमेरिका की वैश्विक बढ़त मजबूत बनी रहेगी।
खंडेराव कंद का मानना है कि अमेरिका के तकनीकी, स्वास्थ्य सेवा और उन्नत विनिर्माण क्षेत्रों के विकास के लिए दुनिया भर से आने वाली कुशल प्रतिभाएं बेहद जरूरी हैं। अदालत के इस आदेश ने यह साबित कर दिया है कि किसी भी बड़े नीतिगत बदलाव के लिए कानूनी अधिकार और आर्थिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखना जरूरी होता है।
दूसरी ओर, इस फैसले का स्वागत करते हुए भी कुछ जानकारों ने आगे के लिए सतर्क रहने की सलाह दी है। ‘इण्डियास्पोरा’ के कार्यकारी निदेशक संजीव जोशीपुरा ने कहा कि इस अदालती आदेश से H-1B वीजा से जुड़े सभी पक्षों ने राहत की सांस जरूर ली है, लेकिन यह देखना बाकी है कि क्या यह मामला यहीं पूरी तरह खत्म हो जाता है।
संजीव जोशीपुरा ने आशंका जताई है कि यदि वर्तमान अमेरिकी प्रशासन अपनी घोषित नीतियों के तहत H-1B वीजा धारकों के रास्ते में अड़चनें डालना चाहता है, तो वह सीधे कानून का उल्लंघन न करते हुए अन्य प्रक्रियागत बदलावों का सहारा ले सकता है। हाल के दिनों में प्रशासन और न्यायपालिका के बीच इस मुद्दे पर लगातार खींचतान देखने को मिली है।
गौरतलब है कि पिछले साल सितंबर में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करके नए H-1B वीजा आवेदनों के लिए इस भारी-भरकम फीस को अनिवार्य कर दिया था, जिसे अब अदालत ने पूरी तरह पलट दिया है।
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